BR आंबेडकर के पोते का आरक्षण सुधार आंदोलन पर बयान, 'BJP-RSS के इशारे पर...'
Anti Reservation Protest: प्रकाश आंबेडकर दिल्ली के जंतर मंतर पर जारी आरक्षण विरोधी प्रोटेस्ट पर हमला बोला है. इसके साथ ही उन्होंने RSS-BJP और कांग्रेस पर भी निशाना साधा है.

दिल्ली के जंतर-मंतर पर आरक्षण व्यवस्था के खिलाफ जारी प्रदर्शन पर अब बयानबाजी बढ़ने लगी है. अब बहुजन आघाडी के प्रमुख प्रकाश आंबेडकर ने इसपर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए प्रदर्शनकारियों को आड़े हाथों लिया है. उन्होंने कहा कि दिल्ली में हो रहे 'आरक्षण विरोधी' प्रदर्शन तथाकथित उच्च जातियों की अपनी वर्चस्व बचाने की एक नग्न कोशिश को बेनकाब करता है.
प्रकाश आंबेडकर अपने सोशल मीडिया हैंडल एक्स पर एक पोस्ट के जरिए ये बातें कहीं हैं. उन्होंने इस प्रदर्शन को SCs, STs तथा OBCs के सामाजिक न्याय के खिलाफ करार दिया और कहा कि प्रदर्शनकारियों ने जाति प्रथा की रक्षा करने के लिए बेशर्मी से अपनी ऊंची जाति की पहचान को सबसे आगे रखा है.
दिल्ली में हो रहे “आरक्षण विरोधी” प्रदर्शन तथाकथित उच्च जातियों की अपनी वर्चस्व बचाने की एक नग्न कोशिश को बेनकाब करता है।
— Prakash Ambedkar (@Prksh_Ambedkar) August 23, 2026
SCs, STs तथा OBCs के सामाजिक न्याय के खिलाफ अपने वर्चस्व को बचाए रखने और सामाजिक जाति प्रथा की रक्षा करने के लिए उन्होंने बेशर्मी से “ऊंची जाति” की अपनी… https://t.co/bXWQnDKlVA
बाबा साहेब का किया जिक्र
प्रकाश आंबेडकर ने बाबा साहेब के 25 नवंबर 1949 के संविधान सभा भाषण का हवाला भी दिया. उन्होंने कहा कि जातियां सामाजिक एकता को तोड़ती हैं और वास्तविक भाईचारे के बिना समानता और स्वतंत्रता मजबूत नहीं हो सकतीं हैं.
आंबेडकर ने लिखा, 'कल का यह तमाशा ठीक उसी 'राष्ट्र-विरोधी' खतरे को सामने लाता है, जिसके बारे में डॉ. बी. आर. आंबेडकर ने 25 नवंबर 1949 को संविधान सभा में अपने समापन भाषण में चेतावनी दी थी. बाबासाहेब ने कहा था कि जातियां स्वाभाविक रूप से राष्ट्र-विरोधी होती हैं क्योंकि वे सामाजिक जीवन को खंडित करती हैं. अलगाव को संस्थागत रूप देती हैं, और समुदायों के बीच ईर्ष्या तथा द्वेष के एक निरंतर चक्र को जन्म देती हैं.'
बिना बंधुत्व समानता और स्वतंत्रता केवल 'रंग की पुताई'
उन्होंने आगे कहा, 'कल, जब लोग खुले तौर पर गर्व के साथ 'सवर्ण' पहचान और राजनीतिक नारों के तहत मार्च कर रहे थे, तब वे सक्रिय रूप से उसी राष्ट्र-विरोधी विभाजन को व्यवहार में ला रहे थे! उन्होंने उस जाति व्यवस्था की रक्षा के लिए अपने सवर्ण अभिमान और वर्चस्व का हथियार की तरह इस्तेमाल किया जो सच्ची बंधुत्व की भावना को असंभव बना देती है. यदि हम वास्तव में एक राष्ट्र बनना चाहते हैं क्योंकि बंधुत्व तभी एक तथ्य हो सकता है जब एक राष्ट्र हो. बंधुत्व के बिना समानता और स्वतंत्रता केवल रंग की पुताई से अधिक कुछ नहीं होगी.'
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'बंधुत्व अनिवार्य'
उन्होंने लिखा, 'बाबासाहेब के लिए राष्ट्र का निर्माण केवल राजनीतिक या संवैधानिक स्तर पर नहीं, बल्कि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक स्तर पर भी होना आवश्यक था. इसके लिए बंधुत्व अनिवार्य था. यहीं उनकी बंधुत्व को लेकर कही गई बात बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है. बंधुत्व के बिना समानता टिक नहीं सकती. कोई भी समाज बंधुत्व प्राप्त करने का दावा तब तक नहीं कर सकता जब अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़ा वर्गों के लिए सामाजिक न्याय की नीति के खिलाफ तथाकथित उच्च जातियां अपने जातिगत विशेषाधिकार का इस्तेमाल विरोध के रूप में करती हैं.'
उन्होंने कहा कि सच्चा लोकतंत्र तब ढह जाता है, जब वंचित और शोषित समुदायों की उन्नति को तथाकथित उच्च जातियों के वर्चस्व पर सीधे हमले के रूप में देखा जाने लगता है. बंधुत्व जब तक एक जीवंत सामाजिक वास्तविकता नहीं बनता, तब तक समानता और स्वतंत्रता केवल एक सतही 'रंग की पुताई' हैं, जो सामाजिक न्याय की पहली चुनौती के सामने ही उखड़ने लगती हैं.
कांग्रेस की चुप्पी पर सवाल, बीजेपी-RSS को घेरा
अपने पोस्ट के अंत में उन्होंने कहा कि उन्हें इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह प्रदर्शन आरएसएस-भाजपा द्वारा राजनीतिक रूप से संगठित किया था, लेकिन कांग्रेस नेतृत्व की चुप्पी उतनी ही निंदनीय है. जब सामाजिक न्याय के खिलाफ सवर्ण गर्व को इतनी खुलेआम इस्तेमाल किया जाता है, तो चुप्पी का अर्थ मिलीभगत होता है!
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