Xप्लेन: आर्थिक आधार पर आरक्षण क्यों एक जटिल और संवेदनशील मुद्दा, जानिए
आर्थिक आधार की बहस में वर्ष 2019 का 103वां संविधान संशोधन एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ. केंद्र सरकार ने सामान्य वर्ग के गरीबों के लिए 10% EWS आरक्षण की व्यवस्था की.

बहुजन समाज पार्टी (BSP) की प्रमुख और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने हाल ही में जाति-आधारित आरक्षण की जगह केवल आर्थिक आधार पर आरक्षण लागू करने की उठ रही मांगों का पुरजोर विरोध किया. उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि "ऐसा कोई भी कदम देश और समाज के हित में नहीं होगा. SC, ST और OBC वर्गों के लिए आरक्षण का संवैधानिक प्रावधान इन समुदायों द्वारा सदियों से झेले जा रहे सामाजिक भेदभाव, उत्पीड़न और अभाव को दूर करने के मकसद से किया गया था." उन्होंने चेतावनी दी कि जातिगत आरक्षण के खिलाफ आवाज उठाने वाले समूहों को ऐसे किसी भी प्रयास से बचना चाहिए जो समानता पर आधारित समाज और एक विकसित, सम्मानजनक राष्ट्र निर्माण के संवैधानिक उद्देश्यों को कमजोर करता हो.
मायावती का यह बयान ऐसे समय में आया है जब राजधानी दिल्ली में इस मुद्दे को लेकर विरोध के स्वर देखे गए. दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर पर बिना अनुमति आरक्षण-विरोधी प्रदर्शन के लिए एकत्र हुए कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया. सोशल मीडिया अभियानों के जरिए जुटाए गए ये प्रदर्शनकारी मांग कर रहे थे कि सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में दाखिले व मदद के लिए पात्रता तय करते समय जातिगत पहचान के बजाय व्यक्ति की आर्थिक स्थिति को प्राथमिक आधार बनाया जाना चाहिए.
इस घटनाक्रम ने एक बार फिर देश के सबसे संवेदनशील और पुराने मुद्दे को हवा दे दी है. आखिर क्यों आरक्षण को जातिगत या सामाजिक आधार के बजाय केवल आर्थिक आधार पर लागू करना भारत में एक बेहद जटिल, संवेदनशील और विभाजनकारी बहस बन जाता है? आइए, इसके पीछे के संवैधानिक, सामाजिक, ऐतिहासिक और कानूनी पहलुओं को गहराई से समझते हैं.
1. संवैधानिक मूल भावना: 'गरीबी उन्मूलन' बनाम 'समाजिक प्रतिनिधित्व'
भारतीय संविधान के निर्माण के दौरान आरक्षण की अवधारणा को किसी कल्याणकारी या 'गरीबी हटाओ' कार्यक्रम के रूप में नहीं देखा गया था. संविधान सभा में डॉ. बी.आर. अंबेडकर और अन्य निर्माताओं का प्राथमिक उद्देश्य उन जातियों और वर्गों को राज्य के प्रशासनिक ढांचे और शक्ति के केंद्रों में 'पर्याप्त प्रतिनिधित्व' देना था, जिन्हें सदियों से वर्ण व्यवस्था और अस्पृश्यता के कारण मुख्यधारा से बाहर रखा गया था.
सामाजिक पिछड़ापन बनाम आर्थिक पिछड़ापन: प्रख्यात संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप का मानना रहा है कि गरीबी और सामाजिक पिछड़ेपन में बुनियादी अंतर है. गरीबी एक अस्थायी स्थिति हो सकती है, जिसे सही नीतियों, रोजगार और आर्थिक योजनाओं से दूर किया जा सकता है. इसके विपरीत, 'सामाजिक पिछड़ापन' या जाति आधारित पूर्वाग्रह पीढ़ियों तक व्यक्ति का पीछा नहीं छोड़ता.
जैसा कि मायावती ने अपने हालिया बयान में रेखांकित किया आरक्षण का मूल उद्देश्य किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत आय बढ़ाना नहीं, बल्कि उस वर्ग को ऐतिहासिक अन्याय से मुक्ति दिलाकर सामाजिक प्रतिष्ठा और भागीदारी देना है. इसलिए, आरक्षण को केवल आर्थिक मदद का जरिया मान लेना संवैधानिक भावना के विपरीत माना जाता है.
2. पहचान और प्रामाणिकता की व्यावहारिक चुनौतियां
यदि आरक्षण का एकमात्र आधार 'आर्थिक आय' को बना दिया जाए, तो भारत जैसे देश में इसे निष्पक्ष रूप से लागू करना प्रशासनिक रूप से एक दुःस्वप्न साबित हो सकता है.
भारत की कार्यबल का एक बड़ा हिस्सा असंगठित क्षेत्र, कृषि और अनौपचारिक व्यापार में लगा हुआ है, जहां आय का कोई निश्चित या डिजिटल रिकॉर्ड नहीं होता. ऐसे में फर्जी 'आय प्रमाण पत्र' बनवाना कोई कठिन काम नहीं है. इससे वास्तविक जरूरतमंदों के स्थान पर संपन्न और प्रभावशाली लोग गलत तरीके से लाभ उठा सकते हैं.
स्थायित्व का अभाव: जातिगत पहचान एक स्थायी सामाजिक वास्तविकता है, जबकि किसी परिवार की वार्षिक आय मौसम, बाजार, नौकरी या अन्य कारणों से हर साल बदल सकती है. क्या एक साल गरीब रहने वाले व्यक्ति को अगले साल आय बढ़ते ही आरक्षण से बाहर किया जाएगा? और इसकी निगरानी प्रतिवर्ष कैसे होगी? यह एक बड़ा व्यावहारिक प्रश्न है.
3. जातिगत राजनीति, प्रतिनिधित्व का डर और सामाजिक असंतोष
भारत का राजनीतिक और सामाजिक ढांचा जातिगत समीकरणों से गहराई से जुड़ा हुआ है. वर्तमान में आरक्षण का लाभ ले रहे अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) जो देश की आबादी का बहुसंख्यक हिस्सा हैं, उसमें यह गहरा डर बैठ जाता है कि यदि जातिगत आधार खत्म कर दिया गया, तो प्रशासनिक सेवाओं, न्यायपालिका और शिक्षण संस्थानों में उनका प्रतिनिधित्व शून्य के बराबर रह जाएगा.

वोट बैंक और जनांदोलन का खतरा: भारत के राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जाति आधारित व्यवस्था में बदलाव की कोई भी एकतरफा कोशिश बड़े पैमाने पर सामाजिक टकराव और हिंसक जन-आंदोलनों को जन्म दे सकती है. 2018 में SC/ST एक्ट में बदलाव के विरोध में हुआ देशव्यापी आंदोलन इस बात का प्रमाण है कि इन वर्गों के अधिकारों में जरा सा भी बदलाव कितना संवेदनशील हो सकता है.
4. 50% की संवैधानिक सीमा और EWS का दायरा
आर्थिक आधार की बहस में वर्ष 2019 का 103वां संविधान संशोधन एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ. केंद्र सरकार ने सामान्य वर्ग के गरीबों के लिए 10% EWS आरक्षण की व्यवस्था की. 2022 में सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की संविधान पीठ ने बहुमत से EWS आरक्षण को वैध ठहराया.
सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस यू.यू. ललित की अध्यक्षता वाली पीठ में न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी ने फैसला सुनाते हुए कहा था कि "केवल आर्थिक आधार पर आरक्षण देना संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन नहीं है."
हालांकि, इस फैसले में यह स्पष्ट किया गया था कि EWS आरक्षण SC/ST/OBC के मौजूदा 50% जातिगत आरक्षण को छुए बिना, उनके दायरे से बाहर के गरीबों के लिए एक अतिरिक्त व्यवस्था है.
यदि कोई मांग उठती है कि पूरे आरक्षण (50% जातिगत आरक्षण सहित) को खत्म करके केवल आर्थिक आधार लागू कर दिया जाए, तो यह सुप्रीम कोर्ट के इंद्रा साहनी केस (1992) के उस ऐतिहासिक फैसले और संवैधानिक सिद्धांतों से सीधा टकराता है, जिसमें स्पष्ट कहा गया था कि "जाति सामाजिक पिछड़ेपन का एक प्रमुख सूचक है और केवल आर्थिक स्थिति आरक्षण का अकेला आधार नहीं हो सकती."
5. अवसरों का संकट और संसाधनों की सीमितता
आरक्षण से जुड़ी वास्तविक संवेदनशीलता का एक मुख्य कारण देश में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और सरकारी नौकरियों की भारी कमी भी है. जब देश में लाखों युवाओं के लिए सरकारी नौकरियां और शीर्ष संस्थानों में सीटें बेहद सीमित हों, तो चयन का कोई भी मानदंड (चाहे जाति हो या आय) स्वाभाविक रूप से एक बड़े वर्ग को असंतुष्ट करता है.
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि निजी क्षेत्र में रोजगार के पर्याप्त अवसर न होने और कृषि क्षेत्र में संकट के कारण भी विभिन्न वर्गों के युवा आरक्षण के मानदंडों को बदलने या स्वयं को आरक्षित श्रेणी में शामिल करने की मांग करते रहते हैं.
आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग ऊपर से देखने पर कई लोगों को 'समानता और निष्पक्षता' के नाम पर तार्किक और तर्कसंगत लग सकती है. लेकिन भारत के ऐतिहासिक संदर्भ, सामाजिक विषमता और संवैधानिक ढांचे के भीतर यह बेहद जटिल और विस्फोटक विषय है.
जैसा कि बीएसपी प्रमुख मायावती और अन्य सामाजिक विचारकों का तर्क है, जब तक समाज में जातिगत पूर्वाग्रह, वैवाहिक और सामाजिक भेदभाव तथा शक्ति के संरचनात्मक ढांचों में गैर-बराबरी मौजूद है, तब तक केवल 'आर्थिक आधार' सामाजिक न्याय का विकल्प नहीं बन सकता. EWS के माध्यम से आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को राहत देने की कोशिश तो की गई है, लेकिन जातिगत आरक्षण के मूल ढांचे से छेड़छाड़ करना भारत के सामाजिक ताने-बाने और संवैधानिक संतुलन के लिए एक बेहद नाजुक और चुनौतीपूर्ण कदम होगा.






















