कटनी: शिवलिंग पर सिर रगड़ता दिखा बाघ, लोग बता रहे भक्ति, वन विभाग ने बताई असल वजह
MP News: मध्य प्रदेश के कटनी में एक बाघ का शिवलिंग पर सिर रगड़ने का वीडियो वायरल हुआ है. ग्रामीण इसे आस्था से जोड़ रहे हैं, वहीं वन विभाग इसे जानवरों का स्वाभाविक व्यवहार बता रहा है.

मध्य प्रदेश के कटनी जिले से एक बेहद हैरान करने वाला और कौतूहल से भरा वीडियो सामने आया है. ढीमरखेड़ा तहसील के अंतर्गत आने वाले सडार के जंगलों में एक बाघ को भगवान शिव के प्राचीन शिवलिंग पर अपना सिर रगड़ते हुए देखा गया है.
वन्यजीव की इस हरकत को लोग आस्था से जोड़कर देख रहे हैं और यह अनोखा वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है.
क्या है पूरा मामला?
स्थानीय ग्रामीणों के मुताबिक, यह दुर्लभ वाकया बीते बुधवार की देर शाम का बताया जा रहा है. सडार गांव के समीप स्थित जंगल में महादेव का एक प्राचीन शिवलिंग स्थापित है. वायरल हो रहे वीडियो में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि एक बाघ बड़े ही शांत स्वभाव से शिवलिंग के पास पहुंचता है और काफी देर तक उस पर अपना सिर और जीभ रगड़ता रहता है.
आस्था या वन्यजीवों की स्वाभाविक प्रवृत्ति?
इस वीडियो के सामने आने के बाद इलाके में चर्चाओं का बाजार गर्म है. इसे लेकर दो अलग-अलग पहलू सामने आ रहे हैं:
- ग्रामीणों का नजरिया: कई लोग इसे चमत्कार और भगवान भोलेनाथ के प्रति बाघ की 'भक्ति' से जोड़कर देख रहे हैं.
- वन विभाग का वैज्ञानिक तर्क: वन अधिकारियों ने इस पर स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया है कि जंगली जानवर अक्सर अपनी गंध (टेरिटरी मार्किंग) छोड़ने या शरीर की खुजली मिटाने के लिए पत्थरों, पेड़ों या ठोस वस्तुओं पर अपना सिर रगड़ते हैं. यह उनकी एक बहुत ही सामान्य प्राकृतिक प्रवृत्ति है, न कि कोई चमत्कार.
वन विभाग हुआ अलर्ट, ग्रामीणों को दी गई चेतावनी
एक ओर जहां लोग इस घटना को चमत्कार मान रहे हैं, वहीं इंसानी बस्ती के इतने करीब बाघ की मौजूदगी से इलाके में दहशत का माहौल भी है. सडार और आसपास के इलाकों में वन्यप्राणियों का मूवमेंट लगातार बना रहता है.
पान उमरिया रेंज के अधिकारी अजय मिश्रा ने बताया कि यह घटना सडार गांव से महज 400 मीटर की दूरी पर हुई है. सुरक्षा के मद्देनजर वन विभाग की गश्ती टीम लगातार बाघ के मूवमेंट पर नजर बनाए हुए है. एहतियात के तौर पर ग्रामीणों को सख्त हिदायत दी गई है कि वे फिलहाल जंगल की तरफ न जाएं और पूरी तरह सतर्क रहें.
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Source: IOCL
























