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क्या गर्मियों में जल संकट से जूझने की कगार पर है जम्मू-कश्मीर? इसलिए उठ रहे सवाल

Jammu Kashmir News In Hindi: जम्मू कश्मीर आने वाली गर्मियों में जल संकट से जूझने की कगार पर है. लगातार आ रहे बदलाव के चलते मौसम में आने वाले बदलाव प्रमुख कारण हैं.

जम्मू कश्मीर आने वाली गर्मियों में जल संकट से जूझने की कगार पर है. यह सवाल इस लिए उठने लगे हैं क्योंकि अप्रैल और मई महीनो में सामान्य से ज्यादा तापमान, बारिश में कमी और जल-वायु के सामान्य पैटर्न में लगातार आ रहे बदलाव के चलते मौसम में आने वाले बदलाव प्रमुख कारण हैं. जिससे जम्मू और कश्मीर संभावित जल संकट की ओर बढ़ रहा है. और वह भी ऐसे समय जब धान का रुपाई का समय शुरू हो रहा है और सेब और अन्य फल लगने की अवस्था में है.

मौसम विभाग के अनुसार जम्मू कश्मीर में पूरी सर्दियां लगभग बिना बर्फ वाली रही और पूरे जम्मू-कश्मीर में लगातार छह महीनों तक सामान्य से कम बारिश और बर्फबारी दर्ज होने के बाद बदलते मौसम के पैटर्न ने पीने के पानी की कमी, कृषि और बागवानी के लिए सिंचाई के तनाव और सबसे बढ़कर पनबिजली उत्पादन में गिरावट को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं. 

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मई में देखी गई तापमान में तेजी

अब मई के महीने में भी कश्मीर में दिन के तापमान में असामान्य रूप से तेजी देखी गई. जिसमें श्रीनगर में मौसम का सबसे ज्यादा तापमान 31.7 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया. यह मई के पहले हफ्ते में भी सामान्य से 7.6 डिग्री ज्यादा था. घाटी के कई अन्य स्थानों पर भी तापमान मौसमी औसत से काफी ज्यादा दर्ज किया गया, जिससे पहले से ही चल रही शुष्क मौसम की स्थिति और भी बदतर हो गई.

श्रीनगर के कृषि निदेशालय के जिला अधिकारी फिरोज अहमद शापू ने कहा कि समस्या पिछले छह महीनों की कम बारिश नहीं है, बल्कि कई सालों से बारिश में लगातार आ रही कमी है, जो हिमालय क्षेत्र में उभर रहे जलवायु परिवर्तन के एक बड़े पैटर्न को दर्शाती है. और इस पैटर्न में कृषि और बागवानी, दोनों क्षेत्रों को बुरी तरह प्रभावित करने की क्षमता है.

कृषि निदेशालय के अधिकारी ने क्या कहा?

श्रीनगर के कृषि निदेशालय के शापू ने कहा कि हमारी पहली प्राथमिकता धान की खेती है और अभी तक सिंचित क्षेत्रों में पानी की कोई कमी नहीं है, लेकिन निचले इलाकों (tail areas) में जहां पानी की कमी की समस्या पैदा हो सकती है. हम किसानों से जरूरत पड़ने पर दूसरी फसलें उगाने के लिए कह रहे हैं.

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) केआंकड़ों के अनुसार जम्मू और कश्मीर के 20 जिलों में से केवल पांच जिलों में ही पिछले तीन महीनों के दौरान औसत मौसमी बारिश की सामान्य सीमा 81 प्रतिशत से 119 प्रतिशत के भीतर बारिश हुई है.

शोपियां जिले में बारिश की सबसे ज्यादा कमी 67 प्रतिशत दर्ज की गई, उसके बाद कठुआ में 60 प्रतिशत और अनंतनाग में 46 प्रतिशत की कमी रही. असामान्य रूप से ज्यादा तापमान के साथ-साथ, अप्रैल महीने में पुलवामा, कुलगाम, बडगाम और श्रीनगर में भी बारिश की भारी कमी देखी गई.

अप्रैल के ताजा आंकड़ों पर एक नजर

अप्रैल के बारिश के ताजाआंकड़ों के अनुसार, केंद्र शासित प्रदेश में सामान्य 99.6 मिमी के मुकाबले केवल 86.5 मिमी बारिश हुई, जो 13 प्रतिशत की कमी को दर्शाता है. हालाँकि, कश्मीर घाटी के कई जिलों में, खासकर दक्षिण कश्मीर में, यह कमी कहीं ज्यादा गंभीर रही है.

घाटी के शोपियां जिले और जम्मू के कठुआ में बारिश की भारी कमी देखी जा रही है; दक्षिण कश्मीर के इस जिले में 1 मार्च से 6 मई, 2026 के बीच सामान्य से 71 प्रतिशत कम बारिश हुई है. इसी अवधि में कठुआ में 63 प्रतिशत कम बारिश हुई है.

कुलगाम जिले में 53 प्रतिशत की कमी है, जिसके बाद अनंतनाग (46 प्रतिशत), बडगाम (40 प्रतिशत), किश्तवाड़ (36 प्रतिशत), उधमपुर (34 प्रतिशत), डोडा (31 प्रतिशत), पुलवामा (30 प्रतिशत), बांदीपोरा (29 प्रतिशत), रामबन (26 प्रतिशत) और श्रीनगर (22 प्रतिशत) का नंबर आता है. और जम्मू संभाग में पुंछ (41 प्रतिशत ज्यादा) और सांबा (49 प्रतिशत ज्यादा) दो ऐसे जिले हैं जहाँ इस 10 हफ्ते की अवधि में सामान्य से ज्यादा बारिश हुई है.

मौसम विज्ञान केंद्र कश्मीर के उप निदेशक ने क्या कहा?

मौसम विज्ञान केंद्र कश्मीर के उप निदेशक मलिक मुबीन ने कहा कि बर्फबारी और बारिश की कमी का गर्मियों के महीनों में नदियों के बहाव, पीने के पानी की उपलब्धता और पनबिजली उत्पादन पर काफी असर पड़ सकता है. मुबीन ने कहा कि नदियों और उनकी सहायक नदियों में पानी का स्तर गिरने से कई ग्रामीण और पहाड़ी इलाकों में चिंताएं बढ़ गई हैं, जहाँ के लोग पानी के लिए मुख्य रूप से प्राकृतिक स्रोतों पर निर्भर रहते हैं. अगर गर्मियों में भी सूखा जारी रहा, तो पानी के संसाधनों पर दबाव और बढ़ सकता है.
 
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि लंबे समय तक सूखे की स्थिति और पिछले लगभग सात सर्दियों से सामान्य से कम बर्फबारी होने के कारण, झेलम नदी के बेसिन को पानी देने वाले झरनों, नदियों और अन्य प्राकृतिक जल-पुनर्भरण (water recharge) प्रणालियों पर बुरा असर पड़ना शुरू हो गया है.

मौसम विभाग के अधिकारियों ने जताई चिंता

मौसम विभाग के अधिकारियों ने बताया कि कमजोर पश्चिमी विक्षोभ और बारिश के अनियमित पैटर्न हिमालयी क्षेत्र के लिए एक दीर्घकालिक जलवायु चिंता के रूप में उभर रहे हैं. ग्लेशियरों, झरनों और भूजल के पुनर्भरण का चक्र हर साल बाधित हो रहा है.

हिमालय क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव अब साफ तौर पर दिखाई देने लगे हैं. हर साल कम बर्फबारी और लंबे समय तक सूखे की स्थिति का सीधा असर न केवल ग्लेशियरों पर पड़ता है, बल्कि भूजल के पुनर्भरण और नदी प्रणालियों पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ता है.

कश्मीर में सभी नदी नालों में जल सिट्र हर गुजरते दिन के साथ घाट रहा है और पहाड़ी नादियों में तेज गर्मी के चलते बर्फ पिगलने से समय से पहले जायदा पानी बह रहा है. जिस से संकंट और जायदा होने की आशंका है. कश्मीर की जल-प्रणाली बर्फ पर अत्यधिक निर्भर होने के कारण, वह इस तरह के बदलावों के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील हो जाता है.

इसलिए, कश्मीर को अब तत्काल एक दीर्घकालिक जल-प्रबंधन योजना की आवश्यकता है, जिसमें आर्द्रभूमियों (wetlands) का संरक्षण, झरनों की सुरक्षा और भूजल के दोहन की वैज्ञानिक निगरानी जैसे उपाय शामिल हों.

विशेषज्ञों ने अधिकारियों से आग्रह किया है कि वे भीषण गर्मी के दौरान स्थिति और बिगड़ने से पहले, जल संरक्षण, आर्द्रभूमियों और झरनों की बहाली, वर्षा जल संचयन और भूजल के वैज्ञानिक प्रबंधन पर तत्काल ध्यान केंद्रित करें.

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