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Himachal Pradesh: हिमाचल प्रदेश में दो विधानसभा की आखिर क्या है जरूरत? जानिए इसके पीछे की वजह

Himachal Winter Assembly: पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश मेें दो विधानसभा हैं. शीतकालीन सत्र धर्मशाला के तपोवन में आयोजित होता है. छोटे से राज्य में दो विधानसभा होने का कारण सियासी है.

Himachal Pradesh News: हिमाचल प्रदेश भले ही एक छोटा राज्य हो, लेकिन इस पहाड़ी प्रदेश में दो विधानसभा हैं. हिमाचल प्रदेश का शीतकालीन सत्र आने पर धर्मशाला में तपोवन विधानसभा की चर्चा शुरू हो जाती है. ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर छोटे प्रदेश में दो विधानसभा की जरूरत क्या है? पहाड़ी प्रदेश हिमाचल में दो विधानसभा के पीछे की वजह सीधे तौर पर राजनीतिक है. पहाड़ी प्रदेश में अमूमन ऊपरी और निचले हिमाचल की राजनीति देखने को मिलती रही. तत्कालीन वीरभद्र सरकार ने इस राजनीति को साधने के लिए ही धर्मशाला में विधानसभा का निर्माण करवाया. तब से लेकर अब तक हर बार विधानसभा का शीतकालीन सत्र धर्मशाला में ही होता रहा है. हालांकि तपोवन विधानसभा में साल भर के दौरान केवल एक बार शीतकालीन सत्र पर करोड़ों रुपए खर्च हो जाते हैं.

ऊपरी और निचले हिमाचल की राजनीति साधने की कवायद

15 फरवरी, 2006 को तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह (Virbhadra Singh) और विधानसभा अध्यक्ष बृज बिहारी लाल बुटेल ने इस विधानसभा का उद्घाटन किया था. हिमाचल प्रदेश की राजनीति की समझ रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार धनंजय शर्मा बताते हैं कि इस विधानसभा के बनने से पहले एक सत्र धर्मशाला कॉलेज के प्रयास भवन में आयोजित किया गया था. प्रयास भवन के नामकरण की कहानी भी बेहद दिलचस्प है. इस भवन को छात्रों के प्रयास से तैयार किया गया था. इसी वजह से नाम प्रयास भवन रखा गया. एक साल के छोटे से अंतराल में वीरभद्र सरकार ने इस विधानसभा का निर्माण पूरा करवा दिया. साल 2006 का शीतकालीन सत्र इसी विधानसभा में हुआ, लेकिन साल 2007 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ा. जिस ऊपरी और निचले हिमाचल के समीकरण को साधने के लिए वीरभद्र सिंह ने इस विधानसभा का निर्माण करवाया था. इससे ठीक उलट विधानसभा चुनाव में परिणाम देखने को मिले और सत्ता में प्रेम कुमार धूमल (Prem Kumar Dhumal) की वापसी हो गई.

2016 में धर्मशाला को बनाया गया था शीतकालीन राजधानी

साल 2016 में एक बार फिर ऊपरी और निचले  हिमाचल की राजनीति को साधने के लिए तत्कालीन वीरभद्र सरकार ने धर्मशाला को शीतकालीन राजधानी बना दिया. माना जाता है कि कांगड़ा के एक कद्दावर नेता की ओर से दबाव में तत्कालीन वीरभद्र सरकार ने फैसला लिया था. हालांकि बाद में अन्य जिलों के बड़े नेताओं की ओर से दबाव बनने के बाद चार दिन में ही तत्कालीन सरकार को फैसला वापस लेना पड़ा. तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने ऊपरी और निचले हिमाचल की राजनीति को साधना चाहते थे. उन्होंने कई बार इन समीकरणों को साधने की कोशिश की, लेकिन बावजूद इसके हिमाचल प्रदेश की जनता ने रिवाज रखने का ही काम किया. हर पांच साल में हिमाचल प्रदेश की सत्ता बदलती रही. आज करीब चार दशक बाद भी हिमाचल प्रदेश में सत्ता बदलने का रिवाज कायम है.

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