Himachal News: शिमला में बारिश ने आखिर क्यों मचाई तबाही? अवैध गतिविधियां रोकी होती तो न होता तांडव!
Shimla: मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने खुद माना कि शहर में पानी की उचित ड्रेनेज व्यवस्था न होने की वजह से भी यहां के स्थानीय बाशिंदों को भारी नुकसान झेलना पड़ा.

Shimla News: हिमाचल प्रदेश (Himachal Pradesh) की राजधानी और पहाड़ों की रानी है शिमला (Shimla). विश्व भर में अपने पर्यटन के लिए मशहूर शिमला इन दिनों सुर्खियों में तो है, लेकिन अपनी खूबसूरती के लिए नहीं बल्कि यहां हो रही तबाही के लिए. बीते दिनों शिमला शहर के लोगों ने तबाही की जो तस्वीर देखी, उसे न तो आज से पहले किसी ने देखा था और न ही भविष्य में कोई देखना चाहेगा. इस तबाही ने शहर के लोगों को ऐसी स्मृति दी जिसे वह याद तो नहीं रखना चाहेंगे, लेकिन कभी भूल भी नहीं सकेंगे.
अब सवाल यह है कि खूबसूरत पहाड़ों में बसे शिमला में ऐसी तबाही हुई क्यों? यह सवाल इन दिनों शहर भर में चर्चा का विषय है. तबाही के लिए किसी एक कारण को तो जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. सबसे पहले वजह तो जलवायु परिवर्तन के कारण शहर में हुई अत्यधिक बारिश रही. इसके अलावा निर्माण के बाद लोगों ने पैसा बचाने के लिए पहाड़ों में अवैध डंपिंग की और यही डंपिंग का मलबा भारी बारिश की वजह से लोगों के घरों में गिरा जा घुसा. शहर भर में हो रहे निर्माण के बाद सड़क किनारे पहाड़ों पर धड़ल्ले से डंपिंग होती रही और प्रशासन आंख मूंदे सब कुछ देखता रहा.
भारी-भरकम पेड़ खिलौने की तरह टूटे
लगातार हुई अवैध डंपिंग की वजह से पेड़ों की जड़ भी कमजोर हुई और शहर में भारी-भरकम पेड़ खिलौने की तरह टूटते हुए नजर आए. इसके अलावा मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने खुद माना कि शहर में पानी की उचित ड्रेनेज व्यवस्था न होने की वजह से भी यहां के स्थानीय बाशिंदों को भारी नुकसान झेलना पड़ा. शहर भर में अब हालात यह है कि लोगों को तिरपाल डालकर अपने आशियाने को बचाना पड़ रहा है. जगह-जगह घरों के की नींव कमजोर हुई है और इससे लोग खौफजदा हैं. कानों में जब भी पहाड़ शब्द सुनाई पड़ता है, तो जहन में मजबूती और फौलादी का भाव उत्पन्न होता है
पहाड़ नहीं सह पा रहे इतना वजन?
वहीं जब यह कहा जाए कि ये मजबूत पहाड़ ही इतना अधिक वजन नहीं सह पा रहे हैं, तो यह कहीं न कहीं चिंता का विषय बन जाता है. शिमला शहर को महज 25 हजार की आबादी के लिए बसाया गया था, लेकिन अब यहां आबादी ढाई लाख के पार है. इसके अलावा शिमला पर राजधानी के साथ-साथ पर्यटन का भी अत्यधिक दबाव है. शहर में विकास के नाम पर लगातार हो रहे विनाशक निर्माण ने पहाड़ों को कमजोर कर दिया है. इसके अलावा जगह-जगह सड़क चौड़ी करने के नाम पर पहाड़ों के सीने को छलनी किया जा रहा है.
कहा जाता है कि पहाड़ को हम जो कुछ देते हैं, पहाड़ हमें वह वापस ही लौटा देता है. ठीक वैसे ही जैसे पहाड़ में दी गई आवाज, गुंजकर वापस आती है. अब सवाल यह है कि क्या सरकार-प्रशासन के साथ आम लोग इस तबाही से कोई सीख लेंगे? या फिर शहर भर में अवैध और साथ ही साथ वैध अतिक्रमण इसी तरह जारी रहेगा.
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Source: IOCL






















