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Gujarat Election 2022: गुजरात में बीजेपी की नई रणनीति, महिलाओं की सुरक्षा का मुद्दा लेकर चुनाव साधने की तैयारी

बीजेपी का दावा है कि उसके शासन में महिलाएं अधिक सुरक्षित हैं, वहीं NCRB की रिपोर्ट बताती है कि 2020 में राज्य में महिलाओं के खिलाफ अपराध की 8,028 घटनाएं और 2021 में 7,348 मामले दर्ज किए गए.

Gujarat Assembly Election 2022: गुजरात में महिलाओं की सेफ्टी और सिक्योरिटी, कर्फ्यू मुक्त राज्य और सांप्रदायिक हिंसा की कोई घटना नहीं कुछ ऐसे कारक हैं, जिन्होंने बीजेपी को राज्य में पिछले दो दशकों के दौरान मतदाताओं का दिल जीतने में मदद की है. राज्य के 49,089,765 मतदाताओं में से 23,751,738 महिलाएं हैं और वे चुनाव तय करने में अहम भूमिका निभाती हैं. दूसरी ओर कांग्रेस के पास राज्य में बीजेपी का मुकाबला करने के लिए रणनीति और सामंजस्य का अभाव है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने चुनाव प्रचार के दौरान इस बात पर जोर दिया कि कैसे सांप्रदायिक दंगे नियमित मामले बन गए थे और कर्फ्यू साल में 200 दिन आम बात थी. बीजेपी के सत्ता में आने के बाद से राज्य में महिलाएं ज्यादा सुरक्षित हैं, अब महिलाएं रात में खुलेआम घूम सकती हैं और गरबा का लुत्फ उठा कर बिना किसी डर के घर लौट सकती हैं.

ये दावे राज्य के ट्रैक रिकॉर्ड द्वारा समर्थित हैं. सांप्रदायिक हिंसा ने 1961-71 के बीच 16 जिलों में शांति भंग कर दी थी, जब राज्य में सांप्रदायिक दंगों की 685 घटनाओं की सूचना मिली थी. 1981 में फिर से राज्य में आरक्षण विरोधी आंदोलन ने एक हिंसक रूप ले लिया. इसके बाद 1985 की सांप्रदायिक हिंसा राज्य के इतिहास में सबसे भयावह हिंसा में से एक थी. इसी तरह बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद 1992 में सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठी और फिर 2002 में गोधरा कांड जिसने राज्य में शांति और सद्भाव को बिगाड़ दिया. गुजरात के पूर्व डीजीपी कुलदीप शर्मा कहते हैं, राज्य में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं हुई हैं. इससे कोई इंकार नहीं कर सकता, लेकिन 1969 की सांप्रदायिक हिंसा को छोड़कर राज्य में सभी हिंसाओं का राजनीतिक एंगल और ट्विस्ट था. 1969 के दंगों को ही अराजनैतिक सांप्रदायिक हिंसा कहा जा सकता है. जहां तक महिलाओं की सेफ्टी और सिक्यॉरिटी का सवाल है, गुजरात शुरू से ही शांतिपूर्ण राज्य रहा है.

क्या कहना है पुलिस अधिकारियों का
पूर्व डीजीपी कुलदीप शर्मा ने कहा कि गुजरात राज्य के गठन के बाद से यह अग्रिम पंक्ति का राज्य था. प्रारंभिक सरकार की पहल, फिर आईसीएस और आईएएस अधिकारियों के सक्रिय उपायों ने वापी, अंकलेश्वर और अन्य शहरों में जीआईडीसी (गुजरात औद्योगिक विकास निगम) की योजना बनाने और स्थापित करने में मदद की. इन कदमों ने निवेश को आकर्षित किया क्योंकि उद्यमी केवल वहीं निवेश करते हैं जहां शांति हो. शर्मा के मुताबिक, पहले भी महिलाएं सुरक्षित थीं, लेकिन पिछले कुछ सालों से यही पेश किया जा रहा है कि महिलाएं अब भी सुरक्षित हैं. तथ्य यह है कि महिलाएं पहले से ही सुरक्षित थीं, 70, 80 और 90 के दशक में भी रात में घूमती थीं. उन्हें ऐसी एक भी घटना याद नहीं है कि 80 और 90 के दशक में नवरात्रि की रातों में महिलाओं से छेड़खानी या महिला के खिलाफ अपराध बढ़ गए हो, लेकिन राजनीति में यह एक प्रचार चलाया जाता है और लोग उस पर विश्वास कर रहे हैं क्योंकि यह बार-बार कहा जा रहा है.

आंकड़ें बताते हैं
जबकि बीजेपी दावा कर रही है कि उसके शासन में महिलाएं अधिक सुरक्षित हैं, राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट बताती है, 2020 में राज्य में महिलाओं के खिलाफ अपराध की 8,028 घटनाएं हुईं. 2021 में, यह थोड़ा नीचे आया और राज्य में 7,348 अपराध दर्ज किए गए. हालांकि, 2021 में बच्चों के खिलाफ अपराध में 10 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी. 2020 में 4075 मामले दर्ज किए गए थे, जो 2021 में 4515 हो गए. पिछले बजट सत्र में गृह राज्य मंत्री हर्ष सांघवी ने राज्य विधानसभा को सूचित किया है कि दो वर्षों (2020 और 2021) में राज्य में कुल 3,796 बलात्कार के मामले दर्ज किए गए. इस अवधि के दौरान राज्य में सामूहिक बलात्कार के 61 मामले भी सामने आए. पूर्व आईपीएस अधिकारी अर्जुन सिंह चौहान कहते हैं, अन्य राज्यों की तुलना में महिलाएं ज्यादा सुरक्षित हैं. कांग्रेस के शासन काल में भी ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जो यह दावा करता हो कि कांग्रेस के शासन में राज्य में नवरात्रि की रातों में महिलाओं के खिलाफ अपराध बढ़े थे और अब ऐसा नहीं हो रहा है. 

80-90 के दशक में भी महिलाएं सुरक्षित
नवरात्रि में अन्य रातों की तुलना में कुछ और मामले सामने आते हैं तो यह सामान्य है, लेकिन उन रातों में पुलिस गश्त भी बढ़ाई जाती है. अर्जुन सिंह चौहान ने कहा, एक धारणा बनाई जा रही है कि अब महिलाएं सुरक्षित हैं और रात के घंटों में घूम सकती हैं. समस्या यह भी है कि 80 और 90 के दशक में आजादी का आनंद लेने वाली महिलाएं भी चुप हैं, तो यह 'राजा जैसी, प्रजा वैसी' वाली स्थिति है. वहीं नाम न छापने की शर्त पर एक सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी कहते हैं, राज्य में महिला सुरक्षा का श्रेय लेने वाले वे ही लोग हैं, जो इसका श्रेय पुलिस को देने को तैयार नहीं है. यह बड़ी बात है, यह गुजरात के खून में है. सेवानिवृत्त अधिकारी ने एक उदाहरण देते हुए कहा, स्कूलों में यदि एक शिक्षक कक्षा में शांति चाहता है, तो वह सबसे शरारती छात्र को कक्षा की निगरानी का जिम्मा सौंप देगा, यदि आज कानून व्यवस्था बेहतर है, तो समझने की कोशिश करनी चाहिए. उन्होंने कहा, तथ्य गुजरात के इतिहास में है सितंबर 2002 में अक्षरधाम मंदिर पर हमले से पहले राज्य में कभी भी आतंकवादी हमला नहीं हुआ था.

2008 के सीरियल बम विस्फोट से पहले कभी भी ऐसे बम विस्फोट नहीं हुए थे, लेकिन क्या सत्ता पक्ष इस विषय पर बात करेंगे? सेवानिवृत्त अधिकारी ने यह भी तर्क दिया, प्रचार गर्म आलू की तरह बेचा जाता है और लोग इसे खरीद रहे हैं, क्योंकि कांग्रेस में काउंटर रणनीति और सामंजस्य की कमी है. कांग्रेस के नेता हमेशा इस डर में रहते हैं कि अगर उन्होंने 2002 के दंगों या सीरियल बम धमाकों का मुद्दा उठाया तो अतीत उनके पीछे पड़ जाएगा.

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