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पेन-पेंसिल, टूथब्रश का भी आक्सीजन लेवल बता रहे नकली पल्स ऑक्सीमीटर, कोरोना मरीजों की ज़िंदगी से हो रहा खिलवाड़

कोरोना महामारी के बीच नकली ऑक्सीमीटर भी आ गए हैं. ये मीटर निर्जीव चीजों जैसे कि पेन, पेंसिल का भी ऑक्सीजन लेवल बता रहे हैं.

प्रयागराज, एबीपी गंगा। कोरोना की महामारी में बीमारी की गंभीरता का अंदाजा लगाने का सबसे बड़ा हथियार पल्स ऑक्सीमीटर है. इसके ज़रिये आक्सीजन की मात्रा की जानकारी लेकर कोरोना की गंभीरता का पता लगाया जाता है. हालांकि कुछ मुनाफाखोरों ने कोरोना की आपदा को भी अवसर में बदलते हुए बाज़ार में नकली पल्स ऑक्सीमीटर उतार दिए हैं. कोई बाज़ार में पूरी तरह नकली पल्स ऑक्सीमीटर बेच रहा है तो कोई मानकों की अनदेखी कर इतनी घटिया क्वालिटी का, जिसके ज़रिये सामने आने वाली रीडिंग का कोई मतलब नहीं होता.

पल्स ऑक्सीमीटर उंगली को कुछ देर उपकरण में रखने के बाद खून और फेफड़े में आक्सीजन की मात्रा के बारे में बताता है, जबकि नकली व घटिया क्वालिटी वाला उपकरण उंगली की जगह पेन -कागज़, टूथब्रश या दातून समेत उंगली जैसा कुछ भी रखने पर कोई एक रीडिंग शो कर देता है. यानि कोई रीडिंग देखकर आप अपनी सेहत को लेकर संतुष्ट तो हो सकते हैं, लेकिन यह फर्जी और गलत रीडिंग आपकी ज़िंदगी को खतरे में डाल सकता है. इस रिपोर्ट में ज़िंदगी को दांव पर लगाने वाले गोरखधंधे को देखकर आपके पैरों तले ज़मीन खिसक सकती है और आपको दांतो तले उंगलियां दबानी पड़ सकती हैं.

नकली मीटर मार्केट में नकली और घटिया क्वालिटी के पल्स ऑक्सीमीटर का इस्तेमाल करने वाले कोरोना मरीजों को अपनी बीमारी की गंभीरता का अंदाजा तब ही हो पाता है, जब तबीयत ज़्यादा बिगड़ जाती है. कई बार तो हालात इतने बदतर हो जाते हैं कि बीमारी बेकाबू होकर डॉक्टर्स के लिए भी चुनौती बन जाती है. सरकारी अमले को इस गोरखधंधे के बारे में पता तो है, लेकिन वह सब कुछ जानते हुए भी मौत के इस खेल से अंजान बना हुआ है. न तो कहीं छापेमारी की जा रही है और न ही सैम्पलिंग व टेस्टिंग हो रही है.

गांव-देहात में ज्यादा फर्जी मामले यह खेल गांव देहात व पिछड़े हुए इलाकों में ज़्यादा हो रहा है. वहां तमाम लोग सस्ते के चक्कर में अपने मरीज की ज़िंदगी दांव पर लगा दे रहे हैं. ब्रांडेड कंपनियों का पल्स ऑक्सीमीटर बारह सौ रूपये से लेकर दो हज़ार रूपये के बीच का है, लेकिन पूरी तरह नकली यह उपकरण महज़ ढाई सौ से तीन सौ रूपये में मिल जाता है, जबकि मानक की अनदेखी कर घटिया क्वालिटी वाला पल्स ऑक्सीमीटर पांच सौ से सात सौ रुपए में मिल जा रहा है.

पेन-पेंसिल, टूथब्रश का भी आक्सीजन लेवल बता रहे नकली पल्स ऑक्सीमीटर, कोरोना मरीजों की ज़िंदगी से हो रहा खिलवाड़

कैसा होता है नकली पल्स ऑक्सीमीटर आइये अब आपको बताते हैं कि पल्स ऑक्सीमीटर नकली कैसे होता है और नकली होने के बावजूद आम उपभोक्ता इसकी हकीकत से कैसे अंजान रह जाता है. दरअसल, पल्स ऑक्सीमीटर किसी भी व्यक्ति के खून में आक्सीजन का लेवल बताता है. यह एक तरीके की इलेक्ट्रानिक डिवाइस होती है, जिसके जरिये फेफड़ों के सही काम करने का भी अंदाजा खून में आक्सीजन का लेवल देखकर लगाया जाता है. अगर किसी कोरोना पॉजिटिव के शरीर में आक्सीजन का लेवल सही है तो वह होम आइसोलेशन में रह सकता है और उसकी ज़िंदगी को कोई खतरा नहीं होता, लेकिन अगर बीमारी ने फेफड़े पर अपनी पकड़ बना ली है तो उसका असर सांस लेने पर पड़ता है और आक्सीजन लेवल तेजी से गिरने लगता है. इसके बाद मरीज को आईसीयू में वेंटिलेटर पर रखा जाता है। उसे ऑक्सीजन दिया जाता है.

हूबहू असली जैसा नकली प्रयागराज के सृजन हॉस्पिटल की कंसल्टेंट डा० मेहा अग्रवाल के मुताबिक़ आक्सीजन लेवल 88 फीसदी से कतई कम नहीं होना चाहिए. यह जितना नीचे जाता है, मरीज के लिए खतरा उतना ही बढ़ता जाता है. उनके मुताबिक़ 90 फीसदी से ज़्यादा का आक्सीजन लेवल बेहतर माना जाता है. पल्स ऑक्सीमीटर में हाथ की किसी भी उंगली को रखा जाता है. उंगली के ज़रिये ही यह डिवाइस आक्सीजन की मात्रा बता देती है. नकली पल्स ऑक्सीमीटर हूबहू असली जैसा दिखता है. इसमें तीन से चार नम्बर्स की रीडिंग ऑटो फीड कर दी जाती है. नकली डिवाइस में आप उंगली रखें या फिर उंगली की तरह वाले पेन -फोल्ड पेपर, टूथ ब्रश- पेंसिल या दातून. यह फ़ौरन पहले से फीड कोई रीडिंग बता देगा. इसमें जो तीन चार रीडिंग फीड की जाती है, वह ऐसी होती है, जो किसी सामान्य स्वस्थ व्यक्ति में होती है यानि 94 - 95 और 96 या सत्तानबे. मरीज़ इन रीडिंग को देखकर खुश होता रहता है और खुद को ठीक समझता है.

पेन, पेंसिल की भी रीडिंग हमारी टीम ने ऐसे ही पल्स ऑक्सीमीटर में उंगली लगाई तो भी वही रीडिंग आ रही थी और पेन -पेंसिल, चाभी व कागज़ लगाया तो उसका भी आक्सीजन लेवल उतना ही आ रहा था. आपको बता दें कि सही पल्स ऑक्सीमीटर में पेन -पेंसिल और टूथब्रश तो छोड़िये अगर उंगली सही जगह पर ठीक से नहीं रखी गई तो डिवाइस कोई रीडिंग देने के बजाय फिंगर आउट लिखकर डिस्प्ले देने लगता है. घटिया क्वालिटी वाले पल्स ऑक्सीमीटर में भी यही होता है. वह कभी सही काम करता है तो कभी गलत. वह भी उंगली के बजाय दूसरे सामानों पेन -पेंसिल का भी कई बार आक्सीजन लेवल बता देता है यानि घटिया क्वालिटी वाला जो पल्स ऑक्सीमीटर टूथब्रश -चाभी और दातून का आक्सीजन लेवल बता सकता है, उस पर महामारी के दौर में भरोसा कैसे किया जा सकता है.

दवा व्यापारी परेशान प्रयागराज के दवा व्यापारी भी इस फर्जीवाड़े से परेशान हैं. उनका कहना है कि आम तौर पर दवा कारोबारी तो इससे परहेज करते हैं, लेकिन जनरल स्टोर या गांव -देहात के झोलाछापों के ज़रिये ये जानलेवा पल्स ऑक्सीमीटर धड़ल्ले से बिक रहे हैं. इससे जहां कारोबारियों को आर्थिक नुकसान होता है तो वहीं मरीजों की ज़िंदगी खतरे में पड़ जाती है. प्रयागराज में केमिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष अनिल दुबे के मुताबिक़ लोगों को हमेशा पल्स ऑक्सीमीटर भरोसे की दुकान से ही लेना चाहिए. अगर ज़्यादा जानकारी न हो तो ऐसी दुकान से खरीदना चाहिए जो बिल देता है. बिल देने वाला दुकानदार आमतौर पर ऐसे नकली सामान नहीं बेचता है. उनका कहना है कि बेहतर होगा कि इस बारे में अपने डाक्टर से राय ज़रूर ले ली जाए.

डॉक्टर भी हैरान प्रयागराज के नामचीन सृजन हॉस्पिटल की कंसल्टेंट डा० मेहा अग्रवाल से जब हमारी टीम ऐसे नकली व घटिया पल्स ऑक्सीमीटर की हकीकत समझने पहुंची तो उसे देखकर वह भी हैरान रह गईं. उन्होंने भी हमारे द्वारा दिए गए पल्स आक्सीमीटर में पेंसिल लगाई तो भी वह आक्सीजन लेवल की रीडिंग शो कर रहा था. उनके मुताबिक़ यह बेहद खतरनाक है और कोरोना मरीजों की जान ले सकता है और साथ ही उनकी ज़िंदगी को खतरे में भी डाल सकता है. उनका कहना है कि पल्स ऑक्सीमीटर हमेशा ब्रांडेड कंपनी और अच्छी क्वालिटी का ही होना चाहिए. डा० मेहा अग्रवाल ने हमें गलत रीडिंग से होने वाले नुकसान के बारे में भी विस्तार से बताया.

सरकारी अमला मौन! प्रयागराज के सरकारी अमले को भी इसकी भनक है, लेकिन वह बहुत जहमत नहीं उठाना चाहता. प्रयागराज में फ़ूड एंड ड्रग्स कंट्रोल डिपार्टमेंट के असिस्टेंट कमिश्नर उदयभान सिंह के मुताबिक़ उनकी टीम लगातार बाज़ारों की निगरानी कर रही है. अभी तक ऐसा कोई उपकरण पकड़ में नहीं आया है, फिर भी विभाग सजग है और निगाह बनाए हुए हैं. अगर मामला पकड़ में आता है तो दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी. वैसे असिस्टेंट कमिश्नर उदयभान विभाग को मिले अधिकारों का दुखड़ा रोकर भी बहानेबाजी करने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहते.

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मोहम्मद मोईन को पत्रकारिता का करीब तीन दशक का अनुभव है. वह प्रिंट - इलेक्ट्रानिक और डिजिटल तीनों ही माध्यमों में सालों तक काम कर चुके हैं. ABP नेटवर्क से वह पिछले करीब 18 सालों, स्टार न्यूज़ के समय से ही जुड़े हुए हैं. राजनीति - धर्म और लीगल टापिक के साथ सम सामयिक विषयों के एक्सपर्ट हैं. पत्रकार होने के साथ ही राजनीतिक विश्लेषक, एक्सपर्ट पैनलिस्ट, आलोचक और टिप्पणीकार भी हैं. इनकी चुनावी भविष्यवाणी ज्यादातर मौकों पर सटीक साबित हुई है. 8 लोकसभा चुनाव और कई विधानसभा चुनाव कवर कर चुके हैं. 7 कुंभ और महाकुंभ की कवरेज कर अपनी अलग पहचान बनाई है. यह अपनी बेबाक- निष्पक्ष और तथ्यपरक पत्रकारिता के लिए जाने जाते हैं. मोहम्मद मोईन ने चार विषयों पत्रकारिता एवं जनसंचार, राजनीति विज्ञान, हिंदी और मध्यकालीन व आधुनिक इतिहास विषयों में मास्टर डिग्री यानी स्नातकोत्तर किया हुआ है. लॉ ग्रेजुएट भी हैं. देश के कई राज्यों में काम करने का अनुभव रखते हैं. देश की तमाम नामचीन हस्तियों का इंटरव्यू ले चुके हैं और कई चर्चित घटनाओं को कवर चुके हैं. 

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