पुलिसकर्मी पर चाकू से हमला मामले में राहत नहीं, दिल्ली हाई कोर्ट ने आरोपी की सजा पर लगाई मुहर
Delhi News In Hindi: मामला अप्रैल 2002 का है, उस समय हेड कांस्टेबल सुरेश कुमार ड्यूटी खत्म कर घर लौट रहे थे. इसी दौरान दिल्ली के वजीरपुर इलाके के पास आरोपी और उसके साथियों ने उन्हें रोक लिया.

- दिल्ली हाई कोर्ट ने 2002 के गंभीर हमले में सजा बरकरार रखी.
- आरोपी ने हेड कांस्टेबल पर चाकू से हमला, सामान लूटा.
- कोर्ट ने घायल गवाह की गवाही को महत्वपूर्ण माना.
- पारिवारिक जिम्मेदारी की दलील खारिज, सजा पर कायम.
दिल्ली में करीब दो दशक पुराने एक गंभीर हमले के मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए आरोपी की सजा को बरकरार रखा है. अदालत ने उस व्यक्ति की अपील खारिज कर दी, जिसने साल 2002 में एक हेड कांस्टेबल पर चाकू से हमला कर दिया था. कोर्ट ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 307 (हत्या का प्रयास), 392, 394 और 397 (लूट और लूट के दौरान हमला) के तहत दोषी ठहराने के निचली अदालत के फैसले को सही माना.
मामला अप्रैल 2002 का है, उस समय हेड कांस्टेबल सुरेश कुमार ड्यूटी खत्म कर घर लौट रहे थे. इसी दौरान दिल्ली के वजीरपुर इलाके के पास आरोपी और उसके साथियों ने उन्हें रोक लिया. पहले आरोपी ने अपने साथियों के साथ मिलकर हेड कांस्टेबल के साथ मारपीट की और फिर चाकू से उनके पेट और जांघ पर वार कर दिया.
हमले के बाद आरोपियों ने पुलिसकर्मी के पास मौजूद सामान भी लूट लिया और मौके से फरार हो गए. जांच के दौरान सामने आया कि यह हमला अचानक नहीं था. दरअसल इससे पहले हेड कांस्टेबल ने एक पुलिस कार्रवाई के दौरान आरोपी से जुड़े एक वाहन को रोका था. माना जा रहा है कि इसी बात से आरोपी काफी नाराज था और उसने बदला लेने के लिए यह हमला किया.
कोर्ट ने घायल पुलिसकर्मी की गवाही को माना बेहद जरूरी
दिल्ली हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने घायल पुलिसकर्मी की गवाही को बेहद अहम माना. अदालत ने कहा कि कानून में घायल गवाह की गवाही को विशेष महत्व दिया जाता है, क्योंकि वह घटना का प्रत्यक्ष पीड़ित होता है. इस संदर्भ में कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी हवाला दिया. जिसमें कहा गया था कि घायल गवाह की गवाही पर भरोसा किया जाना चाहिए, जब तक उसे खारिज करने की मजबूत वजह न हो. अदालत ने यह भी माना कि पीड़ित के शरीर पर जो चोटें आईं, खासकर पेट और जांघ में चाकू के घाव, वे साफ तौर पर बताते हैं कि हमले में धारदार हथियार का इस्तेमाल हुआ था और आरोपी की मंशा गंभीर थी. इसलिए हत्या के प्रयास की धारा लगाना पूरी तरह सही है.
हाई कोर्ट ने बचाव पक्ष की दलील को किया खारिज
दिल्ली हाई कोर्ट में आरोपी की तरफ से दलील दी गई थी कि घटना को 23 साल बीत चुके हैं, उसके परिवार की जिम्मेदारियां हैं और वह पहले ही काफी समय जेल में काट चुका है, इसलिए सजा में राहत दी जाए. लेकिन कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया. अदालत ने कहा कि एक पुलिस अधिकारी पर इस तरह हथियार से हमला करना बेहद गंभीर अपराध है और इसमें नरमी दिखाने की कोई वजह नहीं है. कोर्ट ने आरोपी के पिछले व्यवहार और आपराधिक पृष्ठभूमि को भी ध्यान में रखा. अंत में अदालत ने आरोपी की अपील खारिज करते हुए उसकी सजा को बरकरार रखा और उसे तुरंत सरेंडर करने का आदेश दिया.


















