Mithila Chaurchan Festival: मिथिला का प्रसिद्ध पर्व चौरचन, जानिए इससे जुड़ी मान्यताएं और पूजा की विधि
Chaurchan Festival: इस दिन शाम होने पर घर के आंगन या छत पर रंग बिरंगे अरिपन बनाए जाते हैं. व्रती दिन भर उपवास में रहकर शाम होने पर पश्चिम दिशा में पकवान, फल एवं मिठाई रखकर चंद्र देव की पूजा करती हैं.

मधुबनी में भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को किया जानेवाला यह व्रत छठ और दुर्गोत्सव के बाद मिथिला में प्रायः सर्वाधिक प्रचलित पर्वों में एक है. मैथिलों में यह चौरचन या चौठचन्द्र के नाम से प्रसिद्ध है. यह वर्तमान समय में यह देश के शेष क्षेत्रों में प्रायः नहीं के बराबर किया जाता है, लेकिन मध्यकालीन निबंधों और कुछ पुराणों में इसकी कथा के वर्णन के आधार पर कहा जा सकता है कि यह अन्य क्षेत्रों में भी कमोबेश प्रचलित रहा होगा.
संध्या में चतुर्थी तिथि पर किया जाता है व्रत
यह शाम में किए जाने वाला व्रत है. इसलिए जिस दिन संध्या में चतुर्थी तिथि पड़े उस दिन यह किया जाता है. यदि दो दिन संध्या में चतुर्थी हो तो बादवाला अर्थात जिस दिन सूर्योदय और चन्द्रोदय काल में यह तिथि हो वह ग्राह्य है. यदि चंद्रोदय काल में किसी दिन भी चतुर्थी तिथि न पड़े तो जिस दिन सूर्योदय काल में चतुर्थी हो उस दिन सायंकाल यह पूजा की जाती है.
मिथिला में इसके प्रचलन और लोकप्रियता के प्रसंग में कहा जाता है कि महाराजा महेश ठाकुर के एक पौत्र हेमांगद ठाकुर जब सत्ता च्युत हो कर कारागृह में बंदी थे तब उन्होंने चन्द्रमा से कबुला किया (मन्नत मांगी) कि यदि मुझे राज्य मिल जाएगा तो मैं आपकी पूजा करूंगा. बाद में राज्य प्राप्ति पर उन्होंने वैसा ही किया. (विश्वेश्वर झा कृत प्रमुख पर्व विवेचन, पृ.22)
चौठचन्द्र की कथा का विस्तार से वर्णन स्कन्दपुराण में आया है और उसी के आधार पर इस पर्व का सम्पादन किया जाता है. यहां उल्लेखनीय है कि इसके नैवेद्य में विभिन्न प्रकार के पूरी, सब्जी, पकवान, पायस, फल और मिठाइयों के रहते हुए भी दही और केले (पका) का विशेष महत्व है. ऐसा भी सुनने में आता है कि जब दही के लिए दूध का अभाव हो जाता था तब व्रती पिठार (पानी मिश्रित पिसा हुआ अरबा चावल) मटकुरी (मिट्टी का दही पात्र) में लगा कर हाथ में उठाते थे.
भूमि पर अरिपन से चन्द्रमा की आकृति बनाई जाती है जिस पर केले के पत्ते को रख कर पूजा की जाती है. परिवार के सदस्यों की संख्या के हिसाब से प्रत्येक के लिए बांस की डाली पर पकवान आदि और दही मटकुरी (मिट्टी का दही पात्र) रखी जाती है. प्रत्येक नैवेद्य रखने के स्थान पर चन्द्र मंडल का अरिपन किया जाता है. सामान्यतः यह पूजा महिलाएं करती हैं, कभी कभी पुरुष भी करते हैं. इसमें दिन भर अभुक्त रह कर संध्या काल पश्चिम मुख हो कर व्रती रोहिणी सहित चन्द्रमा की पूजा करती हैं.
पंच देवताओं, रोहिणी और चन्द्रमा की पूजा
शुरू में गणपति आदि पंच देवताओं की पूजा की जाती है. तदनंतर गौरी पूजा कर रोहिणी सहित चन्द्रमा की पूजा की जाती है. विधवा स्त्री और पुरुष गौरी के स्थान पर विष्णु पूजा करते हैं. पूजा में श्वेत वस्त्र, श्वेत पुष्प आदि का प्रयोग विधेय है. पूजा के पश्चात नैवेद्य के प्रत्येक पात्र को हाथ में लेकर निम्न मंत्र के साथ चन्द्रमा का दर्शन किया जाता है. सिंहः पसेनमवधीत् सिंहो जाम्बवता हतः। सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः।।
जिनके घर पूजा नहीं होती है वे भी हाथ में फल लेकर इस मंत्र से चन्द्र दर्शन करते हैं. जिनके घर पूजा होती है, उस घर के भी शेष सदस्य इस मंत्र के साथ हाथ में फल ले कर चन्द्र दर्शन करते हैं. भाद्र शुक्ल चतुर्थी चन्द्र के दर्शन से कृष्ण को मिथ्या कलंक लग गया था. इसलिए लोगों को इसके निवारण के लिए स्यमन्तक मणि की कथा का श्रवण आवश्यक है. इसके कथा श्रवण के बाद दक्षिणा और ब्राह्मण भोजन किया जाता है.
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Source: IOCL





















