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 ‘एक देश, एक चुनाव’ पर मनोज झा का हमला, बोले- ये जुनून डुबो देगा

‘एक देश, एक चुनाव’ को RJD नेता मनोज झा ने अव्यावहारिक बताया है. उन्होंने कहा कि भारत विविधताओं वाला देश है और सरकार गिरने पर चुनावी व्यवस्था संभालना बड़ी चुनौती होगी.

‘एक देश, एक चुनाव’ के मुद्दे पर आरजेडी नेता और राज्यसभा सांसद मनोज झा ने केंद्र सरकार की योजना पर सवाल उठाए हैं. उन्होंने इसे संवैधानिक बहस के बजाय व्यावहारिकता के नजरिए से देखने की बात कही. मनोज झा के मुताबिक, भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में एक साथ चुनाव कराना व्यावहारिक नहीं है.

उन्होंने कहा कि देश में अलग-अलग क्षेत्रों की अपनी राजनीतिक परिस्थितियां हैं और कई राज्यों में स्थानीय मुद्दों पर आधारित राजनीतिक दल सक्रिय हैं. ऐसे में पूरे देश में एक ही समय पर चुनाव कराना कई तरह की मुश्किलें पैदा कर सकता है.

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‘यह व्यावहारिक नहीं है’

मनोज झा ने कहा कि वह इस समय ‘एक देश, एक चुनाव’ के संवैधानिक पहलू पर बात नहीं करेंगे, बल्कि इसकी व्यावहारिकता पर सवाल उठा रहे हैं. उनके मुताबिक यह व्यवस्था जमीन पर लागू करना आसान नहीं होगा. उन्होंने कहा कि भारत एक विविधतापूर्ण देश है, जहां अलग-अलग इलाकों में अलग राजनीतिक दल और राजनीतिक परिस्थितियां हैं. ऐसे में सभी राज्यों और केंद्र के चुनाव एक साथ कराने से कई व्यावहारिक चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं.

‘1952 में व्यवस्था थी, फिर 60 के दशक में क्यों बदली?’

आरजेडी नेता ने कहा कि आज ‘एक देश, एक चुनाव’ को लेकर चर्चा हो रही है, लेकिन देश में पहले भी एक साथ चुनाव की व्यवस्था रही है. उन्होंने सवाल उठाया कि अगर 1952 से ऐसी व्यवस्था थी तो 1960 के दशक में यह व्यवस्था क्यों खत्म हो गई? झा का कहना है कि उस समय भी राजनीतिक परिस्थितियों के कारण चुनावी चक्र में बदलाव आया था. इसलिए आज दोबारा ऐसी व्यवस्था लागू करने से पहले उसके संभावित नतीजों पर गंभीरता से विचार करना जरूरी है.

सरकार गिर गई तो क्या होगा?

मनोज झा ने एक साथ चुनाव कराने की व्यवस्था को लेकर एक अहम सवाल उठाया. उन्होंने पूछा कि अगर किसी राज्य में चुनाव के बाद बनी सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाती और बीच में राजनीतिक संकट खड़ा हो जाता है तो चुनावी व्यवस्था को कैसे संभाला जाएगा? उनके मुताबिक, ऐसे हालात में विधानसभा भंग होने या सरकार गिरने जैसी स्थिति पैदा हो सकती है. ऐसे में पूरे देश के चुनावी चक्र को एक साथ बनाए रखना बड़ी चुनौती बन सकता है.

‘एक होने का जुनून देश को डुबो देगा’

आगे कहा कि देश को एक साथ जोड़ने की सोच अलग बात है, लेकिन हर चीज को एक करने की कोशिश व्यावहारिक नहीं हो सकती. उन्होंने ‘एक होने’ के जुनून को लेकर भी सरकार पर निशाना साधा. उन्होंने कहा कि भारत की ताकत उसकी विविधता में है और अलग-अलग राज्यों की अपनी राजनीतिक परिस्थितियां हैं। इसलिए ‘एक देश, एक चुनाव’ को लागू करने से पहले व्यावहारिक समस्याओं का समाधान तलाशना जरूरी है.

क्या है एक देश, एक चुनाव बिल? 

बता दें कि 129वां संविधान संशोधन विधेयक, 2024, 'एक देश, एक चुनाव के नाम से प्रस्तावित सुधार से जुड़ा है, जिसका मकसद लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराना है. केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2024 भी उस बड़े ढांचे का हिस्सा है, जिसका मकसद पूरे देश में एक साथ चुनाव कराने की प्रक्रिया को आसान बनाना है. यह बिल 17 दिसंबर, 2024 को लोकसभा में पेश किए गया था. 

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नूरनैन अली एक कंसल्टेंट राइटर हैं, जिनकी विशेषज्ञता राजनीति, राज्य सरकार की नीतियों और क्राइम रिपोर्टिंग में है. उन्हें चुनावी कवरेज का लंबा अनुभव है. उन्होंने मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव 2018, लोकसभा चुनाव 2019 और 2024 तथा उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2017 और 2022 जैसे महत्वपूर्ण चुनावों को कवर किया है.  
नूरनैन अली साल 2014 से मीडिया क्षेत्र में सक्रिय हैं. उन्होंने उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, दिल्ली, बिहार और हरियाणा से जुड़ी खबरों की रिपोर्टिंग की है. वे टोटल टीवी, रफ्तार न्यूज, एसएमबीसी स्वराज, ईटीवी भारत, वे2न्यूज और लल्लूराम जैसे मीडिया संस्थानों में अपनी सेवाएं दे चुके हैं. पत्रकारिता के अलावा उन्हें खाना बनाना, किताबें पढ़ना और सच्ची घटनाओं पर आधारित फिल्में देखना पसंद है. वे गजल, कव्वाली और 90 के दशक के हिंदी गानों के भी शौकीन हैं.  
उन्होंने बीए (राजनीति शास्त्र एवं भूगोल) की शिक्षा प्राप्त की है. इसके साथ ही पत्रकारिता एवं विज्ञापन में 2 वर्षीय डिप्लोमा और ग्रामीण विकास में मास्टर्स किया है.  

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