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कोटा बनने के बाद भी पटना दे रहा था टक्कर, आखिर क्यों पिछड़ा कोचिंग हब? फिजिक्स टीचर जे. राय ने बताई कहानी

Patna News In Hindi: आखिर पटना कोचिंग हब क्यों पिछड़ गया इसको लेकर फिजिक्स टीचर जे. राय ने पुरानी कहानी बताई है. साल 2002 और 2003 के बीच एजुकेशन हब कोटा का जन्म हुआ था.

राजस्थान का कोटा शिक्षा नगरी के रूप में जाना जाता है. हालांकि इसके बनने के बाद पटना टक्कर दे रहा था. आखिर पटना कोचिंग हब क्यों पिछड़ गया इसको लेकर फिजिक्स टीचर जे. राय ने पुरानी कहानी बताई है. साल 2002 और 2003 के बीच एजुकेशन हब कोटा का जन्म हुआ था. पटना के पुराने और नामचीन फिजिक्स विषय के शिक्षक जे.राय जिन्होंने बताया कि कोटा का जन्म जब हो चुका था उसके बाद भी हम लोग छात्रों को कोटा जाने से रोकने में सफल हुए थे और 50% से ज्यादा छात्रों का कोटा जाने पर रोक लग गई थी.

पटना में ही छात्रों को कोटा जैसी पढ़ाई मिलने लगी थी, लेकिन शिक्षकों की व्यक्तिगत स्पर्धा ने ऐसा होने नहीं दिया और धीरे-धीरे अब कोचिंग संस्थान के हालात बिगड़ने लगे हैं. एबीपी न्यूज़ से खास बातचीत में फिजिक्स के नामचीन शिक्षक जे.राय जो अभी पिछले दो-तीन सालों से छात्रों को पढ़ाने का काम बंद कर चुके हैं. 

फिजिक्स टीचर जे राय ने सुनाई अपने दौर की कहानी

उन्होंने बताया कि साल 1998 से हमने बच्चों को पढ़ाना शुरू किया था. पहले सब्जेक्ट बाइज पढ़ाई का दौर था और हम फिजिक्स के शिक्षक रहे हैं. राजेंद्र नगर में एक जगह हम पढ़ाते थे. उस समय काफी संख्या में फिजिक्स पढ़ने के लिए छात्र आते थे. इसके बाद 2010 में हमने एक बड़ा कोचिंग संस्थान खोला था, जिसमें और विषय की भी पढ़ाई होती थी और हमारे कोचिंग में आकर अन्य विषय के शिक्षक भी पढ़ाते थे.

उन्होंने कहा कि अभी के शिक्षक जिस तरह अपने आप को बहुत काबिल और सबसे ऊपर मानते हैं यह गलत है. मेरा मानना है कि 100 प्रतिशत नॉलेज वाले कोई शिक्षक नहीं है. अभी कोई कहते हैं तो यह उनकी राय है मैं तो ऐसा नहीं कहता हूं. मैं फिजिक्स का टीचर हूं भले 2 साल पहले पढ़ाना छोड़ दिया हूं लेकिन मैं एक बात कहता हूं कि मैं भी पूरी तरह पूर्ण नहीं हूं, फिजिक्स अगर समुद्र है तो मैं उसकी एकमात्र बूंद हूं.

'उस समय शिक्षकों के प्रति छात्रों का समर्पण भाव था'

जे राय ने  अपने समय के छात्रों और शिक्षकों के प्रतिभाव के बारे में याद को ताजा करते हुए बताया कि उस समय शिक्षकों के प्रति छात्रों का समर्पण भाव था. छात्र आते थे तो पहले पैर छूते थे तो हम तो इसके लिए छात्रों को मना करते थे. क्योंकि जब पैर छूने लगते थे तो एक-एक घंटे तक छात्र पैर छूते रहते थे, क्योंकि 500 से अधिक छात्र एक बैच में होते थे. 

ऐसे में समय बर्बाद होता था तो हम छात्रों को इसके लिए रोकते थे, लेकिन छात्रों का शिक्षकों के प्रति बहुत आदर भाव था. इसके साथ ही अभी जो दौड़ चल रही है उस पर जे.राय ने छात्रों को संदेश दिया कि आप गुरु को गुरु माने, लेकिन आप सिर्फ पढ़ाई से ताल्लुक रखें.

जो नोट्स समझ में नहीं आ रहा है उसके लिए शिक्षक से बात करें और अपने करियर पर ज्यादा फोकस करें. ऐसा नहीं कि मास्टर साहब जो कह रहे हैं उसके लिए हम रोड पर उतर जाएं, आंदोलन करें. छात्रों को इस सब से बचना चाहिए, यह आपके भविष्य की बात है. 

कोटा को टक्कर दे रहा था पटना कोचिंग हब

उन्होंने कहा, "कोटा का विस्तार होने के बाद भी पटना कोटा को टक्कर दे रहा था और आगे भी देता, लेकिन 2009 की घटना ने सब कुछ बदल कर रख दिया था. 2009 की घटना ने पटना के कोचिंग संस्थानों को पीछे कर दिया था. उस वक्त कुछ टीचर और छात्रों में विवाद हुआ था और विवाद सड़कों पर आया था. करीब एक हफ्ते तक बाजार समिति का कोचिंग संस्थान चर्चा में रहा था. उस वक्त पटना के शिक्षा का पूरा रूप बदल गया था." 

टीचर जे. राय ने बताया कि मैं कोटा में डिबेट में बैठा हूं और वहां के शिक्षकों के साथ डिबेट की और उन लोगों को हार का सामना करना पड़ा था. पटना में बहुत अच्छे-अच्छे शिक्षक थे. 2009 के पहले सब्जेक्ट-वाइज जो पढ़ाई होती थी तब बहुत अच्छा माहौल था. अलग-अलग विषय के अलग-अलग शिक्षक थे. छात्र काफी खुश हो रहे थे. 

पढ़ाई का माहौल पटना में बहुत बढ़िया बन चुका था. 2009 के पहले कोचिंग संस्थानों में व्यक्तिगत स्पर्धा नहीं होती थी क्वालिटी की प्रतिस्पर्धा होती थी. उन्होंने आगे कहा कि 2009 की घटना के बाद भी पटना की कोचिंग शिक्षा में फिर सुधार आया. बहुत से लोगों ने संभाला, लेकिन दो-तीन साल बाद ही टीचर को तोड़ने वाली एक बात सामने आई. 

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टीचरों को लालच दिया जाने लगा- जे. राय

टीचर एक कोचिंग से टूटकर दूसरे कोचिंग में जाने लगे. टीचरों को लालच दिया जाने लगा, अधिक पैसे दिए जाने लगे. उस समय अच्छे टीचरों की संख्या बहुत कम थी, जिसकी वजह से कई कोचिंग संस्थान बढ़ने लगे तो कई काफी गिरने लगे. उसके बाद कोविड में भी कोचिंग संस्थान डिस्टर्ब हुए. उन्होंने कहा कि स्मार्टफोन का समय आने से बच्चों में पढ़ाई का माहौल प्रभावित हुआ. क्योंकि पढ़ाई के साथ-साथ बच्चे कुछ और चीजों में भी ध्यान दे देते हैं, जिससे मूल पढ़ाई प्रभावित होने लगी.

जे. राय ने आखिर में कहा, "उस समय मेरे काफी छात्र थे, लेकिन मैं छात्रों से प्रचार नहीं कराता था. हम फिजिक्स पढ़ाते थे उस समय और शिक्षक लोग भी फिजिक्स पढ़ाते थे तो छात्र नोट्स कंपेयर करते थे कि किस टीचर के नोट्स अच्छे हैं जो परीक्षा में सफल कर सकता है. मेरा नया बैच शुरू होता था तो मैं यह भी नहीं बताता था कि मेरा नया बैच कब शुरू होने वाला है."

उन्होंने कहा, "एक नोटिस लग जाता था कि इतनी तारीख से नया बैच शुरू होने वाला है और जो बच्चे पढ़ रहे थे वही माउथ पब्लिसिटी करके दूसरे बच्चे को बताते थे. उस वक्त कुछ लोग बैनर लगाते थे, लेकिन मैं ऐसा नहीं करता था और बैनर लगाने की प्रक्रिया बहुत कम थी. साल 2000 के समय में प्रत्येक सब्जेक्ट में तीन से चार ऐसे शिक्षक थे जो काफी अच्छा कर रहे थे और छात्र उनसे प्रभावित होते थे. तब 12 से 14 ऐसे शिक्षक थे, जिनके लिए छात्रों की भीड़ उमड़ती थी.

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