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सीएम नीतीश कुमार ने समीक्षा बैठक में उठाया नेपाल का मुद्दा, कहा- नहीं मिल रहा अपेक्षित सहयोग

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि अभी राज्य के 16 जिलों के 125 प्रखंडों के 2232 पंचायतों की 74 लाख 20 हजार से ज्यादा की जनसंख्या बाढ़ से प्रभावित है.

पटना: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को 6 राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ देश में बाढ़ की स्थिति और बाढ़ प्रबंधन की समीक्षा के लिए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से समीक्षा बैठक की. इस बैठक में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने नेपाल का मुद्दा उठाते हुए कहा कि, " नेपाल में ज्यादा बारिश होने के कारण उत्तर बिहार बाढ़ से प्रभावित होता है. भारत नेपाल समझौते के आधार पर बिहार का जल संसाधन विभाग सीमावर्ती इलाके में बाढ़ प्रबंधन का काम करता है. हाल के वर्षों में नेपाल सरकार की ओर पूरा सहयोग नहीं किया जा रहा है. वर्ष 2008 में कोसी त्रासदी के समय भी बांध टूटने से बिहार पूरी तरह प्रभावित हुआ था. इस वर्ष भी मधेपुरा जिले में पहले से बने हुए बांध की मरम्मती और मधुबनी में नो मैन्स लैंड में बने बांध की मरम्मती कार्य में नेपाल सरकार की ओर से सहयोग नहीं किया गया."

उन्होंने कहा, " बिहार के संबंधित अधिकारियों ने नेपाल के अधिकारियों से बातचीत कर समाधान की कोशिश की लेकिन उन्होंने सहयोग नहीं दिया. जो मरम्मती कार्य मई के मध्य माह तक पूरा हो जाना चाहिए था, उसे जून के अंत तक ठीक कराया गया. हमलोगों ने अपनी सीमा क्षेत्र में बांध मजबूती का कार्य किया है. इस स्थिति पर गौर करने की जरूरत है."

मुख्यमंत्री ने कहा कि साल 2017 में बाढ़ की स्थिति की समीक्षा के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिहार आए थे और उस दौरान भी पूर्णिया में बाढ़ के संबंध में उनके साथ विस्तृत चर्चा हुई थी. उन्होंने कहा, " उत्तर बिहार बाढ़ से अभी पूरी तरह प्रभावित है. राज्य में सितंबर महीने तक बाढ़ की आशंका बनी हुई रहती है. अभी राज्य के 16 जिलों के 125 प्रखंडों के 2232 पंचायतों की 74 लाख 20 हजार से ज्यादा की जनसंख्या बाढ़ से प्रभावित है. राहत और बचाव के लिए सभी जरूरी कदम उठाए जा रहे हैं. एनडीआरएफ की 23 और एसडीआरएफ की 17 टीमें लगातार काम कर रही हैं. 5 लाख 8 हजार लोगों को निष्क्रमित किया गया है."

उन्होंने कहा कि 29 राहत शिविरों में 27 हजार लोग रह रहे हैं. सामुदायिक रसोई केंद्र भी चलाए जा रहे हैं, जिसकी व्यवस्थाओं का मैंने खुद जाकर जायजा लिया है. राहत शिविरों में रह रहे लोगों के बीच सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कराया जा रहा है और उनकी कोरोना संक्रमण की जांच भी कराई जा रही है. 1267 सामुदायिक रसोई केंद्रों पर प्रतिदिन साढ़े 9 लाख से अधिक लोग भोजन कर रहे हैं. उनकी भी कोरोना संक्रमण की जांच करायी जा रही है. बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का मैंने एरियल सर्वे किया है और अधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए हैं. भविष्य में भी बाढ़ की आशंका बनी हुई है, उससे निपटने के लिए जरूरी तैयारी करने को कहा गया है. सभी विभाग पूरी तरह से अलर्ट हैं.

मुख्यमंत्री ने कहा कि हमलोग बाढ़ प्रभावित प्रत्येक परिवारों को 6 हजार रुपये की ग्रैचुट्स रिलीफ की राशि पहले से देते आ रहे हैं. जिसमें 3 हजार रुपये अनाज और 3 हजार रुपये कपड़े और अन्य जरुरतों की पूर्ति के लिए देते हैं. वर्ष 2017 में 2385 करोड़ 42 लाख और वर्ष 2019 में 2003 करोड़ 55 लाख की ग्रैचुट्स रिलीफ के रूप में राशि लोगों के बीच वितरित की गई है. इस वर्ष अब तक 6 लाख 31 हजार 295 बाढ़ प्रभावित परिवारों के खाते में ग्रैचुट्स रिलीफ की 378 करोड़ 77 लाख की राशि ट्रांसफर कर दी गई है.

मुख्यमंत्री ने कहा कि 15वें वित्त आयोग की ओर से वर्ष 2020-21 के लिए स्टेट डिजास्टर रिस्क मैनेजमेंट फंड के लिए 1880 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है. इसमें 20 प्रतिशत स्टेट डिजास्टर मिटीगेशन फंड का प्रावधान है और 80 प्रतिशत स्टेट डिजास्टर रिस्पांस फंड में विभक्त किया गया है. इसके संबंध में अभी पूरी स्पष्टता नहीं है. इस स्टेट डिजास्टर मिटीगेशन फंड को अलग करने की जरूरत नहीं है.

उन्होंने कहा कि स्टेट डिजास्टर रिस्क फंड में 75 प्रतिशत केंद्र का और 25 प्रतिशत राज्य की राशि का प्रावधान किया गया है. ग्रैचुट्स रिलीफ पर एक बार में 25 प्रतिशत राशि खर्च करने की अधिसीमा निर्धारित की गई है. इसे भी समाप्त किया जाना चाहिए. इससे प्राकृतिक आपदाओं के कारण प्रति वर्ष राज्य सरकार के खजाने पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ को काफी कम किया जा सकेगा. हमलोगों को ग्रैचुट्स रिलीफ में काफी खर्च करना पड़ता है.

उन्होंने कहा कि बाढ़ प्रभावितों को ग्रैचुट्स रिलीफ की राशि देने के साथ-साथ राज्य सरकार बांधों की मरम्मती और अन्य कामों के लिए खर्च करती है. किसानों को भी राहत दी जाती है. उन्होंने कहा कि वर्ष 2018 में भी रिलीफ फंड को लेकर प्रधानमंत्री जी से चर्चा हुई थी.

मुख्यमंत्री ने कहा कि गंगा नदी के कारण भी वर्ष 2016 में 13 जिले बाढ़ से प्रभावित हुए थे. फरक्का बराज से जल निकासी में अब ज्यादा समय लग जाता है, जिससे गंगा नदी का पानी ज्यादा दिनों तक ज्यादा क्षेत्रों में फैला रहता है. इस पर भी विचार करने की जरुरत है.

उन्होंने कहा, " भारत और बंगलादेश के बीच गंगा नदी को लेकर किए गए समझौते के अनुसार फरक्का बराज पर गंगा नदी का जलश्राव 1500 क्यूमेक सुनिश्चित करना पड़ता है. जबकि गंगा नदी से बिहार में मात्र 400 क्यूमेक जल प्राप्त होता है. शेष 1100 क्यूमेक जल गंगा नदी में बिहार के क्षेत्र से जाता है. इस प्रकार बिहार में गंगा नदी का जल होते हुए भी राज्य इसका उपयोग नहीं कर पाता है.

उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय नदी जोड़ो परियोजना के लिए 2 लाख हेक्टेयर का क्षेत्र लाभांवित होने का दायरा निर्धारित किया गया है. इसके तहत बिहार के कोसी-मेची नदी को राष्ट्रीय नदी जोड़ो परियोजना के अंतर्गत शामिल किया जाए, क्योंकि इससे 2 लाख 14 हजार हेक्टेयर क्षेत्र लाभांवित होगा. उन्होंने कहा कि नदी जोड़ने से बाढ़ की संभावना कम होगी और पानी का लोग ज्यादा उपयोग कर सकेंगे. नदियों को जोड़ने से बाढ़ नियंत्रण में भी सहूलियत होगी.

उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार की ओर से बाढ़ की स्थिति में एनडीआरएफ की टीम तत्काल उपलब्ध कराई जाती है. हेलीकॉप्टर भी उपलब्ध कराए जाते हैं, जिससे राहत पैकेट और अनाज वितरण में काफी सहूलियत होती है, क्योंकि कभी-कभी ज्यादा बाढ़ की स्थिति में नाव के माध्यम से राहत सामग्री पहुंचाना संभव नहीं हो पाता है. उन्होंने कहा कि अन्य जरुरी सहायता भी केंद्र के ओर से दी जाती रही है.

मुख्यमंत्री ने कहा कि एक तरफ हम सभी कोरोना जैसी आपदा से बचाव को लेकर लगातार काम कर रहे हैं तो दूसरी तरफ बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा से भी निपटने के लिए काम कर रहे हैं. बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में कोरोना संक्रमण की जांच पर विशेष जोर दिया जा रहा है.

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