भरत तिवारी केस सम्राट सरकार के लिए बना सिर दर्द! आरके सिंह बोले- 'निष्पक्ष जांच तभी संभव जब…'
Bharat Tiwari Encounter: आरके सिंह का कहना है कि इस मामले को जातीय रंग देने की कोशिश दुर्भाग्यपूर्ण है. जब कोई व्यक्ति हथियार छोड़कर पुलिस की गिरफ्त में आ चुका था, तो उसके बाद गोली क्यों चली?

भरत तिवारी एनकाउंटर (Bharat Tiwari Encounter) केस ऐसा लग रहा है कि सम्राट सरकार (Samrat Government) के लिए सिर दर्द बन गया है. मामला ठंडा होने का नाम नहीं ले रहा है. पूर्व केंद्रीय मंत्री और आरा के पूर्व सांसद आरके सिंह ने एक बार फिर प्रतिक्रिया दी है. शुक्रवार (03 जुलाई, 2026) को सोशल मीडिया पर उन्होंने अपना वीडियो पोस्ट किया और कहा कि पूरे मामले को जातीय रंग देने की कोशिश दुर्भाग्यपूर्ण है.
उन्होंने भरत तिवारी की मौत की जांच सीबीआई से कराने की मांग का समर्थन करते हुए कहा कि निष्पक्ष जांच तभी संभव है, जब जांच एजेंसी पुलिस से अलग हो. आरके सिंह ने कहा कि 17 जून को भरत तिवारी की मौत दिनदहाड़े हुई और पूरी घटना हजारों लोगों ने फेसबुक लाइव के जरिए देखी.
आरके सिंह ने कहा कि भरत तिवारी लंबे समय से समाजसेवा से जुड़े थे और बाढ़ से विस्थापित गरीब परिवारों के पुनर्वास की मांग उठा रहे थे. वह प्रशासन से मांग कर रहे थे कि जिन लोगों को पुनर्वास के लिए जमीन दी गई है, वहां पहले मिट्टी भराई कर उसे रहने योग्य बनाया जाए या फिर दूसरी जगह जमीन उपलब्ध कराई जाए. भरत तिवारी वर्षों से सामाजिक कार्यों में सक्रिय थे और कोविड महामारी के दौरान भी लोगों की मदद करते रहे.
भरत तिवारी की हत्या और जात पात। pic.twitter.com/uAN9V0L0tQ
— R. K. Singh (@RajKSinghIndia) July 3, 2026
हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि बाद के दिनों में उनके (भरत तिवारी) व्यवहार में कुछ असामान्यता दिखाई देने लगी थी और उन्होंने एक पिस्तौल खरीद ली थी, लेकिन प्रशासन ने स्वयं उन्हें भरोसा दिलाया था कि उनकी मांगों पर विचार किया जाएगा. उनसे हथियार छोड़कर आत्मसमर्पण करने की अपील की थी.
'हथियार फेंक दिया… फिर गोली क्यों चली?'
पूर्व केंद्रीय मंत्री ने दावा किया कि फेसबुक लाइव में यह स्पष्ट दिखा कि भरत तिवारी ने पुलिस की अपील पर पिस्तौल फेंक दी थी और आत्मसमर्पण कर दिया था. इसके बाद पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया था. उन्होंने कहा कि उस समय पुलिस अधिकारियों की ओर से भी यह जानकारी दी गई थी कि भरत को गिरफ्तार कर लिया गया है और मानसिक स्थिति ठीक नहीं होने के कारण इलाज के लिए अस्पताल ले जाया जा रहा है. आरके सिंह के अनुसार बाद में अचानक परिवार को सूचना मिली कि भरत की गोली मारकर हत्या कर दी गई है.
उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि जब कोई व्यक्ति हथियार छोड़कर पुलिस की गिरफ्त में आ चुका था, तो उसके बाद गोली चलाने की नौबत क्यों आई? यही कारण है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच जरूरी है.
आरके सिंह ने कहा कि राज्य सरकार ने इस मामले में एफआईआर दर्ज कराई और रिटायर्ड जज से न्यायिक जांच कराने का फैसला लिया, यह सकारात्मक कदम है, लेकिन केवल न्यायिक जांच पर्याप्त नहीं होगी. उन्होंने कहा कि किसी भी आपराधिक मामले में सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया इन्वेस्टिगेशन होती है. यदि जांच वही पुलिस करेगी जिस पर कार्रवाई के आरोप हैं तो निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है, इसलिए भरत तिवारी के परिजनों की सीबीआई जांच की मांग पूरी तरह उचित है.
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'जाति के नाम पर राजनीति करना बंद करें'
आरके सिंह ने सत्ता पक्ष के कुछ नेताओं पर निशाना साधते हुए कहा कि इस मामले को जातीय विवाद बनाने की कोशिश की जा रही है. कुछ लोग यह प्रचार कर रहे हैं कि मुख्यमंत्री एक विशेष जाति से आते हैं, इसलिए उन पर सवाल उठाए जा रहे हैं. उन्होंने कहा कि सरकार किसी जाति की नहीं होती, बल्कि पूरे समाज की होती है. ऐसे संवेदनशील मामले में जाति की राजनीति करना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है.
उन्होंने लोगों से अपील करते हुए कहा कि भरत तिवारी की जगह कोई भरत पासवान, भरत यादव, भरत कुशवाहा या किसी भी समाज का युवक हो सकता था. मुद्दा यह नहीं है कि मृतक किस जाति का था, बल्कि सवाल यह है कि यदि कोई व्यक्ति आत्मसमर्पण कर चुका था तो उसकी मौत कैसे हुई.
आरके सिंह ने अंत में कहा कि सरकार को चाहिए कि वह इस मामले को भटकाने के बजाय निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करे और दोषियों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई करे. उनके अनुसार यही भरत तिवारी के परिवार और पूरे समाज के प्रति न्याय होगा.
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