Explained: सद्दाम को चुपचाप दफनाया, गद्दाफी की कब्र गुमनाम... खामेनेई के जनाजे में क्यों उमड़ा जनसैलाब, फर्क क्या?
Ayatollah Khamenei Funreal: सद्दाम और गद्दाफी की मौत शासन का अंत था. सद्दाम को ईद के दिन फांसी दी और गद्दाफी की लाश को चार दिनों तक ठंडे कमरे में रखा. खामेनेई की मौत ईरानी शासन के लिए एक नई शुरुआत है.

जुलाई 2026 में पूरी दुनिया एक ऐसा नजारा देखा जिसने सबको चौंका दिया. ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में इतनी भीड़ उमड़ी कि ईरानी अधिकारियों को हवाई क्षेत्र बंद करने पड़े और सार्वजनिक छुट्टी का ऐलान करना पड़ा. ईरानी अधिकारियों के मुताबिक, 1.5-2 करोड़ लोग शामिल हुए. इसे इतिहास का सबसे बड़ा अंतिम संस्कार कहा जा रहा है. इसके बिल्कुल उलट जब 2006 में इराक के तानाशाह सद्दाम हुसैन को फांसी दी गई, तो उनके जनाजे में मुश्किल से करीब 100 लोग शामिल हुए. 2011 में लीबिा के मुअम्मर गद्दाफी की मौत के बाद तो हालात और भी अजीब थे क्योंकि उन्हें चुपके से रेगिस्तान में कहीं दफना दिया. आखिर इतना बड़ा फर्क क्यों?
फॉरेन एक्सपर्ट्स इसकी 4 बड़ी वजहें बताते हैं...
पहली वजह: सत्ता का स्वरूप 'तानाशाह' बनाम 'धार्मिक गुरु'
विदेश मामलों के जानकार और JNU के प्रोफेसर डॉ. राजन कुमार कहते हैं कि सद्दाम और गद्दाफी धर्मनिरपेक्ष तानाशाह थे. उनकी सत्ता सेना, दमन और वफादारी पर टिकी थी. उन्होंने खुद को राष्ट्र का नेता घोषित किया, लेकिन उनके पास कोई धार्मिक अधिकार नहीं था. सद्दाम ने इराक पर 24 साल (1979-2003) राज किया और गद्दाफी ने लीबिया पर 42 साल (1969-2011). हालांकि, जब वे गिरे, तो उनके साथ उनकी पूरी व्यवस्था ढह गई. उनके पीछे कोई धार्मिक विरासत नहीं बची, जिससे लोग जुड़ सकें.
राजन कुमार का कहना है, 'खामेनेई शिया इस्लाम के सर्वोच्च धार्मिक नेता थे. ईरान में 'विलायत-ए-फकीह' (धार्मिक विद्वान का शासन) की व्यवस्था है. यानी सर्वोच्च नेता सिर्फ राजनीतिक नेता नहीं, बल्कि धार्मिक मार्गदर्शक भी होता है. खामेनेई 37 साल (1989-2026) तक इस पद पर रहे. इस दौरान उन्होंने खुद को 'इमाम' और 'शहीदों का नेता' बताया. शिया मान्यता में किसी धार्मिक नेता के जनाजे में जाना एक धार्मिक कर्तव्य माना जाता है. इस वजह से जब खामेनेई मारे गए, तो लोगों के लिए यह सिर्फ एक राजनीतिक नेता को विदाई देने का मौका नहीं था. यह धार्मिक आस्था का मामला था.'
दूसरी वजह: मौत का तरीका 'अपमानजनक मौत' बनाम 'शहादत'
सद्दाम हुसैन: 30 दिसंबर 2006 को ईद-उल-अजहा के दिन उन्हें फांसी दी गई. यह एक बेहद अपमानजनक मौत थी. जल्लादों ने उनका मजाक उड़ाया और पूरी दुनिया ने फांसी का वीडियो देखा. सद्दाम का अंतिम संस्कार सुबह 4 बजे उनके पैतृक गांव अल-अवजा में बेहद गुपचुप तरीके से कर दिया गया. CNN के एक पत्रकार ने बताया कि करीब 100 लोग ही इस मौके पर मौजूद थे. बाद में हजारों लोग उनकी कब्र पर आए, लेकिन जनाजे में जनता को शामिल नहीं किया गया क्योंकि इससे सुन्नी विद्रोह को बढ़ावा मिलने का डर था.
मुअम्मर गद्दाफी: 20 अक्टूबर 2011 को सड़क पर मारे गए. विद्रोहियों ने उन्हें सीवर पाइप में छिपा हुआ पकड़ा, पीटा और फिर गोली मारकर मार डाला. गद्दाफी की लाश को चार दिनों तक मिसराता शहर के एक मार्केट के ठंडे कमरे में रखा गया, जहां हजारों लोग उन्हें देखने आए. जब बात दफनाने की आई, तो उन्हें खामोशी से रेगिस्तान में दफना दिया. किसी को नहीं बताया गया कि कब्र कहां है. इसका कारण यह था कि लीबिया पहले से ही पूर्वी और पश्चिमी गुटों में बंटा हुआ था और गद्दाफी की कब्र विवाद का केंद्र बन सकती थी.
अली खामेनेई: 28 फरवरी 2026 को अमेरिका-इजरायल के हवाई हमले में मारे गए यानी 'दुश्मन के हाथों शहादत'. ईरानी मीडिया ने उन्हें 'शहीद' का दर्जा दिया. शिया इस्लाम में शहीद की मौत सबसे सम्मानजनक मानी जाती है. शहीद के जनाजे में हिस्सा लेना 'बदला' से जुड़ने का सबसे बड़ा मौका होता है.
तीसरी वजह: राजनीतिक जरूरत 'वैधता साबित करने का मौका'
खामेनेई की मौत के समय ईरान बेहद नाजुक स्थिति में था:
- देश युद्ध की स्थिति में था.
- नए सर्वोच्च नेता मुज्तबा खामेनेई गंभीर रूप से घायल हैं और कहीं नजर नहीं आ रहे.
- ईरानी शासन पर आंतरिक कलह और अंतरराष्ट्रीय दबाव दोनों थे.
ऐसे में बड़े पैमाने पर अंतिम संस्कार का एक ही मकसद था, 'दुनिया को दिखाना कि शासन को अभी भी जनता का समर्थन है.' CNN ने लिखा कि इस जनाजे को ईरान के 'सत्तावादी धार्मिक शासन की आवाज पर उमड़ा जन सैलाब' के रूप में पेश किया गया. इस वजह से ईरानी अधिकारियों ने लोगों को आने के लिए राजी किया. इनके लिए मुफ्त आना-जाना, खाना और ठहरने का इंतजाम किया गया. स्कूल-दफ्तर बंद किए गए और 14,000 पत्रकारों को बुलाया गया.
विदेश मामलों के जानकार और JNU के रिटायर्ड प्रोफेसर डॉ. ए.के. पाशा कहते हैं कि सद्दाम की सत्ता को पहले ही उखाड़ फेंका जा चुका था. सद्दाम की फांसी अमेरिका की कठपुतली इराकी सरकार ने करवाई थी. उनके जनाजे को सार्वजनिक न करने का फैसला इसलिए था क्योंकि सुन्नी विद्रोह को बढ़ावा मिलने का डर था. वहीं, गद्दाफी के मामले में भी नाटो समर्थित विद्रोहियों ने उन्हें मारा. उनके जनाजे को सार्वजनिक करना देश के बंटवारे को और गहरा कर सकता था. इस वजह से उन्हें गुमनामी दफना दिया.
चौथी वजह: अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 'कूटनीतिक मौका' बनाम 'अलग-थलग करने की कोशिश'
खामेनेई के जनाजे में 100 से ज्यादा देशों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया. ईरान के लिए यह अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का एक बड़ा मौका था. युद्ध के बाद दुनिया को दिखाना कि ईरान अलग-थलग नहीं है.
सद्दाम के जनाजे में किसी भी बड़े देश का प्रतिनिधि नहीं आया, क्योंकि उन्हें अंतरराष्ट्रीय अपराधी माना जाता था. गद्दाफी के मामले में भी उनकी मौत के बाद अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने उन्हें स्वीकार नहीं किया. गद्दाफी की लाश को चार दिनों तक ठंडे कमरे में रखा गया, जो उनके लिए दुनिया की बेरुखी को दिखाता है.
























