इजरायल से यारी यूएस को पड़ी भारी, ईरान के दिए इन 5 जख्मों को ताउम्र नहीं भूल पाएंगे डोनाल्ड ट्रंप
अमेरिका- इजरायल की ईरान से महीनों चली जंग के कई मकसद थे लेकिन सबसे अहम था इस्लामी सत्ता को जड़ से उखाड़ फेंकना और तेहरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकना, ऐसे में अब डील को लेकर कई सवाल उठे रहे हैं.

अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध अब पूरी तरह खत्म हो गया है. शुक्रवार तक स्विट्जरलैंड के जिनेवा में इसे अंतिम रूप दिया जा सकता है. कई महीनों तक हुई इस जंग में अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान पर हमले किए. दोनों देशों का मकसद साफ था कि इस जंग के जरिए इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान की सैन्य ताकत तोड़कर उनका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह खत्म करना है.
करीब साढ़े तीन महीने बाद समझौते और युद्ध के नतीजों को देखने पर कई सवाल उठते हैं जैसे कि क्या अमेरिका अपने असली मकसद को हासिल कर पाया. विश्लेषकों का मानना है कि कई मोर्चों पर अमेरिका के ट्रंप प्रशासन को वो कामयाबी नहीं मिली, जिसकी नेतन्याहू और ट्रंप मिलकर उम्मीद कर रहे थे.
नहीं हुआ तख्तापलट
अमेरिका और इजरायल ने 28 फरवरी, 2026 को युद्ध की शुरुआत में ईरान में भीषण हवाई हमले किए. इन हमलों में ईरानी सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई समेत कई वरिष्ठ अधिकारियों की जान गई. ट्रंप प्रशासन को उम्मीद थी कि शीर्ष नेतृत्व खत्म होते ही पूरा सिस्टम बिखर जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. अब ये कहा जा रहा है कि इस्लामी सत्ता पहले से और ज्यादा मजबूत हुई है.
मिसाइल सिटी अभी भी सुरक्षित
ईरान जंग का सबसे बड़ा मकसद तेहरान की मिसाइल ताकत को भी खत्म करना था. अमेरिका और इजरायल का मानना था कि शुरुआती 900 हवाई हमले ईरान की मिसाइल क्षमता को नष्ट कर देंगे लेकिन ईरान की भूमिगत मिसाइल सिटी सुरक्षित है. ईरान ने अपने जवाबी हमलों में न सिर्फ इजरायल बल्कि इराक, कतर और खाड़ी क्षेत्र में कई ठिकानों को भी निशाना बनाया.
बिना डील ट्रंप नहीं खुलवा पाए होर्मुज
ट्रंप प्रशासन चाहता था कि दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा सप्लाई लाइन होर्मुज स्ट्रेट पूरी तरह सुरक्षित हो जाए लेकिन युद्ध शुरू होते ही ईरान ने होर्मुज को बंद कर दिया. इससे न सिर्फ वैश्विक बाजारों में घबराहट फैली बल्कि कच्चे तेल की कीमतें भी कई गुना बढ़ गईं. इसके बाद अमेरिका की ओर से नेवल ब्लॉकेड लगाया गया. आखिर में होर्मुज सैन्य कार्रवाई से नहीं बल्कि कूटनीतिक समझौते से खुलने जा रहा है.
मिडिल ईस्ट की रक्षा नहीं कर पाया अमेरिका
अमेरिका ने अपने सहयोगियों सऊदी अरब, यूएई, कुवैत और कतर समेत कई सहयोगियों को भरोसा दिलाया था कि यह अभियान उन्हें सुरक्षित बनाएगा लेकिन युद्ध शुरू होते ही ईरान ने जवाबी हमले शुरू कर दिए. कई महत्वपूर्ण ठिकाने निशाने पर आए. इसी के चलते पहली गल्फ देशों को एहसास हुआ कि अमेरिका उन्हें पूरी तरह सुरक्षित नहीं रख सकता.
परमाणु कार्यक्रम का क्या हुआ
ईरान पर अमेरिकी हमलों का सबसे बड़ा उद्देश्य यही था कि किसी भी हाल में तेहरान को परमाण हथियार बनाने से रोका जाए लेकिन युद्ध के दौरान ईरान ने अंतर्राष्ट्रीय निरीक्षण व्यवस्था पर सवाल उठाए. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ईरान के एनरिच्ड यूरेनियम का जरा सा हिस्सा भी अमेरिका को नहीं मिला. नई शांति प्रक्रिया में भी परमाणु मुद्दा अगले 60 दिनों की अलग बातचीत के लिए छोड़ दिया गया है.
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