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क्यों थी रूसी कम्युनिस्ट नेता जोसेफ स्टालिन की चीन के माओत्से तुंग के मल-मूत्र पर टेढ़ी नजर?

किसी का मल-मूत्र भी जासूसी के काम आ सकता है क्या आपने कभी इसकी कल्पना की है? लेकिन आज से 73 साल पहले ऐसा हकीकत में हुआ था जब कम्युनिस्ट दुनिया के दो सबसे शक्तिशाली नेताओं की मुलाकात हुई थी.

दिसंबर का यही महीना था जब चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के सबसे अहम नेता और यहां कम्युनिस्ट शासन की नींव रखने वाले माओत्से तुंग मॉस्को के सफर पर निकले थे. उस वक्त कम्युनिस्ट दुनिया में माओ और रूसी कम्युनिस्ट नेता जोसेफ स्टालिन की तूती बोलती थी. ये वो दौर था जब चीन की क्रांति के कामयाब होने के बाद माओ ने जनवादी गणतंत्र चीन बनाया था.

इसे लेकर वो खासे उत्साहित थे और उन्होंने रूस के ताकतवर कम्युनिस्ट नेता जोसेफ स्टालिन से मिलने का मन बनाया, लेकिन मॉस्को पहुंच कर उनकी ये खुशी काफूर हो गई जब उन्हें ये लगा कि उनकी जासूसी की जा रही है. मॉस्को में जहां उन्हें ठहराया गया था कई बार वो वहां दीवारों पर ये चिल्लाते दिखते थे," मैं यहां खाने और मल त्याग करने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण काम करने के लिए आया हूं."

यहां ये बात गौर करने वाली है कि जोसेफ स्टालिन को माओ जेडॉन्ग से कोई मतलब था तो वो था सिर्फ उनके खाने-पीने के बाद उनके शरीर से बाहर निकले अपशिष्ट पदार्थों से. आखिर स्टालिन  के लिए माओ की शरीर की ये गंदगी इतनी अजीज क्यों थी? 

जब स्टालिन से मिलने निकले माओ

दिसंबर 1949 में, माओ ने आखिरकार मॉस्को के सफर पर निकलने का फैसला किया. उन दिनों मॉस्को की  रिपोर्टिंग के लिए पुलित्जर पुरस्कार पाने वाले न्यूयॉर्क टाइम्स के हैरिसन सैलिसबरी ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा था कि चीन की क्रांति की कामयाबी पर स्टालिन ने चुप्पी साधी थी. माओ के मॉस्को आने से पहले की उनकी इस जीत पर रूसी अखबारों में कुछ खास नहीं दिखाई पड़ा था.

रूसी दैनिक अखबार कोस्मोल्स्काया प्राव्दा के पीछे के पेज पर छपे एक छोटे से अंश और अखबार इज़्वेस्टिया के अंदर के पेजों में कुछ पैराग्राफ को छोड़कर चीन शब्द मुश्किल से ही दिखाई दिया था. इससे साफ जाहिर था कि रूसी कम्युनिस्ट लीडर स्टालिन माओ से मुलाकात को लेकर खास उत्साहित नहीं रहे थे. उन्हें माओ की शख्सियत पर भी अधिक भरोसा नहीं था. यही वजह रही कि उन्होंने माओ की जासूसी का बेहद गुप्त और अनोखे तरीका अपनाया.

इसका सबूत माओ के मॉस्को जाने के सफर के रास्ते में ही मिल गया कि सोवियत संघ उनका बांहें फैलाए इंतजार नहीं कर रहा है. ये मौका था स्टालिन के 70वें जन्मदिन का और ये कम्युनिस्ट दुनिया में जश्न का एक ऐसा महान पल था जिसकी किसी अन्य घटना और शख्स से तुलना नहीं की जा सकती थी.

6 दिसंबर 1949  को माओ ट्रेन से सोवियत राजधानी मॉस्को  के लिए निकले. उनके देश में युद्ध मुश्किल से खत्म हुआ था और वह राष्ट्रवादी असंतुष्टों के हमलों से डरे हुए थे. इस वजह से उनके इस सफर का आगाज एक बख्तरबंद कोच से हुआ.  पटरियों के किनारे हर सौ मीटर पर संतरी तैनात थे. चीन के पूर्वोत्तर के सबसे बड़े शहर शेनयांग में माओ यह देखने के लिए उतरे कि कहीं उनके पोस्टर तो वहां नहीं लगें. उनके पोस्टर वहां बेहद कम थे, लेकिन स्टालिन के पोस्टर बहुत सारे थे.

ये गाओ गैंग का काम था जो माओ से असंतुष्ट रहता था, लेकिन सोवियत संघ का समर्थन करता था. इससे माओ नाराज हो गए और उन्होंने आनन-फानन में चीनी साम्यवादी दल के नेता गाओ की तरफ से स्टालिन के लिए तोहफा ले जा रहे कोच को ट्रेन से अलग कर देने का फरमान सुनाया.  कोच के सारे तोहफे वापस गाओ को भेज दिए गए.

नहीं हुआ मॉस्को में स्वागत

16 दिसंबर को माओ ने मॉस्को की जमीं पर कदम रखा, लेकिन ये उनके लिए नाखुशी का मौका साबित हुआ उन्हें कम्युनिस्ट दुनिया के महान राष्ट्रों में से एक शानदार क्रांति लाने वाले नेता के तौर पर इज्जत नहीं बख्शी गई. पत्रकार और इतिहासकार डेविड हालबेस्टॉम की किताब "द कोल्डेस्ट विंटर" में इतिहासकार एडम उलम के हवाले से लिखा है कि पोलित ब्यूरो के सीनियर सदस्य बुल्गेरियाई पार्टी के चीफ वीएम मोलोतोव और निकोलाई बुलगनिन उनसे मिलने के लिए स्टेशन आए.

उनके लिए माओ ने एक शानदार लंच बफे रखा था माओ ने उन्हें खुद के साथ ड्रिंक करने के लिए कहा. लेकिन दोनों सोवियत नेताओं ने प्रोटोकॉल का हवाला देते हुए  माओ के साथ ड्रिंक ही नहीं बल्कि  लंच करने से भी मना कर दिया. इसके बाद माओ ने दोनों सोवियत नेताओं से मॉस्को में अपने रहने की जगह पर चलने को कहा, लेकिन दोनों ने इसके लिए भी मना कर दिया. माओ के स्वागत में वहां कोई जश्न या बड़ी पार्टी भी नहीं रखी गई थी.

यह ऐसा ही था जैसे माओ को अब वास्तविक कम्युनिस्ट ब्रह्मांड में स्टालिन के  तारामंडल में उनकी जगह बताई गई हो. यदि  कम्युनिस्ट भाईचारे के नाते वो स्टालिन के भाई थे तो उन्हे पता होना चाहिए कि हमेशा एक साम्यवादी भाई होगा और अन्य सभी के मुकाबले वो रुतबा में सबसे बड़ा होगा.

सोवियत संघ के अहम नेता निकिता ख्रुश्चेव के एक सहयोगी ने तब अपने बॉस से कहा था कि "मत्सडून" नाम का कोई शहर में है. जब  हैरान ख्रुश्चेव ने पूछा  "कौन?" तो सहयोगी ने जवाब दिया कि आप उस चाइनामैन को जानते हैं. इस तरह से रूसी कम्युनिस्ट नेताओं ने माओ को एक आम चीनी का ही दर्जा दिया.

इससे बड़ी बेइज्जती क्या होगी कि चीनी प्रतिनिधिमंडल के लिए मुख्य स्वागत क्रेमलिन के मुख्य हॉल में नहीं बल्कि पुराने मेट्रोपोल होटेल में किया गया था. ये मॉस्को में  एक ऐसी जगह थी जो आमतौर पर मामूली पूंजीवादी गणमान्य लोगों के मनोरंजन के लिए इस्तेमाल में लाई जाती थी. इस पहले रिसेप्शन के बाद हालात बेहतर नहीं हुए.

कई दिनों तक माओ अलग-थलग पड़े रहे और स्टालिन से मिलने का इंतज़ार करते रहे. ये भी ताकीद की गई कि स्टालिन से मिलने तक कोई और उनसे नहीं मिल सकता था और स्टालिन अपना वक्त ले रहे थे. जब माओ पहली बार मॉस्को पहुंचे तो उन्होंने ऐलान किया था कि चीन रूस के साथ साझेदारी की उम्मीद करता है, लेकिन उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि वो  मॉस्को से खुद के लिए स्टालिन के समकक्ष वाला व्यवहार चाहते हैं. इसके उलट जैसे उन्हें वहां एक नया सबक सिखाया जा रहा था.

मेहमान बना कैदी

माओ मॉस्को में मेहमान तो थे, लेकिन उनकी हालत किसी कैदी से कम नहीं थी.  एक दिन उनसे संपर्क करने वाला रूसी कारिंदा कोवालेव उनसे मिलने आया. तब माओ ने उसे इशारे में  मॉस्को से  बाहर जाना की इच्छा बताई और  "बुरा, बुरा!" कहा. जब कोवालेव ने उनसे इस व्यवहार का मतलब पूछा तो माओ ने कहा कि वह क्रेमलिन पर नाराज है. तब कोवालेव ने जोर देकर कहा कि माओ को उनके "बॉस" की बुराई करने का कोई हक नहीं है और उन्हें इसकी रिपोर्ट करनी होगी.

उनकी ऐसी हालात हो गई कि वो दीवारों पर चिल्लाने लगे थे. उन्हें यकीन था कि  जिस घर में वो रहे रहे हैं उसमें स्टालिन ने उनकी जासूसी के पुख्ता इंतजाम कर रखे हैं. वह कहते थे कि मैं यहां केवल  खाना खाने और उसके बाद शरीर से गंदगी बाहर निकालने के नहीं बल्कि इससे भी बड़े काम के लिए आया हूं. माओ रूसी खाने से नफरत करते थे. दरअसल 10 दिनों में वहां बेहद अधिक मात्रा में माओ के खाने-पीने के बेहतरीन इंतजाम किए गए थे. इसके पीछे की वजह थी कि उनके मल-मूत्र को तुरंत जांच के लिए उठा लिया जाता था और ये जांच माओ की जासूसी का तरीका था, लेकिन शरीर का अपशिष्ट ही क्यों? इसके बारे में आगे बात करते हैं. 

मल-मूत्र बक्सों में होता था जमा

रूसी अखबारों ने खुलासा किया था कि 1940 में स्टालिन की सीक्रेट पुलिस ने लोगों के मल- मूत्र की जांच के लिए एक खास विभाग बनाया था. इसका मकसद विदेशी नेताओं के अपशिष्ट के जरिए उनकी शख्सियत का पता लगाना था. ये मल-मूत्र के जरिए की जाने वाली सीक्रेट तरीके की जासूसी थी. हालांकि जासूसी का ये तरीका बेहद महंगा था. पूर्व सोवियत एजेंट इगोर अटामानेनको ने एक रूसी अखबार में इसका खुलासा किया था.

अटामानेनको ने दावा किया था कि उन्हें अपने शोध में इस बात के पुख्ता सबूत मिले हैं कि जोसेफ स्टालिन ने माओत्से तुंग के मल-मूत्र की जांच से उनकी जासूसी की थी. मल-मूत्र की इस जांच से स्टालिन को माओ की मनोवैज्ञानिक शख्सियत आंकने में आसानी हुई थी. स्टालिन ने बकायदा इसके लिए एक सीक्रेट लैब्रोटरी बनाई थी.

स्टालिन के वफादार माने जाने वाले लावरेंटी बेरिया इसके चीफ बनाए गए थे. अटामानेनको के मुताबिक उस दौर में रूस में ख़ुफ़िया विभाग के पास जासूसी के लिए सुनने और वीडियो बनाने आज जैसे अत्याधुनिक उपकरण नहीं थे. इस वजह से इसमें विशेषज्ञ और वैज्ञानिकों  की मदद ली जाती थी. उस वक्त जासूसी के लिए महंगे से महंगे तरीके अपनाने से भी गुरेज नहीं किया जाता था.

बीबीसी से बातचीत में अटामानेनको ने बताया कि मल के जरिए रूसी खुफिया विभाग कैसे जासूसी को अंजाम देता था. मल-मूत्र में पाए जाने वाले एसिड जैसी चीजों के जरिए किसी भी शख्स की साइकोलॉजिकल प्रोफाइल तैयार की जाती थी. जैसे किसी के मल में एमीनो एसिड ट्रिप्टोफैन अधिक मात्रा में होता तो उससे अंदाजा लगाया जा सकता था कि वो शख्स शांत और मिलनसार रवैये वाला होगा.

शरीर में सेरोटोनिन हार्मोन बनाने में मदद करने वाला अमीनो एसिड को मूड सही करने और मानसिक सेहत के लिए फायदेमंद माना जाता है. इंसान के मल में पोटैशियम की कम मात्रा को घबराहट वाले स्वभाव और  नींद न आने की बीमारी इंसोमेनिया का संकेत माना जाता है.  दिसंबर 1949 में चीनी साम्यवादी नेता माओ त्से तुंग के मॉस्को दौरे के दौरान रूसी जासूसों ने उनकी शख्सियत का पता लगाने के लिए इस तरीके का इस्तेमाल किया था.

इसके लिए माओ के टॉयलेट को सीवर की जगह एक सीक्रेट बक्से से जोड़ा गया था. उनके मल-मूत्र करते ही तुंरत ये स्टालिन की बनाई खास लेबोरेटरी में जांच के लिए ले जाया जाता था. यहां ये बात गौर करने लायक है कि माओ के  मल-मूत्र की जांच के बाद ही स्टालिन उनके साथ समझौते पर हामी भरी थी और उस पर साइन किए थे.  रूस के सबसे मशहूर दैनिक अखबार  कोस्मोल्स्काया प्राव्दा की रिपोर्ट के मुताबिक स्टालिन के उत्तराधिकारी निकिता ख्रुश्चेव ने इस प्रोजेक्ट को रद्द कर दिया और लेबोरेटरी को बंद कर दिया था.

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