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Afghanistan Crisis: वो चेहरे जो तालिबानी गुटों की अगुवाई करेंगे, ये ही होंगे सत्ता का नया केंद्र

अफगानिस्तान के भविष्य से जुड़े हर सवाल पर नजरें मौजूदा तालिबानी नेतृत्व पर टिकी हैं. नजर डालते हैं उन चेहरों पर जो तालिबानी गुटों की अगुवाई करते हैं और आने वाले दिनों में सत्ता का नया केंद्र होंगे.

Afghanistan Crisis: अफगानिस्तान में इतिहास की सुई एक बार फिर 20 साल पहले के सत्ता समीकरणों पर खड़ी नजर आ रही है. यानी अमेरिका पर 9/11 के आतंकी हमले से पहले के हालात की तरह, जब काबुल पर तालिबानी कब्जा था. दो दशक बाद एक बार फिर काबुल के किले पर तालिबानी परचम लहरा रहा है.

बीते लंबे वक्त से लड़खड़ाते हुए चल रही अफगानिस्तान गणराज्य की सरकार महज कुछ ही घंटों के भीतर भरभराकर धराशायी हो गई. वहीं इस्लामिक अमीरात बनाने का नारा लेकर चले तालिबानी लड़ाकों ने अफगानिस्तान के लगभग हर अहम इलाके को कब्जा लिया है.

मौजूदा तालिबानी नेतृत्व पर टिका अफगानिस्तान का भविष्य

ऐसे में अब यह साफ है कि अफगानिस्तान में अब एक बार फिर तालिबान का राज होने जा रहा है. तालिबानी ताकत वाली नई सरकार कैसी होगी इसका औपचारिक ऐलान होना अभी बाकी है. मगर इतना जरूर है कि ऐसे में अफगानिस्तान के भविष्य से जुड़े हर सवाल पर नजरें मौजूदा तालिबानी नेतृत्व पर टिकी हैं. जरा नजर डालते हैं उन चेहरों पर जो तालिबानी गुटों की अगुवाई करते हैं और आने वाले दिनों में सत्ता का नया केंद्र साबित होंगे.

हैबतुल्लाह अखुनज़ादा

मौलवी और तालिबानी अदालतों में लंबे वक्त तक जज रहे हैबतुल्लाह अखुनजादा के हाथों में तालिबान की कमान करीब 5 साल पहले आई. मई 2016 में तत्कालीन नेता  मुल्ला मंसूर अख्तर के अमेरिकी ड्रोन हमले में मारे जाने के बाद पूर्व इस्लामिक उपदेशक हैबतुल्लाह को सुप्रीम लीडर चुना गया. तालिबान के विभिन्न धड़ों को एक करने में हैबतुल्लाह की भूमिका अहम मानी जाती है. तालिबान की अगुवाई संभालने से पहले उनकी भूमिका अधिकतर एक धार्मिक उपदेशक मौलवी की थी. वहीं जज के तौर पर हैबतुल्लाह की अदालतों में तालिबानी कानूनों के कई सख्त फैसले सुनाए गए.

मुल्ला अब्दुल गनी बिरादर

तालिबान के राजनीतिक विंग का मुखिया और अब अफगानिस्तान की अंतरिम सरकार में राष्ट्रपति पद का चेहरा. तालिबान का गढ़ कहलाने वाले अफगानिस्तान के कंधार इलाके से आने वाला  बिरादर सोवियत सेना के खिलाफ लड़ने वाले मुजाहिदीन में शामिल था. बिरादर न केवल तालिबान मूवमेंट के संस्थापक मुल्ला उमर का करीबी सहयोगी रहा बल्कि इसकी लंबे वक्त से तालिबान के फैसलें में अहम भूमिका निभाता चला आया. दोहा में अमेरिका के साथ हुए शांति समझौते में भी मुल्ला बिरादर ने ही दस्तखत किए थे.

मुल्ला याकूब

तालिबान का जनक कहलाने वाले मुल्ला उमर का बेटा और लड़ाका दस्तों का मुखिया. मुल्ला याकूब फील्ड कमांडर है जिसके मातहत विभिन्न तालिबानी दस्ते काम करते हैं. लड़ाई की रणनीतिक औऱ जमीनी स्तर पर तालिबानी लड़ाकों का रुख नियंत्रित करने में याकूब की अहम भूमिका है. 

सिराजुद्दीन हक्कानी

सोवियत सेनाओं के खिलाफ लड़ने वाले मुजाहीदीन नेता जलालुद्दीन हक्कानी का बेटा और तालिबानी संगठन हक्कानी नेटवर्क का मुखिया है सिराजुद्दीन हक्कानी. पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के साथ करीबी रिश्ते रखने वाले हक्कानी नेटवर्क को सबसे दुर्दांत आतंकी संगठन माना जाता है. सिराजुद्दीन के हक्कानी नेटवर्क ने अफगानिस्तान में कई आतंकी घटनाओं और आत्मघाती हमलों को अंजाम दिया.

मुल्ला अब्दुल हकीम

तालिबान में कानून संबंधी मामलों का जानकार और जज है मुल्ला अब्दुल हकीम. अफगान शांति वार्ताओं में मुख्य वार्ताकार रहा हकीम एक सख्त और कट्टरपंथी नेता माना जाता है. तालिबान में सर्वोच्च निर्णय संस्था है रहबरी काउंसिल जिसमें 26 सदस्य हैं.

तालिबान पर दबाव के कारण

तालिबान जब 1996 में पिछली बार सत्ता में आए तो अफगानिस्तान पहले से एक राजनीतिक उथल-पुथल में गुजर रहा था. विकास के लिहाज से मौजूदा अफगानिस्तान के मुकाबले कहीं ज्यादा पीछे था. साथ ही तालिबान को सत्ता में काबिज होने के बावजूद महज तीन देशों से ही सत्ता की मान्यता हासिल हो सकी. हालांकि उम्मीद की जा रही है कि इस बार तालिबान की कोशिश अपने आप को अफगानिस्तान का सही और सच्चा राजनीतिक प्रतिनिधि दिखाने की होगी. इसके लिए उसपर अंतरराष्ट्रीय बिरादरी पर कामकाजी संपर्क बनाकर ऱखने का होगा. ऐसा न करने पर उसकी पाकिस्तान जैसे मुल्कों पर निर्भरता बहुत अधिक होगी. साथ ही तालिबान के लिए अफगानिस्तान को अपने नियंत्रण में रखना बेहद मुश्किल होगा.

इतना ही नहीं, अफगानिस्तान के तालिबानी निज़ाम पर भी देश के भीतर और बाहर से अबकी बार दबाव अधिक होगा. वहीं पश्तून बहुल तालिबान के सामने अफगान समाज में ताजिक, हजारा, उज़बेक मूल के लोगों को साथ लेने की भी चुनौती होगी. यदि ऐसा नहीं हुआ तो अफ़ग़ानिस्तान पर एक और लंबे गृहयुद्ध का खतरा बरकरा है ही.

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