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Israel-Iran War: बीवी का...दीदी का...बाप का सबका बदला लेगा मुज्तबा?

1979 में हुई इस्लामिक क्रांति के बाद पहले अयातुल्लाह रोहेल्ला खमेनेई और फिर अयातुल्लाह अली खमेनेई के बाद मुज्तबा खमेनेई तीसरे ऐसे शख्स हैं, जो ईरान के सुप्रीम लीडर बने हैं.

मुज्तबा खमेनेई अब ईरान के सुप्रीम लीडर हैं और ईरान के एक्सपर्ट एसेंबली के कुल 88 लोगों ने मिलकर मुज्तबा को इसलिए अपना सुप्रीम लीडर चुना है, ताकि मुज्तबा अपनी बीवी का, अपनी दीदी का, अपने बाप का और ईरान का सबका बदला एक साथ ले सकें. क्या मुज्तबा अपने मकसद में कामयाब हो पाएंगे? क्या ट्रंप या फिर नेतन्याहू मुज्तबा के नाम पर राजी होंगे और उससे भी बड़ा सवाल कि क्या ईरान के लोग ही मुज्तबा को अपना सुप्रीम लीडर मानने को तैयार होंगे?

आखिर मुज्तबा में ऐसा क्या खास है कि वही सुप्रीम लीडर बने और आखिर मुज्तबा में ऐसी कौन सी कमी है कि सुप्रीम लीडर बनाने के बाद भी ईरान की एक्पर्ट एसेंबली को अपने ही लोगों के सामने गिड़गिड़ाना पड़ रहा है कि वो मुज्तबा को लीडर मानें. आखिर अयातुल्लाह अली खमेनेई का बेटा होने के अलावा मुज्तबा के पास वो कौन सी खूबी है कि अमेरिका और इजरायल, दोनों के बीच पिस रहे ईरान को अपने रहनुमा के तौर पर मुज्तबा को ही सामने लाना पड़ा, आज बात करेंगे विस्तार से. आज क्लियर कट बात होगी मुज्तबा अली खमेनेई की, जिन्होंने ईरान का सुप्रीम लीडर बनने के बाद से ही अमेरिका और इजरायल की नाक में दम कर दिया है.

1979 में हुई इस्लामिक क्रांति के बाद पहले अयातु्ल्लाह रोहेल्ला खमेनेई और फिर अयातुल्लाह अली खमेनेई के बाद मुज्तबा खमेनेई तीसरे ऐसे शख्स हैं, जो ईरान के सुप्रीम लीडर बने हैं. और ईरान के सुप्रीम लीडर का मतलब ये है कि ईरान की ओर से हुए हर फैसले पर आखिरी मुहर सुप्रीम लीडर की ही होगी. लेकिन उससे पहले ये भी जानना जरूरी है कि अयातुल्लाह अली खमेनेई के छोटे बेटे होने के अलावा भी मुज्तबा खमेनेई की एक अलग पहचान है, जो भले ही सार्वजनिक न हो, लेकिन दबी-छिपी जुबान से उन्हें ईरान में पहले से भी ताकतवर माना जाता रहा है.

मुज्तबा, एक खूंखार लड़ाका
मुज्तबा खमेनेई ने 17 साल की उम्र में ही ईरान की सबसे एलीट फोर्स आईआरजीसी जॉइन की थी. 1987 में मुज्तबा आईआरजीसी की हबीब-बिन-मुजाहिर बटालियन का हिस्सा बन गए थे. 80 के दशक में जब इराक और ईरान के बीच जंग चल रही थी तो मुज्तबा उस जंग में ईरान के कई बड़े ऑपरेशन का हिस्सा बने थे. वो बात चाहे ऑपरेशन बेत-उल-मुकद्दस की हो या फिर ऑपरेशन डॉन या फिर ऑपरेशन मरसद की, मुज्तबा सबमें शामिल रहे थे. इस जंग के खत्म होने के बाद भी मुज्तबा के साथ के लड़ाके आईआरजीसी में बड़े-बड़े रैंक पर पहुंचते रहे, ईरान की अलग-अलग सुरक्षा एजेंसियों के मुखिया बनते रहे और पहले ईरान के राष्ट्रपति के बेटे और फिर ईरान के सुप्रीम लीडर के बेटे होने के नाते मुज्तबा के साथ उनके पुराने सभी साथियों ने नजदीकी संबंध कायम रखे. यही वजह है कि मुज्तबा का आईआरजीसी में रुतबा पहले से ही बड़ा हो गया था.

मुज्तबा, एक नाकाबिल मुफ्ती
मुज्तबा भले ही ईरान के सुप्रीम लीडर बन गए हैं, लेकिन ईरान के संविधान के मुताबिक उनके पास सुप्रीम लीडर बनने की कोई काबिलियत न तो पहले थी और न ही अब है. दरअसल ईरान का संविधान कहता है कि ईरान का सुप्रीम लीडर बनने वाले की न्यूनतम योग्यता उसका अयातुल्ला होना है. क्योंकि इस्लाम में अयातुल्ला ही ऐसा शख्स होता है, जो इस्लाम की व्याख्या कर सकता है, शरिया की व्याख्या कर सकता है और धार्मिक मसले पर उसकी दी गई राय को अंतिम राय माना जाता है. वैसे तो मुज्तबा के पिता अली खमेनेई भी अयातुल्ला नहीं थे, लेकिन  रोहेल्ला खमेनेई की मौत के बाद अली खमेनेई के सुप्रीम लीडर चुने जाने के बाद उन्हें भी अयातुल्ला कहा जाने लगा. उन्हीं के वक्त में संविधान में बदलाव कर तय कर दिया गया कि सु्प्रीम लीडर के लिए ग्रैंड अयातुल्ला होना जरूरी नहीं है. अब मुज्तबा के साथ भी यही हो रहा है. पिता अली खमेनेई के पद संभालने के बाद ईरान के लोग उन्हें अयातुल्ला मान गए, लेकिन मुज्तबा अब भी सिर्फ हुज्जत-उल-इस्लाम हैं. यानी कि मीडियम लेवल के मुफ्ती, लिहाजा सुप्रीम लीडर के तौर पर उनका चुनाव ईरान के लोगों को ही रास नहीं आ रहा है. और लोग उन्हें अयातुल्ला मानने को राजी नहीं हैं. यही वजह है कि मुज्तबा को सुप्रीम लीडर चुनने वाली 88 लोगों की एक्सपर्ट एसेंबली भी ईरान के प्रभावशाली लोगों से अपील कर रही है कि जंग के दौरान पूरा ईरान मुज्तबा का साथ दे, ताकि वो अमेरिका और इजरायल के खिलाफ जंग लड़ सकें.

मुज्तबा, एक अरबपति कारोबारी
ईरान के सु्प्रीम लीडर बनने के बाद भी मुज्तबा की पहचान एक मुफ्ती से ज्यादा एक अरबपति कारोबारी के तौर पर रही है. भले ही मुज्तबा की कुल संपत्ति के बारे में कोई आधिकारिक आंकड़ा मौजूद न हो, लेकिन माना जाता है कि मुज्तबा के पास 25 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की संपत्ति है. ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट कहती है कि लंदन के बिलियनेयर्स रो यानी कि बिशप्स एवेन्यू में उनके पास करीब 1100 करोड़ रुपये से ज्यादा की हवेली और अचल संपत्ति है. जर्मनी, स्पेन और फ्रांस में उनके कई लग्जरी होटल और इमारतें होने का दावा किया गया है, जिनकी कुल अनुमानित कीमत करीब 4 हजार करोड़ रुपये है. दुबई के महंगे एमिरेट्स हिल्स में मुज्तबा का एक बंगला है. अलावा, सीरिया, वेनेजुएला और कुछ अफ्रीकी देशों के बैंकों में भी मुज्तबा ने पैसा जमा कर रखा है. ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट कहती है कि मुज्तबा के रिश्ते अयानदे बैंक वाले अली अंसारी से भी रहे हैं. ये बैंक अब भले ही बैंक मेली ईरान के साथ मर्ज हो चुका है, लेकिन इस बैंक में मुज्तबा के अरबों डॉलर जमा थे. हालांकि ये सब रिपोर्ट्स का हिस्सा हैं, आधिकारिक तौर पर मुज्तबा के पास संपत्ति है ही नहीं.

मुज्तबा, एक कट्टरपंथी शासक
मुज्तबा खमेनेई को अली खमेनेई से भी ज्यादा कट्टरपंथी शासक माना जा रहा है. अली खमेनेई ने ईरान की सत्ता संभालने के बाद विरोधी गुटों के साथ भी संतुलन बनाने की कोशिश की थी. लेकिन मुज्तबा का इतिहास क्रूरता से भरा रहा है. मुज्तबा पहले से ही आईआरजीसी में रहे हैं तो उनके पास अपनी एक फौज है, जो किसी भी विद्रोह को कुचलती रही है. ईरान का जो अर्धसैनिक बल है बसीज, उसमें भी शीर्ष पदों पर मुज्तबा के ही पुराने दोस्त-मित्र भरे पड़े हैं, जिनसे मुज्तबा अपने मन मुताबिक काम करवाते रहे हैं.

साल 2009 में जब ईरान में चुनाव विरोधी प्रदर्शन हुए और उसे ग्रीन मूवमेंट नाम दिया गया तो ईरान की सत्ता ने उसे कुचल दिया था. तब भले ही मुज्तबा के पास कोई पद नहीं था, लेकिन आज भी ईरान के लोग मानते हैं कि लोगों पर जो जुल्म हुआ, उसका आदेश मुज्तबा ने ही दिया था. सितंबर 2022 में महसा अमीनी वाले मामले को भी दबाने के जिम्मेदार मोतजबा ही हैं. हिजाब न पहनने पर जब महसा अमीनी को गिरफ्तार किया गया और 'गश्त-ए-इरशाद' ने जब उन्हें पीटकर मार डाला तो पूरे ईरान में प्रदर्शन हुए. तब ईरान में इंटरनेट बंद हुआ, सीसीटीवी और एआई के जरिए लोगों की गिरफ्तारी हुई. ईरान की सेना, आईआरजीसी और बसिज को उस आंदोलन को कुचलने के लिए हर तरह की छूट दे दी गई थी. और ये सब मुज्तबा के ही इशारे पर हुआ था, क्योंकि उनके पिता अली खमेनेई ही तब ईरान के सुप्रीम लीडर थे. तब आंदोलनकारी एक नारा लगाते थे, कहते थे-

मुज्तबा, बेमीर ओ रहबरी रा नबीनी

यानी कि मुज्तबा, तुम मर जाओ लेकिन कभी सुप्रीम लीडर मत बनो. हालांकि ऐसा हुआ नहीं. अली खमेनेई की मौत के बाद अब मुज्तबा ही ईरान के सुप्रीम लीडर हैं तो डर इस बात का भी है कि जंग खत्म होने के बाद ईरान में कट्टरता और भी बढ़ जाएगी.

मुज्तबा, जो मर जाएगा, सरेंडर नहीं करेगा

अली खमेनेई मुज्तबा की तुलना में थोडे़ नरम रुख वाले थे, तो उन्होंने भी अमेरिका या इजरायल के सामने घुटने नहीं टेके. ऐसे में मुज्तबा को लेकर भी विशेषज्ञों की यही राय है कि मुज्तबा भले ही अमेरिका या इजरायल के हाथों मारा जाए, लेकिन वो घुटने नहीं टेकेगा. और अगर इस जंग के खात्मे के बाद भी मुज्तबा जिंदा रह गया तो फिर ईरान को परमाणु हथियार बनाने से कोई रोक भी नहीं पाएगा.

ये सब तब होगा, जब इजरायल या अमेरिका इस जंग को खत्म करने के लिए राजी हो. ट्रंप हों या नेतन्याहू पहले तो उन्होंने मुज्तबा को एक कमजोर प्रशासक के तौर पर देखा. लेकिन अब जब मुज्तबा के नेतृत्व में ईरान अपने हमले तेज कर रहा है तो शायद ट्रंप या नेतन्याहू को इस जंग के बारे में फिर से सोचना होगा. अगर बिना कुछ हासिल हुए अमेरिका इस जंग को खत्म करता है तो जीत ईरान की होगी और मोतजबा के नेतृत्व पर मुहर लग जाएगी लेकिव अगर मुज्तबा ही इस जंग को लंबा खींचना चाहते हैं तो फिर इस जंग का अंजाम ही मुज्तबा का मुस्तकबिल भी तय करेगा.

अविनाश राय एबीपी लाइव में प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं. अविनाश ने पत्रकारिता में आईआईएमसी से डिप्लोमा किया है और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ग्रैजुएट हैं. अविनाश फिलहाल एबीपी लाइव में ओरिजिनल वीडियो प्रोड्यूसर हैं. राजनीति में अविनाश की रुचि है और इन मुद्दों पर डिजिटल प्लेटफार्म के लिए वीडियो कंटेंट लिखते और प्रोड्यूस करते रहते हैं.

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