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Nuclear War: कौन था पाकिस्तान को परमाणु बम देने वाला भोपाली परिवार का बेटा, 16 दिन में यूरोप के सीक्रेट मिशन से चुराया फॉर्मूला

अब्दुल कादिर खान यूरोप में रहकर FDO के लिए काम करते थे, जो URENCO की सलाहकार संस्था थी. URENCO का प्लांट हॉलैंड के अलमेला में था, जहां कादिर खान ने 16 दिन बिताए.

जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए बर्बर आतंकी हमले के बाद भारत ने कुछ ऐसे कठोर कदम उठाए हैं, जिससे पाकिस्तान बौखलाया हुआ है. पाकिस्तान के मंत्रियों के आए दिन जो बयान सामने आ रहे हैं, उसमें उनकी बौखलाहट साफ नजर आती है. पाकिस्तानी मंत्री न्यूक्लियर वॉर की धमकियां भी दे चुके हैं. हालांकि, न्यूक्लियर पावर के मामले में पाकिस्तान भारत से इतना पीछे है कि अगर वो ऐसी-वैसी कोई हरकत करता है और भारत ने उसका जवाब दिया तो पाकिस्तान का वो हश्र होगा जिसकी उसने कल्पना भी नहीं की होगी.

पाकिस्तान को परमाणु शक्ति बनाने वाले शख्स का जन्म भारत में ही हुआ था, जिनका नाम है अब्दुल कादिर खान. अब्दुल कादिर खान के नेतृत्व में साल 1976 में पाकिस्तान का परमाणु हथियार कार्यक्रम शुरू किया गया था. कादिर खान का जन्म साल 1935 में ब्रिटिश काल में भोपाल में हुआ था, लेकिन बंटवारे के समय वह भारत छोड़कर पाकिस्तान चले गए. कादिर खान एक देशभक्त परिवार से ताल्लुक रखते थे. उनके पिता टीचर थे, जबकि दादा और परदादा सेना में अधिकारी थे. खान अक्सर कहा करते थे, 'सभी उसको लात मारते हैं, जिसका कोई अपना देश नहीं होता. हमें अपनी जान को सुरक्षित करने से ज्यादा इस देश को सुरक्षित करना है.'

16 दिन URENCO के सीक्रेट एरिया में रहे
कादिर खान ने यूरोप में 16 दिन रहकर परमाणु बम बनाने का फॉर्मूला चुराया, उसे लेकर पाकिस्तान पहुंचे और फिर यहां न्यूक्लियर बॉम्ब बनाया. उन पर चोरी के आरोप भी लगे और वेस्टर्न मीडिया उन्हें सुपरस्पाई कहकर संबोधित करती थी, लेकिन वह खुद को पक्का देशभक्त बताते थे. पाकिस्तान का परमाणु हथियार कार्यक्रम साल 1976 में शुरू हआ, जिसको अब्दुल कादिर खान ही लीड कर रहे थे. इससे पहले वह कहां-कहां रहे और कैसे उन्होंने वो फॉर्मूला चुराया, जिसके जरिए यूरेनियम से न्यूक्लियर बॉम्ब बनाया जाता है आपको बताते हैं.

पाकिस्तान में रहकर अब्दुल कादिर खान ने साइंस की पढ़ाई की और फिर वह यूरोप चले गए. यहां उन्होंने साल 1972 में बेल्जियम के ल्यूवेन की कैथोलिक यूनिवर्सिटी से डॉक्टरेट की डिग्री ली. इसी साल एम्सटरडैम में फिजिकल डायनेमिक्स रिसर्च लैबोरेट्री या FDO में वह काम करने लगे.

एफडीओ, Verenidge Mchine-Fabrieken की सहायक कंपनी थी. यहीं से उन्हें URENCO में काम करने का भी मौका मिला क्योंकि ये कंपनी URENCO के लिए काम करती थी. URENCO यूरोप की न्यूक्लियर फैसिलिटी है. पश्चिमी देश अमेरिका के परमाणु ईंधन पर निर्भर नहीं रहना चाहते थे, जिसकी वजह से ब्रिटेन, जर्मनी और नीदरलैंड्स ने मिलकर 1970 में संवर्धित यूरेनियम की आपूर्ति के लिए यूरेनको बनाया था. इसी ईंधन का इस्तेमाल हिरोशिमा बम बनाने में किया गया था.

डच नागरिक से की शादी
URENCO का यूरेनियम संवर्धन प्लांट होलैंड के अलमेलो में था और FDO, यूरेनको के लिए सबकॉन्ट्रेक्टर और सलाहकार के तौर पर काम करता था इसलिए टेक्नीकली अब्दुल कादिर खान भी यूरेनको से जुड़े हुए थे. अब्दुल कादिर खान को उनके सहयोगी काफी पसंद करते थे और जहां भी वह जाते थे तो जल्दी ही दोस्त बना लेते है. एफडीओ ने ही यूरेनको के लिए उनकी सिफारिश की थी. अब्दुल कादिर खान 11 साल पश्चिम यूरोप में रहे और उन्होंने वहीं एक डच नागरिक से शादी कर ली. हालांकि, उनकी पत्नी डच नागरिक नहीं थीं, बल्कि दक्षिण अफ्रीका से थीं, लेकिन वह डच भाषा बोलती थीं और ब्रिटिश पासपोर्ट होल्डर थीं.

16 दिन में अब्दुल कादिर खान ने अलमेलो प्लांट छान मारा
अब्दुल कादिर खान को यूरेनको में काम पर रखे जाने के एक हफ्ते बाद ही अलमेलो भेज दिया गया. उन्हें टेक्नीकल भाषा से जुड़े डॉक्यूमेंट्स के ट्रांसलेशन का काम सौंपा गया और अक्सर ये काम वह अपने घर पर ही किया करते थे. साल 1974 में उन्हें अलमेलो प्लांट के सबसे सीक्रेट एरिया में 16 दिन बिताने का मौका मिला. यहां उन्हें अल्ट्रासेंट्रीफ्यूज टेक्नोलॉजी से जुड़े डॉक्यूमेंट्स को जर्मन से डच भाषा में ट्रांसलेट करने का काम दिया गया. इन 16 दिनों में अब्दुल खान ने प्लांट के सीक्रेट हिस्से को छान मारा. अल्ट्रफ्यूज टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल U-238 से U-235 को अलग करने के लिए किया जाता है.

विदेशी भाषा में करते थे टेक्नीकल डॉक्यूमेंट्स का ट्रांसलेशन
एकबार उनके सहयोगियों ने उनसे पूछा था कि वह विदेशी भाषा में ट्रांसलेशन क्यों कर रहे हैं तो खान ने ये कहकर टाल दिया कि वह अपने परिवार को चिट्ठी लिख रहे हैं. ये भाषा डच या जर्मन नहीं थी. इतना ही नहीं खान को कई बार हाथ में नोटबुक लिए फैक्ट्री के आस-पास भी घूमते हुए देखा गया, लेकिन तब किसी को इस बात का अंदाजा नहीं था कि वह परमाणु बम का फॉर्मूला चुराने के लिए फैक्ट्री के आस-पास घूमते हैं. कोई भी यह नहीं समझ सका कि खान ने कब पाकिस्तान के लिए जासूसी शुरू कर दी. एक जासूस के वह आदर्श विकल्प थे.

जनवरी, 1976 में अब्दुल कादिर खान ने अचानक होलैंड छोड़ दिया और वह पाकिस्तान आ गए. उनकी पत्नी ने अपने पड़ोसियों को ये बताया कि वह सिर्फ छुट्टियां बिताने आई थीं, लेकिन उनके पति बीमार पड़ गए हैं. कुछ समय बाद ही अब्दुल कादिर खान ने भी एफडीओ से इस्तीफा दे दिया. यहां उन्होंने इस्लामाबाद के काहुटा हेडक्वार्टर से पाकिस्तानी न्यूक्लियर प्रोग्राम  की शुरूआत की.

70 के दशक में उन्होंने कनाडा से सेंट्रीफ्यूज की तस्करी करने वाले पाकिस्तानी एजेंट्स को भेजे गए 20 से ज्यादा पत्रों में अपनी टीम की सफलताओं के बारे में लिखा था. इसके थोड़े समय बाद सीआईए की एक रिपोर्ट लीक हुई, जिसमें कहा गया था कि पाकिस्तान कुछ सालों में परमाणु बम बना सकता है. हालांकि, पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जिया उल-हक ने दुनिया को ये भरोसा दिलाया कि पाकिस्तान का न्यूक्लियर पावर बनने का कोई इरादा नहीं है, लेकिन अब्दुल कादिर खान ने कुछ हिंट दिया.

1983 में किया पहला न्यूक्लियर टेस्ट
नवंबर, 1990 में उन्होंने कहा कि पाकिस्तान अभी बम नहीं बना रहा, लेकिन वह यूरेनियम का संवर्धन कर सकता है और अगर जरूरत लगी तो बम भी बनाएगा. 1980 तक पाकिस्तान हथियारों के स्तर तक यूरेनियम संवर्धन में सक्षम हो चुका था. हालांकि, 80 के दशक के आखिरी सालों में काम तेजी से बढ़ा और 1983 में पाकिस्तान ने पहला परमाणु परीक्षण किया.  

खान को लेकर डच में एक जांच भी की गई, लेकिन इस बात के कोई सबूत नहीं मिले कि वह नीदरलैंड में एक जासूस के तौर पर भेजे गए थे. ऐसा लगता है कि 1974 में जब भारत ने शांतिपूर्ण न्यूक्लियर टेस्ट किया, उसी वक्त से खान यूरेनको के राज चुराकर इस्लामाबाद भेजने लगे. पश्चिमी मीडिया उन्हें सुपरजासूस कहकर बुलाती थी, लेकिन वह खुद की इस पहचान को छिपाते रहे.

1990 में उन्होंने एक बयान में कहा, 'काहूटा में हुआ शोध हमारे इनोवेशन और संघर्ष का नतीजा है. हमने विदेश से किसी भी तरह की तकनीकी मदद हासिल नहीं की.' अब्दुल कादिर खान की इस देशभक्ति के इनाम के तौर पर पाकिस्तान ने काहूटा में उनके नाम पर ए. क्यू. खान रिसर्च लेबोरेट्री बनाई. 

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