एक्सप्लोरर

20 Years of 9/11 Attacks: क्या अमेरिका ने आतंकी हमलों से कोई सबक सीखा है?

अमेरिकी सैनिकों ने अफगानिस्तान में से सैनिक वापसी शुरू की है तो उनके सामने की दुनिया भी बदल गयी है और अमेरिका की शक्ति भी पहले की तुलना में काफी कमजोर हो गई है.

20 Years of 9/11 Attacks: काबुल हवाई अड्डे से सैनिकों की वापसी ने उत्तर कोरिया और वियतनाम में अमेरिका की हार की यादें ताजा कर दी हैं. समान पाइंट यह है कि अमेरिका ने न्याय के बैनर तले एक अन्यायपूर्ण युद्ध शुरू किया और फिर युद्ध के मैदान से सैनिक वापसी करना पड़ाजब इसे बनाए रखना मुश्किल था. 911 आतंकवादी हमले के बाद अमेरिका ने आतंकवाद विरोधी के नाम पर अफगानिस्तान में युद्ध शुरू किया और वहां एक अमेरिकी समर्थक शासन खड़ा दिया. लेकिन बीस साल बाद जब अमेरिका को इस अजेय भूमि से हटने के लिए मजबूर होना पड़ा, तो आतंकवाद विरोधी और अफगानिस्तान के लोकतांत्रिक परिवर्तन का कोई भी लक्ष्य हासिल नहीं हुआ.

बेहद मजबूत रहे हैं अमेरिका के खिलाफ किये गये पलटवार 

दुनिया में अभी भी हर दिन आतंकवादी हमले हो रहे हैं और अफगानिस्तान भी अपने मूल राज्य में वापस आ गया है. इतिहास में से हम पा सकते हैं कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिकियों द्वारा किए गए तथाकथित लोकतांत्रिक परिवर्तन, जैसे कि पश्चिमी यूरोप और पश्चिमी प्रशांत, सभी अमेरिकी सैन्य छत्र के तहत किए गए थे. बल के रखरखाव के बिना, इन स्थानों में लोकतांत्रिक व्यवस्था वास्तव में एक दिन के लिए नहीं चलेगी. अमेरिकी अपने भगवान के चुने हुए लोगों के तथाकथित विशेष मिशन के बारे में अंधविश्वासी हैं और युद्ध के माध्यम से दुनिया पर अपनी इच्छा थोपते हैं. अलग सभ्यता के साथ व्यवहार करते समय अमेरिका हमेशा क्रूर और सख्त रहा है. पर अमेरिका के खिलाफ किये गये पलटवार भी स्वाभाविक रूप से बेहद मजबूत रहे, और 911 आतंकवादी हमले वास्तव में ऐसे हुए थे. उत्पीड़न के तले सभ्यता को स्वाभाविक रूप से दुश्मन का विरोध करना चाहती है, उसे हर संभव तरीके से जवाबी प्रहार करना होगा, भले ही प्रतिरोध का तरीका सभ्य हो या नहीं.

हम समान भाग्य वाले समुदाय में रहते हैं, और जब विभिन्न विचारों और मॉडलों के साथ व्यवहार करते हैं, तो अलग सभ्य के प्रति बल के के उपयोग के बजाय परामर्श के माध्यम से ही सहमति प्राप्त की जानी चाहिये. जैसा कि मई 2019 में पेइचिंग में आयोजित एशियाई सभ्यता संवाद सम्मेलन में संपन्न आम सहमति में कहा जाता है: केवल समान संवाद, आदान-प्रदान और आपसी सीखने से विभिन्न सभ्यताओं के बीच पारस्परिक ज्ञान के माध्यम से दुनिया का उज्‍जवल भविष्य हो सकता है. लेकिन अमेरिकी जिस सिद्धांत का अनुसरण करते हैं, वह यह है कि केवल उनकी तथाकथित ईश्वर की इच्छा ही उच्चतम मानक है जिसका सारी दुनिया को पालन करना चाहिए और केवल उनका लोकतांत्रिक मॉडल ही सार्वभौमिक मूल्य है जिसका सभी देशों को पालन करना चाहिए. इस आधिपत्य के तर्क के अनुसार अमेरिका ने बार-बार सैन्य हमले बोल दिये हैं, और स्वाभाविक रूप से उसे बार-बार सैन्य हार के परीणाम लेना पड़ता है!

पहले की तुलना में काफी कमजोर हो गई अमेरिका की शक्ति

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका विश्व शक्ति के शिखर पर चढ़ गया. अमेरिकी अर्थव्यवस्था एक बार दुनिया के आधे हिस्से के लिए जिम्मेदार थी. शिखर की ताकत ने अमेरिकियों को पागलपन का भ्रम पैदा कर दिया है, जिससे उन्हें लगता है कि उनकी प्रणाली, संस्कृति और जीवन शैली दुनिया के लिए उच्चतम मॉडल हैं और पूरी दुनिया को इनका स्वीकार करना चाहिए. लेकिन 911 घटना ने इस भ्रम को बुझा दिया कि अमेरिका दुनिया पर हावी होना चाहता है, और अमेरिकियों ने अफगानिस्तान में एक नए वियतनाम युद्ध में निवेश किया. लेकिन बीस वर्षों के निर्थक प्रयासों के बाद भी लोगों को यह संदेह है कि क्या अमेरिकियों ने इस बात पर महसूस किया है: यानी बल के माध्यम से अन्य सभ्यताओं को सिर झुकाया नहीं जा सकता है. हालाँकि, जब अमेरिका ने अफगानिस्तान में एक लोकतांत्रिक किले की स्थापना में भारी निवेश किया, तब दुनिया के अन्य हिस्से फलफूल रहे थे. और जब अमेरिकी सैनिकों ने अफगानिस्तान में से सैनिक वापसी शुरू की है, तो उनके सामने की दुनिया भी बदल गयी है, और अमेरिका की शक्ति भी पहले की तुलना में काफी कमजोर हो गई है.

यदि अमेरिकी लोग वास्तव में चिंतनशील हैं, तो उन्हें यह महसूस करना चाहिए कि 911 आतंकवादी हमलों से लेकर अफगानिस्तान में सैनिक वापसी तक, अमेरिका के अपनी अक्षमता दिखाने का वास्तविक कारण ठीक यही है कि उनका दुनिया के साथ व्यवहार करने का ढ़ंग गलत है. दूसरे देशों और सभ्यताओं के साथ केवल शांतिपूर्वक सह-अस्तित्व के सिद्धांत ते तले रह सकते हैं. अन्य लोगों को दबाने के लिए बल पर निर्भर रहने से अपरिहार्य विफलता होगी.

अमेरिका ने चीन के खिलाफ टकराव करने की हरकत शुरू की

विभिन्न मॉडलों के साथ व्यवहार करते समय समानता और गैर-हस्तक्षेप के सिद्धांतों को अपनाया जाना चाहिए. यह मानव जाति द्वारा दर्दनाक ऐतिहासिक पाठों के माध्यम से निकाला गया निष्कर्ष है, और यह संयुक्त राष्ट्र चार्टर में स्पष्ट रूप से लिखी गई भावना भी है. इसी ढांचे के तहत द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बड़े देशों के बीच शांति बनाये रखने की नींव है. अगर अमेरिका अभी भी वर्चस्ववादी सोच पर जोर देता है कि केवल उसका अपना मॉडल ही एकमात्र विकल्प है, तो उसका नया नुकसान खाना अपरिहार्य होगा. इधर के वर्षों में अमेरिका ने चीन के खिलाफ टकराव करने की हरकत शुरू कर दी है. और इसका कहना है कि चीन का सत्तावादी मॉडल पश्चिमी लोकतांत्रिक के लिए खतरा है. ऐसा करने से दुनिया को और अधिक खतरनाक बनाया जा सकता है और पूरे विश्व की समृद्धि का त्याग किया जाएगा. प्रत्येक सभ्यता का अपना विकास तर्क होता है, और बाहरी ताकतों को मजबूर करने से केवल बुरे परिणाम होंगे. यदि अमेरिका अपनी अभिमानी मानसिकता को नहीं बदलता है और हमेशा दुश्मन के नजरिए से अपने से अलग मॉडल को देखता है, तो इसे और अधिक झटके लगेंगे.

यह भी पढ़ें-

20 years of 9/11: अमेरिका में हुए हमलों की 20वीं बरसी आज, राष्ट्रपति बाइडेन ने मारे गए लोगों को किया याद

Attack On America: 9/11 हमले के बाद कैसे बदली दुनिया और कैसे अमेरिका ने लिया इसका बदला

और पढ़ें
Sponsored Links by Taboola

टॉप हेडलाइंस

Israel-Iran War Live: ईरान के नए सुप्रीम लीडर मुज्तबा खामेनेई घायल, इजरायल ने दी ढूंढकर मारने की धमकी, चीन ने क्या कहा?
Live: ईरान के नए सुप्रीम लीडर मुज्तबा खामेनेई घायल, इजरायल ने दी ढूंढकर मारने की धमकी, चीन ने क्या कहा?
मुज्तबा खामेनेई की नियुक्ति पर भड़के अमेरिकी सीनेटर, बोले- पिता जैसा ही हश्र होगा
मुज्तबा खामेनेई की नियुक्ति पर भड़के अमेरिकी सीनेटर, बोले- पिता जैसा ही हश्र होगा
संयुक्त अरब अमीरात पर ताबड़तोड़ मिसाइलें दाग रहा ईरान, UAE ने शेयर किया ड्रोन मार गिराने का वीडियो
संयुक्त अरब अमीरात पर ताबड़तोड़ मिसाइलें दाग रहा ईरान, UAE ने शेयर किया ड्रोन मार गिराने का वीडियो
ईरान के सर्वोच्च नेता बने मोजतबा खामेनेई, IRGC और राष्ट्रपति से लेकर तीनों सेनाओं ने ली वफादारी की शपथ, ट्रंप नाखुश
ईरान के सर्वोच्च नेता बने मोजतबा खामेनेई, राष्ट्रपति से लेकर तीनों सेनाओं ने ली वफादारी की शपथ, ट्रंप नाखुश

वीडियोज

Sandeep Chaudhary: BJP की चाल पर प्रवक्ताओं का बड़ा विश्लेषण | Bihar |Nitish
Romana Isar Khan: ईरान के विरुद्ध अमेरिका का 'मिशन धर्मयुद्ध' | Iran-US-Israel War | Mahadangal
Iran Israel War: ईरान पर लगातार 'बम-बारूद' की बरसात! | Donald Trump | Khamenei | World War
UK07 Rider अनुराग डोभाल का एक्सीडेंट, मेंटल हेल्थ को लेकर पोस्ट के बाद कार क्रैश
Bollywood News: रैपर Badshah के नए गाने Tateeree पर मचा विवाद (08-03-2026)

फोटो गैलरी

Petrol Price Today
₹ 94.77 / litre
New Delhi
Diesel Price Today
₹ 87.67 / litre
New Delhi

Source: IOCL

पर्सनल कार्नर

टॉप आर्टिकल्स
टॉप रील्स
क्यों जैन समुदाय को ठेस पहुंचाना चाहते हैं? प्याज और लहसुन को लेकर वकील की ये मांग सुन CJI को आया गुस्सा
क्यों जैन समुदाय को ठेस पहुंचाना चाहते हैं? प्याज और लहसुन को लेकर वकील की ये मांग सुन CJI को आया गुस्सा
Delhi Politics: दिल्ली में फिर होंगे विधानसभा चुनाव? AAP सांसद संजय की मांग से सियासी हलचल
दिल्ली में फिर होंगे विधानसभा चुनाव? AAP सांसद संजय की मांग से सियासी हलचल
रणवीर सिंह की 'धुरंधर 2' करेगी रिकॉर्ड तोड़ कमाई? राकेश बेदी ने बताई इसके पीछे की वजह
रणवीर सिंह की 'धुरंधर 2' करेगी रिकॉर्ड तोड़ कमाई? राकेश बेदी ने बताई इसके पीछे की वजह
ईशान किशन पर टूटा था गमों का पहाड़, दो दिन पहले परिवार में हुईं 2 मौतें; फिर भी देश को जिताया वर्ल्ड कप
ईशान पर टूटा था गमों का पहाड़, परिवार में हुईं 2 मौतें; फिर भी देश को जिताया वर्ल्ड कप
टी20 वर्ल्ड कप 2026 जीतने के बाद टीम इंडिया का जश्न, स्टेडियम से वायरल हुए 5 डांस वीडियो
टी20 वर्ल्ड कप 2026 जीतने के बाद टीम इंडिया का जश्न, स्टेडियम से वायरल हुए 5 डांस वीडियो
नेपाल चुनाव में छाए JNU से पढ़े अमरेश सिंह, जानें किस चीज में की है पढ़ाई?
नेपाल चुनाव में छाए JNU से पढ़े अमरेश सिंह, जानें किस चीज में की है पढ़ाई?
इस सरकारी स्कीम में मिलता है FD से ज्यादा रिटर्न, पेंशन का भी हो जाता है जुगाड़
इस सरकारी स्कीम में मिलता है FD से ज्यादा रिटर्न, पेंशन का भी हो जाता है जुगाड़
'देश की 65 करोड़ माताओं, बहनों और बेटियों को लगना चाहिए कि...', CJI की कौन सी बात सुनकर महिला वकीलों ने जोर से बजाईं तालियां?
'देश की 65 करोड़ माताओं, बहनों और बेटियों को लगना चाहिए कि...', CJI की कौन सी बात सुनकर महिला वकीलों ने जोर से बजाईं तालियां?
Embed widget