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यूपी चुनाव: दांव पर लगी दिग्गज समाजवादियों की साख

नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश के पश्चिमी दुर्ग से शुरु हुई लड़ाई अब अवध के इलाकों में पहुंचकर अंगड़ाई ले रही है. चंद घंटों के बाद करीब 2 करोड़ 41 लाख मतदाता वोट की कलम से सियासत की वो लक्ष्मण रेखा खींचने वाले हैं जो उत्तर प्रदेश की सियासी तस्वीर लगभग साफ कर देगा. 12 जिलों की 69 सीटों पर 826 उम्मीदवार की किस्मत के फैसले की घड़ी आ गई है. इस बार सबसे ज्यादा समाजवादी पार्टी के दिग्गजों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है. वजह है कि पिछली बार इन 69 में से 55 सीटों पर समाजवादी साइकिल दौड़ी थी. आज बात सिलसिलेवार ढ़ंग से होगी. शुरुआत समाजवाद के चित्तोड़गढ़ कहे जाने वाले इटावा से करते हैं.

शिवपाल का संघर्ष समाजवादी कुनबे में हुए कलह के बाद शिवपाल यादव किसी पहचान के मोहताज नहीं है. भतीजे अखिलेश द्वारा किनारे लगाए जाने के बाद शिवापाल अब अपनी पारंपरिक सीट जसवंतनगर में सिमट कर रह गए हैं. वो पार्टी के स्टार प्रचारक तो हैं लेकिन अब तक ना किसी का प्रचार करने गए और ना ही किसी उम्मीदवार के लिए वोट मांगा. इसकी एक बड़ी वजह ये भी है कि शिवपाल को अपनी ही सीट बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है. शिवपाल भले ही इटावा की जसवंतनगर सीट से लगातार 4 बार से विधायक हैं लेकिन इस बार बीजेपी के युवा नेता मनीष यादव उर्फ पतरे से कड़ी चुनौती मिल रही है. 2012 में शिवपाल ने तब बीएसपी में रहे पतरे को करीब 80 हजार वोटों के रिकॉर्ड अंतर से हराया था. लेकिन इस बार हालात वैसे नहीं हैं. पार्टी में हुई कलह के बाद अखिलेश खेमे की नाराजगी के बाद शिवपाल का कुनबा कमजोर हुआ है और यही वजह है कि शिवपाल जैसे दिग्गज को भी अपनी पारंपरिक सीट बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है.

लड़ाई लखनऊ की राजधानी लखनऊ की कैंट सीट पर मुलायम परिवार की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है. यहां से मुलायम के छोटे बेटे प्रतीक की पत्नी अपर्णा यादव पहली बार चुनावी मैदान में हैं. ये सीट समाजवादियों के लिए सम्मान की सीट इसलिए बन गई है क्योंकि प्रचार के दौरान खुद मुलायम सिंह यादव ने छोटी बहू के लिए अपने सम्मान को दांव पर लगा दिया था. मुलायम ने जनता से अपील की थी कि बहू को जिताकर मेरा सम्मान रख लेना. मुलायम की मार्मिक अपील के बाद भी अपर्णा की राह आसान नहीं लग रही है क्योंकि समाजवादी पार्टी आज तक ये सीट नहीं जीती और मुकाबला और कड़ा तब हो जाता है जब उनकी टक्कर बीजेपी की दिग्गज नेता रीता बहुगुणा जोशी से हो. ब्राह्मण बहुल इस सीट पर रीता पिछली बार कांग्रेस के टिकट से जीती थीं. रीता इस बार बीजेपी से हैं और उनसे पार पाना अपर्णा के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है.

समाजवाद का नया चिराग लखनऊ की ही सरोजनी नगर सीट पर भी समाजवादी कुनबे की साख दांव पर लगी है. यहां से सीएम अखिलेश के चचेरे भाई अनुराग यादव पहली बार चुनाव लड़ रहे हैं. अनुराग, मुलायम के भाई अभय राम सिंह के बेटे और बदायूं से सांसद धर्मेंद्र यादव के बड़े भाई हैं. पहली बार राजनीति में कदम रखने वाले अनुराग का सामना बीजेपी की फा़यरब्रांड नेता स्वाति सिंह से है. स्वाति को ये सीट पति दयाशंकर सिंह के बचाव में मायावती से डटकर लड़ने के लिए ईनाम में मिली है. यहां दोनों में कांटे की टक्कर देखने को मिल रही है.

पिछली बार सरोजनीनगर सीट से एसपी शारदा प्रताप प्रताप शुक्ल ने जीती थी. इस बार टिकट कटा तो अखिलेश सरकार में मंत्री रहे शारदा ने बगावत करते हुए अजीत सिंह की RLD से मैदान में कूद पड़े . वहीं बीएसपी ने पिछली बार दूसरे नंबर पर रहे शिवशंकर सिंह को टिकट दिया है. जानकार मानते हैं कि शारदा, अनुराग का वोट काट रहे हैं तो ठाकुर शिवशंकर, स्वाति सिंह के वोट बैंक में सेंध लगा रहे हैं. ऐसे में यहां मुकाबला चतुष्कोणीय हो जाता है. नतीजे जो भी हों लेकिन यहां एसपी और बीजेपी दोनों की प्रतिष्ठा दांव पर है.

अखिलेश के 10 मंत्रियों की प्रतिष्ठा दांव पर दिग्गजों के साथ तीसरे चरण के चुनाव में अखिलेश के 10 मंत्रियों की किस्मत का भी फैसला होगा. अखिलेश के साथ हर मंच पर दिखने वाले मंत्री अभिषेक मिश्रा लखनऊ उत्तर से सीट से चुनाव लड़ रहे हैं. वहीं लखनऊ सेंट्रल सीट से मुलायम के बेहद खास मंत्री रविदास मेहरोत्रा मैदान में हैं. मेहरोत्रा का मुकाबला बीएसपी से बीजेपी में आए ब्रजेश पाठक से है. लखनऊ पूर्व सीट से मंत्री अनुराग भदौरिया पर अपनी सीट सीट बचाने की चुनौती है.

बाराबंकी में होगा 3 मंत्रियों का इम्तिहान पिछली बार बाराबंकी जिले की जनता ने सभी 6 सीटें दिल खोलकर समाजवादी पार्टी को जिता दीं. अखिलेश ने भी बाराबंकी का मान रखा और इस जिले से 3 मंत्री बनाए. बारबंकी की रामनगर सीट से अखिलेश के बेहद खास कैबिनेट मंत्री अरविंद गोप लगातार दूसरी बार विधानसभा में पहुंचने के लिए मेहनत कर रहे हैं. वहीं जिले की दरियाबाद सीट से लगातार 4 बार के विधायक और राज्यमंत्री राजीव कुमार सिंह लगातार 5वीं बार विधानसभा में दस्तक देने में लगे हैं. बाराबंकी की कुर्सी सीट पर भी अखिलेश के मंत्री फरीद महमूत किदवई की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है. फरीद अखिलेश सरकार में दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री हैं और उन्हें बीजेपी और बीएसपी से कड़ी चुनौती मिल रही है.

मंत्रियों पर अपनी सीट बचाने की चुनौती हरदोई सीट से अखिलेश सराकर में मंत्री और एसपी के बड़े नेता नरेश अग्रवाल के बेटे नितिन अग्रवाल एक बार फिर चुनावी मैदान में हैं. हरदोई सीट से नितिन के पिता नरेश अग्रवाल 7 बार विधायक रह चुके हैं. नितिन पर पिता की विरासत को आगे बढ़ाने की चुनौती है, उन्हें बीएसपी से बीजेपी में आए राजा बक्श कड़ी टक्कर दे रहे हैं. नितिन के अलावा सीतापुर की मिश्रिख सीट से कारागार मंत्री रामपाल राजवंशी, और कानपुर देहात की रसूलाबाद सीट मंत्री अरुणा कोरी मैदान में हैं.

बीजेपी के दिग्गज तीसरे चरण में बीजेपी के भी कई कद्दावर नेताओं की साख दांव पर है. कानपुर की महाराजपुर सीट बीजेपी का गढ़ मानी जाती है. यहां से 6 बार के विधायक सतीश महाना मैदान में हैं. 1991 से लगातार 5 बार सतीश महाना कानपुर कैंटोमेंट से विधायक बने, परिसीमन के बाद वो पिछली बार महाराजपुर चुनाव लड़े और जीते. महाना की जीत इस बार भी तय मानी जा रही है. लखनऊ पूर्व सीट पर लाल जी टंडन के बेटे आशुतोष टंडन पर बीजेपी का अभेद्य किला बचाने की चुनौती है. साल 1991 से इस सीट पर बीजेपी का कब्जा रहा है. 2012 में यहां से कलराज मिश्र जीते थे, उनके सांसद बनने के बाद उपचुनाव में आशुतोष टंडन ने जीत हासिल की थी.

पिता के 'कातिल' Vs पीड़ित बेटे की लड़ाई तीसरे चरण के चुनाव में सबसे दिलचस्प लड़ाई फर्रुखाबाद में हैं. यहां से बीजेपी ने मेजर सुनील सिंह को मैदान में उतारा है उनका मुकाबला यहां के दंबग विधायक विजय सिंह से है. विजय सिंह वही नेता हैं जिनपर मेजर सुनील के पिता और एक जमाने में बीजेपी के कद्दावर नेता रहे ब्रह्मदत्त द्विवेदी की हत्या का आरोप है, यानि लड़ाई पिता की हत्या के आरोपी से पीड़ित बेटे की है. 2012 में मेजर सुनील निर्दलीय चुनाव लड़े विजय सिंह से महज 147 वोटों से हार गए थे.

मेजर सुनील उस ब्रह्मदत्त द्विवेदी के बेटे हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि चर्चित गेस्टहाउस कांड के दौरान मायावती की जान बचाई थी. ब्रह्मदत्त द्विवेदी को मायावती भाई मानती थीं, जब तक वो और उनकी पत्नी चुनाव लड़ती थीं तब तक मायावती फर्रुखाबाद सीट पर अपना उम्मीदवार नहीं उतारती थीं. लेकिन 2002 से कहानी पलट गई, बेटे सुनील के खिलाफ मायावती अपना प्रत्याशी उतारने लगी हैं. इस बार मायावती ने उमर खान को टिकट दिया है, जिससे यहां मुकाबला बेहद दिलचस्प हो गया है.

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