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हाशिमपुरा नरसंहार: 22 मई 1987 की पूरी कहानी, चश्मदीदों की जुबानी- जब वर्दीवालों ने की 42 बेगुनाहों की हत्या

22 मई 1987 में आखिर हाशिमपुरा में हुआ क्या था? आखिर उन लोगों ने क्या किया था जो पीएसी वालों ने उन्हें बेदर्दी के साथ मौत के घाट उतार दिया? जानिए उस दिन की असली कहानी.

मेरठ: उस दिन दोपहर बाद से ही हाशिमपुरा की गलियों में पुलिस और पीएसी के संगीनधारी जवानों की चहलकदमी अचानक बढ़ गई थी. थोड़ी देर में लाउडस्पीकर से एलान हुआ कि हर घर की तलाशी होगी. तलाशी शुरू हुई तो बच्चों से लेकर अधेड़ तक सब हिरासत में ले लिये गये. मेरे तीनों बेटों को पीएसी ले गई. थोड़ी देर बाद सबसे छोटा बेटा अमीरूद्दीन लौट आया. उसकी उम्र काफी कम थी. लेकिन बाकी दोनों को पीएसी वाले अलग-अलग ट्रक में ले गये थे. सबसे बड़े कमरूद्दीन को पीएसी गाजियाबाद की तरफ लेकर गयी थी जबकि छोटे रियाज को पीएसी ने जेल में ले जाकर बंद कर दिया. सुबह तक कमरूद्दीन की तलाश करते रहे मगर तलाश पूरी होते-होते कमरूद्दीन की सांसें जिस्म से जुदा हो चुकी थी. पीएसी की बंदूक से निकली तीन गोलियां उसे लगी थी. वह हौसला करके नहर में से भी बाहर निकल आया था मगर बाहर आते ही उसने दम तोड़ दिया. यह कहते-कहते 80 साल के जमालुद्दीन का गला रूंध गया और आंखें गीली हो चलीं.

मेरठ के हाशिमपुरा में बुजुर्ग जमालुद्दीन परचून की दुकान चलाते हैं. इस दुकान पर उनका दूसरा बेटा रियाज भी बैठता है जिसे जेल जाने के बाद उन्होंने जमानत पर छुड़ाया था. जमालुद्दीन उन दिनों को याद करते हुए कहते है कि- “घर में कुछ ही महीने पहले खुशियां आई थीं. कमरूद्दीन की शादी हुई थी. मगर तभी दंगे शुरू हो गये. इमलियान में मंदिर के सामने लाउडस्पीकर बजाने को लेकर पहला झगड़ा हुआ था. पुलिस ने सख्ती करके लोगों को जेल भेजा तो मामला बढ़ता चला गया. शहर का हर इलाका दंगे की चपेट में था. कमरूद्दीन को जिस ट्रक में शाम को साढ़े सात बजे पीएसी लेकर गई, वो ट्रक जेल के बजाय गाजियाबाद की ओर गया था.”

हाशिमपुरा नरसंहार: 22 मई 1987 की पूरी कहानी, चश्मदीदों की जुबानी- जब वर्दीवालों ने की 42 बेगुनाहों की हत्या

हाशिमपुरा नरसंहार मामले में लंबी इंसाफ की लड़ाई लड़ने वाले वारदात के चश्मदीद गवाह जुल्फिकार बताते हैं- “पीएसी उन्हें भी कमरूद्दीन के साथ उसी ट्रक में ले गई थी. करीब 45-46 लोग रहे होगें. रात के करीब 9 बजे का वक्त था. मुरादनगर गंगनहर पर ट्रक रूक गया. पहले एक को उतारकर पिटाई की गई और फिर खाकीवर्दी वालों ने उसे गोली मार दी. उसकी लाश नहर में फेंकी तो हमें भी सामने मौत दिखने लगी. हमने तय किया जब मरना है तो लड़कर मरेगें. सब पीएसी के जवानों का विरोध करते हुए ट्रक से उतरने लगे. तभी पीएसी वालों ने गोलियां चला दीं. जो वहीं गिर गये उन्हें नहर में फेंका जाने लगा और जो बच गये उन्हें सामने खड़ा करके गोली मारी गई. मैं खुशकिस्मत था कि मुझे एक ही गोली लगी थी. यह यकीन किये बगैर कि मैं मर चुका हूं, पीएसी वालों ने मुझे नहर में फैंक दिया. मैं झाड़ियों में जाकर गिरा. जब सब चले गये तो मैं अंधेरे में सड़क की ओर चल दिया. तभी देखा कि कमरूद्दीन भी वहां कराह रहा था. मैं उसे सहारा देकर सड़क की ओर ले गया लेकिन वहां पहुंचकर उसने दम तोड़ दिया.”

पीएसी की दो गोलियां खाने वाले जुल्फिकार के पड़ौसी मुहम्मद उस्मान कहते है कि- “एक गोली तो नहर में फेंकने से पहले लगी थी, मगर दूसरी गोली नहर में तब लगी जब वह पानी में डूबे थे. शायद कोई जिंदा न बच सके इसलिए पीएसी ने नहर की ओर गोलियां चला दी थीं. मैं दो गोलियां लगने के बाद किसी तरह किनारे तक आ गया था. मगर पैर में गोली लगने की वजह से किनारे पर नहीं चढ़ पा रहा था. मेरे साथ के दो और लोग भी ऊपर किनारे पर थे. तभी पुलिस के एक दारोगा ने नहर से उन्हें निकाला. दारोगा उन्हें अस्पताल ले गया मगर उससे पहले हिदायत दी कि अस्पताल में गोली लगने का सही कारण न बताये नहीं तो दिक्कत हो जायेगी. दारोगा ने ही उन्हें और जुल्फिकार को अस्पताल में भर्ती कराया था जहां उनका इलाज किया गया.”

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जमालुद्दीन बताते है कि- “कमरूद्दीन की मौत के बाद उसकी बीबी किश्वर घर छोड़कर चली गई. बेटे की मौत का इंसाफ मांगने के लिए सियासतदानों की चौखट पर भी गये लेकिन कुछ नही हुआ. ऐसा लगता था कि तब कि वीरबहादुर सिंह की सरकार ने अफसरों से कह रखा था कि मुसलमानों को चुन-चुनकर मारो. चन्द्रशेखर जी और सुब्रमण्यम स्वामी को हम चिठ्ठियां लिखते रहे. जबाब आते थे लेकिन कार्रवाई कुछ नही होती थी. थाने में या कोर्ट में केस दर्ज कराने जाने की हमारी हिम्मत नहीं थी. फिर दिल्ली में वकील वृंदा ग्रोवर मिली. उन्होंने कहा कि मैं आपका केस लड़ूंगी. बहुत लंबी लड़ाई लड़ी उन्होंने. हमारे पास घटना के चश्मदीद गवाह थे इसलिए इस लड़ाई को मंजिल मिल गयी. पीएसी ने तो सारे सबूत ही खत्म कर दिये थे. वृंदा जी की वजह से आज इंसाफ मिल सका.”

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