मध्य प्रदेश: कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के लिए यह चुनाव प्रतिष्ठा का सवाल, किसको मिलेगी कुर्सी?
छत्तीसगढ़ में दो चरणों में 12 और 20 नवंबर को वोट डाले जाएंगे. मध्य प्रदेश और मिजोरम में 28 नवंबर को वोटिंग होगी. वहीं राजस्थान और तेलंगाना में सात दिसंबर को वोटिंग होगी. पांचों राज्यों के चुनाव परिणाम की घोषणा 11 दिसंबर को की जाएगी.

नई दिल्ली: चुनाव आयोग ने मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, तेलंगाना और मिजोरम में होने वाले चुनावों के लिए तारीखों का एलान कर दिया है. चारों राज्यों में 15 दिसंबर से पहले चुनावी प्रक्रिया खत्म हो जाएगी. चुनाव के एलान के साथ ही इन राज्यों में आचार संहिता लागू कर दिया गया है. छत्तीसगढ़ में दो चरणों में 12 और 20 नवंबर को वोट डाले जाएंगे. मध्य प्रदेश और मिजोरम में 28 नवंबर को वोटिंग होगी. वहीं राजस्थान और तेलंगाना में सात दिसंबर को वोटिंग होगी. पांचों राज्यों के चुनाव परिणाम की घोषणा 11 दिसंबर को की जाएगी.
इस साल के अंत में जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले है उनमें से सबसे महत्वपूर्ण राज्यों में से एक मध्यप्रदेश में इस बार कांग्रेस की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है. राज्य की सत्ता से लगभग 3 दशक से बाहर कांग्रेस हर हाल में जीतना चाहेगी. वहीं बीजेपी शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में एक बार फिर सत्ता में वापसी करने के इरादे से उतरेगी. आइए राज्य के चुनावी समीकरण को समझ लेते हैं. जान लेते हैं कि राज्य में कितनी विधानसभा सीटें हैं और 2013 के चुनाव में किसने कितनी सीटों पर कब्जा किया था. साथ भी यह भी जानने की कोशिश करते हैं कि क्यों एमपी चुनाव कांग्रेस के दो नेता कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के लिए किसी अग्नि परीक्षा से कम नहीं है.
कुल कितनी विधानसभा सीटें हैं
मध्य प्रदेश में विधान सभा की 230 सीट है. राज्य के संवैधानिक प्रमुख राज्यपाल है. इस वक्त राज्य की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल हैं. प्रदेश में पिछले 15 सालों से भारतीय जनता पार्टी की सरकार है. पिछले 2 दशक से ज्यादा राज्य के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान हैं.
2013 विधानसभा में क्या रहा था परिणाम
नवंबर 2013 में राज्य के चुनावों में बीजेपी ने 165 सीटों में जीत हासिल कर पूर्ण बहुमत साबित किया था. इस विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 58 सीटों पर जीत मिली थी जबकि 4 सीटों के साथ बहुजन समाज पार्टी राज्य में तीसरे स्थान पर थी. 2013 के चुनाव में 3 सीटें अन्य का खाते में गई थी.
कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया
कांग्रेश के प्रदेश अध्यक्ष पूर्व केंद्रीय मंत्री कमलनाथ और चुनाव प्रचार अभियान समिति के प्रमुख युवा सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस के मुख्य राजनीतिक हस्ती हैं जो राज्य में इस बार कांग्रेस की जीत की नैया को पार लगा सकते हैं. पिछले दिनों दोनों नेताओं के दौरे और मेगा रोड शो से कार्यकर्ता उत्साहित हैं. 15 साल से राज्य की सत्ता संभाल रही बीजेपी के लिए इस बार एंटी इनकमबेंसी फैक्टर बड़ा काम कर सकती है. ऐसे में कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया व्यापम घोटाले से लेकर आरती घोटाले तक को बड़ा मुद्दा बनाएंगे. किसान आत्महत्याओं, किसान गोलीकांड जैसे मुद्दों पर भी वह सरकार को घेरने की कोशिश करेंगे. इसके अलावा राज्य में महिला सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा होगा.
कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया की प्रतिष्ठा दांव पर
जहां एक तरफ बीजेपी शिवराज सिंह चौहान के चेहरे पर ही चुनाव लड़ने की योजना बना रही है तो वहीं मुख्यमंत्री के चेहरे को लेकर कांग्रेस में कुछ फूट दिख सकती है. एक तरफ प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ तो वहीँ, दूसरी तरफ, युवाओं का चेहरा माने जाने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया हैं, जिन्हें हाल ही में कांग्रेस की चुनाव अभियान समिति का प्रमुख घोषित किया गया है. बता दें कि, सिंधिया के चहेते भी प्रदेश कांग्रेस में कम नहीं है, जो उन्हें मुख्यमंत्री बनाना चाहते हैं, जिस कारण यह पार्टी अब विभाजित दिखाई पड़ती है.
इस चुनाव में कांग्रेस के दोनों नेताओं की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है. बीजेपी अगर इस बार भी राज्य में सरकार बनाने में सफल रहती है तो कांग्रेस की यह बड़ी हार होगी. दोनों के समर्थक अपने-अपने ढंग से प्रचार करने में लगे हैं जिससे की राज्य में बड़ा चेहरा कौन है इसको लेकर कांग्रेस के भीतर ही रार दिख रही है.
'राहुल भैया का संदेश, कमलनाथ संभालो प्रदेश.' और 'देश में चलेगी विकास की आंधी, प्रदेश में सिंधिया, केंद्र में राहुल गांधी.' जैसे नारे कांग्रेस के अंदर 'फूट' की गवाही दे रही है. ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि किस तरह दोनों राज्य में सियासी समीकरण साधने में कामयाब हो पाते हैं.














