अब तो बनारसी भी कहने लगे हैं खतरों से खेल रहा है काशी
वाराणसी इस वक़्त ख़तरों का शहर बन गया है, हर सड़क पर जानलेवा गड्ढे , तारों के मकड़ जाल की गिरफ़्त में जर्जर बिजली के खम्भे, जानलेवा फ़्लाइओवर, बेतरतीब ट्रेफ़िक और सड़कों पर छूट्टा घूमते जानवर हर पल हादसे को दावत दे रहे हैं.

वाराणसी: एक ऐसा शहर जिसके तीन नाम हैं. वरुणा नदी से अस्सीघाट तक इसका विस्तार है इसलिए वाराणसी, मान्यता है कि ये नगर भगवान शिव के त्रिशूल पर बसा है इसलिए काशी , और इसका मिज़ाज यानी रस बना रहता है, इसलिए बनारस. मोक्ष देने वाले इस शहर के हालात ऐसे हो गए हैं कि लोग इसे अब ख़तरों का शहर भी कहने लगे हैं. विश्व के प्राचीनतम शहर को एक बड़ी राजनीतिक पहचान तब मिली जब नरेंद्र मोदी यहां से सांसद बने और बाद में देश के प्रधानमंत्री. पीएम मोदी ने भी इस शहर को रिटर्न गिफ़्ट देने का वादा किया और दावा किया की इस शहर का विकास क्योटो की तर्ज़ पर किया जाएगा. आज चार साल बाद इस शहर में काम तो तमाम शुरू हुए लेकिन अंजाम तक ना पहुंचने की वजह से लोगों की मौत का शबब भी बन रहे हैं. कल ही निर्माणधीन ब्रिज का एक हिस्सा गिर जाने के चलते 18 लोगों की मौत हो गयी.
खतरों का शहर बन गया है काशी
ये एक बड़ा हादसा था ,लेकिन वाराणसी में आए दिन कोई ना कोई हादसा होता है जिसमें लोग ज़ख़्मी तो होते भी रहते हैं कई बार लोगों की जान भी चली जाती है. वाराणसी इस वक़्त ख़तरों का शहर बन गया है, हर सड़क पर जानलेवा गड्ढे , तारों के मकड़ जाल की गिरफ़्त में जर्जर बिजली के खम्भे, जानलेवा फ़्लाइओवर, बेतरतीब ट्रेफ़िक और सड़कों पर छूट्टा घूमते जानवर ये सभी आए दिन ख़तरे का सबब बन रहे हैं और प्रशासन मौन है.
केबिल, सीवर और गैस पाइपलाइन के नाम पर खुदी पड़ी हैं सड़कें
केबिल, सीवर और गैस पाइपलाइन के नाम पर बनारस की सड़के खुदी पड़ी हैं और उनके इर्द गिर्द ट्रैफ़िक रेंग रहा है.कई गड्ढे तो महीनो से खुले पड़े हैं.हालात ये है की बीएचयू, रथयात्रा , सिंगरा , महमूरगंज,गुड़ैलिया यहां तक की रविंद्रपूरी में पीएम मोदी के जनसम्पर्क कार्यालय के सामने भी जानलेवा गड्ढे खुदे हैं.
तारों के मकड़जाल हर तरफ देखने को मिल जाएंगे
नीचे खुदे गड्ढों से आप की निगाह ऊपर उठी तो सड़क पर बिजली के खम्भे, तारों के मकड़जाल हादसे को दावत देते नज़र आ जाएंगें. इनके ऊपर से केबिल नेटवर्क, टेलीकम्पनियों की तारें लटकती मिल जाएंगी. गैसपाइपलाइन और सीवर के नाम पर सड़कें भी किनारे पर खुदी पड़ी हैं.
2015 में बनना शुरू हुआ था हादसे वाला ब्रिज
अब उस फ़्लाइओवर का ज़िक्र करते हैं जिसने कल 18 लोगों की जान ले ली. इसका जायज़ा लेने के लिए एबीपी न्यूज़ उसकी ऊंचाई तक पहुंच गया. साल 2013 में इसकी स्वीकृति और बजट का आवंटन हो गया था लेकिन काम साल 2015 से शुरू हुआ और इतनी धीमी गति से चला की इसके पूरा होने की मियाद तक बढ़ानी पड़ी.
ब्रिज के बीम की नहीं हुई थी इंटरलॉकिंग
इसके निर्माण में सेतु निगम की बड़ी लापरवाही हमारी पड़ताल में सामने आयी. इसके ऊपर जो बीम दो महीने पहले चढ़ाए गए थे, उनको एक दूसरे से जोड़ा यानी इंटरलॉक तक नहीं किया गया. जिसके चलते कल एक बीम नीचे गिरा और 18 लोगों की जान चली गई. एबीपी न्यूज़ की पड़ताल में ये भी सामने आया इस हादसे के बाद भी जब सीएम योगी जायज़ा लेने पहुंचे तब भी वो ख़तरों से खेल रहे थे.
शुरू हो गया है आरोप-प्रत्यारोप का खेल
अब यहां ट्रैफ़िक डाईवर्जन को लेकर प्रशासन और सेतु निगम एक दूसरे को ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं लेकिन एबीपी न्यूज़ की पड़ताल में इस बड़े हादसे के दोनो दोषी हैं. इस शहर को नज़दीक से जाने वाले वरिष्ठ पत्रकार विश्वनाथ गोकरण के मुताबिक़ हुक्मरान विकास के नाम पर शहर के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं. उनका कहना है ये शहर जो अपनी ज़िंदादिली के लिए जाना जाता था अब जोखिम से दो चार हो रहा है और बनारसी कहने को मज़बूर हो रहे हैं ख़तरों से खेल रहा है काशी.
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