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यूपी चुनाव पर विशेष रिपोर्ट: कौन जीता है तेरी जुल्फ के सर होने तक!

नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के पहले चरण में 73 विधानसभा सीटों के लिए 11 फरवरी को वोट डाले जाएंगे. वहां का पूरा चुनाव 27 फीसद मुस्लिम और 17 फीसद जाट वोटरों के मध्य झूल रहा है. मुस्लिम वोटों पर समाजवादी–कांग्रेस गठबंधन और मायावती की नजर है तो जाट वोटों पर बीजेपी और अजीतसिंह के दल राष्ट्रीय लोकदल की.

उधर बीजेपी सांप्रदायिक ध्रुव्रीकरण की संभावनाएं भी तलाश रही है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश यानि मेहनतकश किसानों का इलाका है. यहां ज्यादातर किसान या फिर खेतिहर मजदूर ही रहते हैं. इन सभी पर नोटबंदी का अपने अपने हिसाब से असर पड़ा है. छोटे मोटे उद्योग धंधे हैं जो नोटबंदी का शिकार हुए हैं. यूपी का यह हिस्सा 2013 के दंगों के दाग से भी उबरने की कोशिश कर रहा है. गन्ना किसान चीनी मिल मालिकों से गन्ने का बकाया नहीं मिलने से परेशान है. लोग रोजगार के लिए सटे हरियाणा में पलायन करने को मजबूर हैं.

आंकड़े देखे जाएं तो 2012 के पिछले विधान सभा चुनावों में यहां की 73 सीटों में से मुलायम सिंह को 24, मायावती को 23, बीजेपी को 12, अजित सिंह को 9 और कांग्रेस को पांच सीटें मिलीं थीं. यहां की 73 सीटों की लगभग एक तिहाई में जाट और मुस्लिम मतदाता बराबर की संख्या में है. यानि जीत का समीकरण यही कि जाट मुस्लिम जिस दल को मिलकर वोट करेंगे वो बाजी मार जाएगा. लेकिन इस बार जाट और मुस्लिम एक साथ नहीं आ रहे हैं.

मेरठ के किटोड़ गांव के शौकत आलिम कहते हैं, ''इस बार मुस्लिम और जाट एक साथ नहीं आ रहा है. दंगा हुआ था उसके जख्म अभी तक सूखे नहीं हैं. यह हिंदु मुस्लिम दंगा नही था. यह जाट मुस्लिम दंगा था.'' मेरठ के ही शौकत अली भी कुछ ऐसी ही बात कहते हैं. शौकत अली ने कुछ महीने पहले हुए मलियाना कांड की याद दिलाते हुए कहा, ''पहले दोनों साथ हुआ करते थे लेकिन अब दिमाग में खराबी आ गयी है.'' वाल्मीकि समुदाय के प्रदीप कुमार ने कहा, ''इस बार मुसलमान अखिलेश के साथ जा रहा है और जाट बीजेपी की तरफ जा रहा है. हो सकता है कि कुछ छोटे चौधरी अजीत सिंह के पास चला जाए.''

शायद यही वजह है कि अखिलेश यादव ने अजित सिंह के उस राष्ट्रीय लोक दल को कांग्रेस के साथ के अपने गठबंधन का हिस्सा नहीं बनाया जो जाटों का दल कहलाता है. वह 17 फीसद जाट वोटरों के एवज में 27 फीसद मुस्लिम वोटरों को नाराज नहीं करना चाहते थे. इस रणनीति का उसे फायदा होता दिख रहा है.

किटोड़ गांव के ही आरिफ का मानना है कि अखिलेश यादव ने काम अच्छे किए हैं. जाट अगर साथ नहीं आता तो भी ठीक है. अन्य बिरादरी अखिलेश का साथ देंगी. बड़ौत के अहसान भी कहते हैं कि साइकिल का साथ देंगे और मिलकर साथ देंगे. इस बार मुसलमान बंटेगा नहीं.

उधर मायावती के समर्थक खामोश नजर आते हैं. वह बात करने से झिझकते हैं. एक गांव में मायावती की पार्टी के दफ्तर के आगे कुर्सी डाले बैठे आफताब आलम जरुर बोले कि इस बार उन्हें उम्मीद है कि दलित और मुस्लिम एक साथ हाथी की सवारी करेंगे. वह गिनाते हैं कि अखिलेश सरकार के पांच सालों के दौरान अकेले पश्चिम यूपी में मुज्जफरनगर समेत दस दंगे हो चुके हैं. सपा के कार्यकर्ता गुंडों जैसी हरकते करते हैं. मायावती इस पर अंकुश लगा कर रखती थी. मायावती ही दलितों और मुस्लिमों को दंबगों के अत्याचार से बचाती रही है और मुस्लिम और दलित उन पर यकीन करेंगे.

मेरठ शहर में हर चौराहे पर बीजेपी ने अपने बैनर लगा रखे हैं. एक में लिखा है- बाप बेटे के ड्रामे हजार, नहीं चाहिए ऐसी सरकार. बीजेपी के निशाने पर सभी दल है. हरिओम शर्मा मिले जो बीजेपी के समर्थक हैं. कहने लगे कि मोदीजी का नया नारा यूपी में खूब चलेगा. नया नारा है. बीजेपी बनाम स्कैम. स्कैम यानि एस से समाजवादी, सी से कांग्रेस, ए से अजीत सिंह और एम से मायावती. बीजेपी भी जानती है कि सिर्फ नारेबाजी से चुनाव नहीं जीते जाते. उसने एक भी मुस्लिम को टिकट नहीं दिया है और हिंदुत्व को हवा देने के फेर में है. बड़ौत में तो प्रदीप कुमार से लेकर संजीव तोमर तक ने कहा कि बीजेपी जाट-मुस्लिमों के अलग अलग वोट देने में सांप्रदायिक धुव्रीकरण की संभावनाएं तलाश रही है और इसमें कुछ भी गलत नहीं है.

कैराना गांव स्थानीय सांसद हुकुम सिंह की पलायन लिस्ट को लेकर चर्चा में आया था. वहां बीजेपी ने एक स्थानीय कार्यकर्ता ने साफ कहा कि सपा ने अगर गुंड़ागर्दी की तो चुनाव निकाल ले जाएगी और अगर हमारा ध्रुवीकरण का दांव चल गया तो सीट हमारी होगी. उन्हे लगता है कि जाट 2014 के लोकसभा चुनावों की तरह इस बार भी उसके साथ खड़े दिखाई देंगे. जयकुमार बड़ौत में रहते हैं. कहने लगे कि बीजेपी ने जानबूझकर किसी भी मुस्लिम को टिकट नहीं दिया. इसलिए नहीं दिया क्योंकि ऐसा करके ही उसे फायदा होगा. मुस्लिम को टिकट देकर बीजेपी अपने हिंदुत्व वाले वोटबैंक को नाराज नहीं करना चाहती थी. उसकी रणनीति ठीक है. बातों ही बातों में जयकुमार ने साफ कर दिया कि पिछले लोकसभा चुनावों में उन्होंने बीजेपी को वोट दिया था और इस बार भी उनका इरादा यही है.

बड़ौत में सभी जाट जयकुमार की तरह नहीं सोचते. पंकज तोमर भी ऐसे ही जाट हैं जो बीजेपी से नाराज हैं. बताने लगे कि पिछली बार गलती कर दी थी इस बार गलती नहीं करेंगे और आरएलडी को वोट देंगे. मोदीजी ने मिल मालिकों के बकाया पर गलत कहा, नोटबंदी से भारी नुकसान हुआ और हरियाणा के जाट आरक्षण पर मोदीजी ने जाटों का साथ नहीं दिया. तीन वजहों से पंकज तोमर इस बार बीजेपी को वोट नहीं देने की सोच रहे हैं. लेकिन पूरे इलाके में घूमने पर कुछ कुछ लगा कि आरक्षण के मुद्दे पर जाट नेता ज्यादा नाराज हैं और आम जाट हरियाणा के जाट के साथ खड़ा नहीं है. मेरठ में मिले नवभारत टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता प्रेमदेव शर्मा.उनका मानना था कि मुस्लिम जाट एक साथ नहीं जाने का फायदा बीजेपी को मिलेगा क्योंकि आर एल डी पकड़ नहीं बना पाया है. लोग वोट डालते हुए यह भी देखते हैं कि कहीं उनका वोट खराब तो नहीं हो जाएगा. अब चूंकि आरएलडी किसी भी सूरत में यूपी में सरकार नहीं बना सकता तो जाट अंत में बीजेपी के साथ ही जाएगा.

बड़ौत बड़े जाट नेता चौधरी चरणसिंह की कर्मभूमि हुआ करता था लेकिन उनके बेटे अजित सिंह अपनी पार्टी के अस्तिव को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. अजीत सिंह के साथ साथ उनके बेटे जयंत चौधरी को लोकसभा चुनावों में जाटों ने निपटा दिया था लेकिन इस बार बाप बेटे के प्रति कुछ जगह सहानुभूति दिखाई देती है. लोग कहते हैं कि बाप बेटे के साथ बहुत बुरा हुआ, दोनों को ही घर बिठा दिया इस बार ऐसा नहीं होने देंगे.

वैसे भले ही कांग्रेस हो या सपा या फिर बीजेपी किसी ने भी अजीत सिंह के साथ चुनाव पूर्व समझौता नहीं किया है लेकिन नतीजे आने के बाद अगर स्थितियां त्रिशंकु विधान सभा की बनी तो अजीतसिंह किसी के साथ भी जा सकते हैं. वैसे पश्चिमी यूपी की मुख्य समस्या गन्ना किसानों का मुद्दा, इलाहाबाद हाई कोर्ट के बेंच की स्थापना, भूमिगत जल का गिरता स्तर और उद्दोगों का बंद होना है. इनका जिक्र तो बहुत हो रहा है लेकिन समाधान किसी के पास नहीं है. आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक, कौन जीता है तेरी जुल्फ के सर होने तक.

नोट- विजय विद्रोही ने सभी जिलों में जाकर जमीनी हालात की पड़ताल को रिपोर्ट का रूप दिया है. उन्होंने अपनी पड़ताल के दौरान जिससे बात उसे वैसा ही लिखा गया है.

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