दिल्ली की कहानी: वक़्त के साथ दिल्ली बदली और आधुनिक शहर का जामा पहन लिया
इस शहर का असल कुछ इस तरह है कि यह इलाक़ा पहले भरा-पूरा जंगल था, जानवरों से खचाखच, फूल-पत्तों से लदा-फंदा. हर समय हरे-हरे पानियों की फेरियां रहतीं. चमकीले घास की क्यारियां और चिकने पेड़ों की डालियां लहक-लहक कर मुस्कुरातीं. बुलबुल और मैना एक ही डाली पर बैठ कर चहचहाते.

वक़्त के साथ दिल्ली बदली और उसने एक आधुनिक शहर का जामा पहन लिया है. लेकिन इस लिबास के भीतर जो दिल्ली है, उसके दिल में क्या धड़कता है?
दिल्ली की कहानी
अली अकबर नातिक

दोस्त चले जाते हैं, युग बीत जाता है, तस्वीरें रह जाती हैं. अगर उन तस्वीरों में पहचानी सूरतों की नेक रूहें बसती हों तो उनके देखने से कलेजा कितना जलता है यह बात कलेजे वाले ही जानते हैं. देख लो, यह है वह शहरों का शहर, शाहजहानाबाद, जिसका नक़्शा सबसे पहले मुग़ल बादशाह शहाबुद्दीन बेग मुहम्मद खान शाहजहां की आंखों में खिंचा था और पहले उसी के दिल के कोने पर आबाद भी हुआ. फिर यह हमारी आपकी दिल्ली हो गई, जिससे हम मिर्ज़ा (मोहम्मद रफ़ी सौदा), मीर और ग़ालिब की भलमनसाहत और प्यारी सूरतों के कारण बहुत परिचित हैं. यही शाहजहानाबाद, जिसके गुल-बूटों पर गीत गाती कई बुलबुलें दुनिया के चमन से उड़ गईं और दिलों के बागीचे को वीरान कर गईं.
इस शहर का असल कुछ इस तरह है कि यह इलाक़ा पहले भरा-पूरा जंगल था, जानवरों से खचाखच, फूल-पत्तों से लदा-फंदा. हर समय हरे-हरे पानियों की फेरियां रहतीं. चमकीले घास की क्यारियां और चिकने पेड़ों की डालियां लहक-लहक कर मुस्कुरातीं. बुलबुल और मैना एक ही डाली पर बैठ कर चहचहाते. जिस समय यमुना अपने जोबन पर होती जीवन धारा बहा कर गुज़र जाती. इस कारण सारा जंगल खिला-खिला रहता, जहां वनवासियों का बसेरा और जोगियों का डेरा होता.
साहबक़रां ने इस बाग़-व-बहार के क्षेत्र को देखा तो आंखों में सपने सजने लगे और मन में ऐसा शहर बसाने की लालसा हुई जिसकी मिसाल पूरब-पश्चिम के फैले जहानों में किसी ने न पाई. जो समरकंद और बुख़ारा की शोहरत को धूल में मिला दे और बग़दाद के नाम पर हल चला दे. दूर-दूर के कलाकार और कारीगर जमा होकर शीराज़ और इस्फ़हान की चमक-दमक को फीका कर दें, फ़िरंगों के देशों का सीना चीर दें. व्यापारी देश-विदेश का माल लाकर यहां फैला दें और इस शहर को चीन का निगारख़ाना (स्टूडियो) बना दें. यह विचार दिल में आना था कि बादशाह सलामत ने यमुना के पाट को पिछवाड़े रख कर लाल क़िले की दीवार खींच दी.
गगनचुंबी दीवार पर बड़े-बड़े बुर्जों के पहाड़ रख कर दीवार के रोब-दाब को दोगुना कर दिया और चौड़े कंगूरों और ऊंचे मीनारों से उसकी ख़ूबसूरती और भी बढ़ा दी. जब यह सब हो चुका तो उस क़िले के सामने कई सौ एकड़ खुला मैदान छोड़ा, जिसके आगे शहर दिल्ली का ऐसा नक़्शा जमाया कि यमुना की तरफ़ क़िला और क़िले के आगे उत्तरी और दक्षिणी शहर की चौकोर थाल रख दी और उसका नाम शाहजहानाबाद रखा.
क़िले की इमारत का थोड़े में क़िस्सा ये है कि ख़ास महलों की एक क़तार जमना की पड़ोसन दीवार की छाती पर जमा दी और उन इमारतों के अंदर पांच हाथ चौड़ी और डेढ़ बित्ता गहरी नहर बहा दी. नाम उसका नहरे-बहिश्त (स्वर्ग की नहर) रखा, जो महलों के बीचो-बीच से होती हुई बग़ीचों का चक्कर काटती और फिर झरोखे के संगमरमर के हौज़ में जा गिरती जहां फ़व्वारे फूटते और अनार फूट-फूट कर जगमगाते और हौज़ के पानी को पीले रंगों से शरमातीं. इस नहर के लिए यमुना का पानी चढ़ाने की बंदोबस्त कुछ इस तरह थी कि क़िले की ऊंचाई तक तांबे और कांसे के टिंडों की एक महाल थी जिसे क़िले के ऊपर एक बड़े चरख़े के साथ चला दिया गया था, इस चरख़े को चक्कर देने के लिए चार बैल सारा दिन जुते रहते जो चरखे को फेरे दे दे कर महाल को ऊपर खींचते रहते और पानी चरखे के नीचे बने हौज़ में गिर कर आगे नहर की तरफ़ चला जाता. नदी का पानी गंदला होता था इसलिए यह नहर उस पानी को पास ही एक चबूतरे पर मौजूद कुएं में गिरा देती. यहां उसमें क़लई और अबरख मिलाकर पहले उसे शीशे की तरह साफ़ और ठंडा किया जाता, उसके बाद उसे नहर में चलाया जाता था, जो उसे महलों तक ले जाती.
महलों के अंदर और नहर के ऊपर उस पर जगह-जगह संगमरमर के सफ़ेद तख़्ते बिछे रहते थे, जिनपर चांदी की पलंगड़ियां और चंदन के तख़्त लगे रहते. गर्मी के मौसम में बेगमात, शहज़ादियां और बादशाह सलामत इन्हीं पलंगड़ियों पर चौकड़ी मार कर बैठते और इस साफ़ चमकीले पानी की नहर में पांव रखे आराम करते और केसर के शरबत पी कर कलेजा ठंडा करते.
यमुना की तरफ़ महल की दाईं ओर संगमरमर की जालियां और झरोखे थे जिनके ऊपर शहज़ादों के सफ़ेद कबूतर महल के झरोखों से यमुना और यमुना से झरोखों तक फरेरियां ले-ले कर उड़ान भरते और अपने जैसों को सपनों के सफ़ेद फूल दिखाते. इन्हीं झरोखों से यमुना की हवाएं छन-छन कर अंदर आतीं और महल के हर समय जाड़े की तरह ठंडा रखतीं. जाड़े के दिनों में नहरे-बहिश्त को बंद कर दिया जाता और उसमें पानी की जगह पारे के बड़े-बड़े थाल रखे जाते जिनके बीच लोबान और कस्तूरी के शोले दहकते पड़े रहते और शराब के शीशे भी सोने-चांदी के वरक़ में यहीं लगे सजते. इसी सोने के कमरे के साथ एक बड़ा छतदार दालान था, जहां बादशाह सलामत हरम, शहज़ादे और शहज़ादियों के साथ खास्सा खाते और नज़र वसूल करते. इसी नहर वाले महल में जहांपनाह ख़ास ख़ास लोगों और शहज़ादों के साथ मुलाक़ात करते. जैसे मिर्ज़ा फ़ख़ूर, हकीम अहसनुल्लाह ख़ां या उस्ताद ज़ौक़, बाद में कुछ दिनों के लिए मिर्ज़ा नौशा (ग़ालिब) ने भी यहां हाज़री दी और बादशाह के इक़बाल के लिए क़सीदे पढ़े.
दोस्तों का कहना है कि ख़ुद मिर्ज़ा नौशा का विचार भी था कि उसी के अपशगुन से 1857 आया, मगर यह एक बात है जो हक़ीक़त से मेल नहीं खाती.
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(अली अकबर नातिक की कहानी का यह अंश प्रकाशक जगरनॉट बुक्स की अनुमति से प्रकाशित)
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Source: IOCL





















