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Explained: भारत में सत्ता से हटते ही पार्टी की एकजुटता मुश्किल क्यों, कैसे सत्ताधारी दल की अरदली बन जाती छोटी पार्टियां?

Smaller Political Parties Subservient Allies: विपक्ष की एकता न होने की सबसे बड़ी वजह है कि पिछली सरकारों ने व्यवस्था को इस तरह डिजाइन किया है कि छोटी पार्टियों के पास कोई चारा ही नहीं बचता है.

भारत की राजनीति में यह एक पुराना और बहुत गहरा सवाल है कि सत्ता से हटते ही कोई पार्टी अपने आपको एकजुट क्यों नहीं रख पाती. दूसरी तरफ सत्ता में बैठी पार्टी दूसरों को अपना 'अरदली' यानी सहयोगी कैसे बना लेती है. अगर इस सवाल को 'बीजेपी बनाम बाकी सब' के ऐंगल से देखें तो तस्वीर और भी साफ हो जाती है. आज भारत में जो राजनीतिक समीकरण बन रहे हैं, उनमें एक तरफ एक केंद्रीय ताकत (बीजेपी) है और दूसरी तरफ कई छोटी-बड़ी क्षेत्रीय पार्टियां हैं, जिनका अपना कोई समान विचार या संगठनात्मक ढांचा नहीं है. आखिर यह असंतुलन है क्यों?

सत्ता से हटते ही पार्टी क्यों टूट जाती है?

सत्ता से हटते ही पार्टियों के टूटने की 4 बड़ी वजहें हैं:

  • 'नेता ही पार्टी है' वाली सोच: ज्यादातर क्षेत्रीय या विपक्षी पार्टियां किसी एक मजबूत नेता के करिश्मे और सत्ता के झंडे तले चलती हैं. ममता बनर्जी हों, अखिलेश यादव हों, या पहले लालू यादव. इन पार्टियों का अपना स्वतंत्र संगठनात्मक ढांचा या विचारधारा कमजोर होती है. जैसे ही सत्ता हाथ से निकलती है, उस नेता के खिलाफ अंदरूनी बगावत शुरू हो जाती है, क्योंकि नेताओं को लगता है कि अब पार्टी उन्हें चुनाव नहीं दिला सकती. बिहार में राजद का उदाहरण देखें जहां चुनाव हारने के बाद लालू यादव के परिवार में ही फूट पड़ गई और उनकी बेटी रोहिणी आचार्य को राजनीति छोड़नी पड़ी. अब पश्चिम बंगाल में TMC के साथ भी ऐसा ही देखा जा रहा है.
  • 'जो जीता, वही सिक्का' वाला दिमाग: भारत में राजनीति दल बेहद पिरामिडनुमा ढांचे पर चलते हैं. टिकट बंटवारे से लेकर सरकारी नौकरियों तक, सब कुछ चंद लोगों के इशारे पर होता है. कार्यकर्ताओं को सिर्फ 'लूट का माल' बांटने वाले नेता की जरूरत होती है, न कि किसी विचारधारा की. जब कोई पार्टी सत्ता से बाहर हो जाती है, तो ये कार्यकर्ता और स्थानीय नेता स्वाभाविक रूप से उस पार्टी की तरफ भागते हैं जो सत्ता में है, ताकि उनकी रोजी-रोटी और सामाजिक प्रतिष्ठा बनी रहे.
  • 'जाति या समुदाय' से परे न जाने वाली सोच: ज्यादातर क्षेत्रीय पार्टियां एक विशेष जाति या समुदाय के वोट बैंक पर टिकी होती हैं. समाजवादी पार्टी यादवों पर, राजद यादवों और मुसलमानों पर और बसपा दलितों पर निर्भर करती है. जब सत्ता में होते हैं, तो ये पार्टियां अपने समुदाय को विशेष लाभ पहुंचाकर उन्हें संतुष्ट रखती हैं. लेकिन जब सत्ता चली जाती है, तो वही जाति का मतदाता यह सोचने लगता है कि जो पार्टी सत्ता में है, उसके साथ जाकर अपना फायदा क्यों न देखा जाए? इससे पार्टी का जातिगत सहारा ही खत्म हो जाता है और वह टूट जाती है.
  • 'सत्ताधारी दल का चुनावी दबाव': 2014 के बाद से भारतीय राजनीति में सबसे बड़ा बदलाव फंडिंग और कानूनी लड़ाई का आया है. इलेक्टोरल बॉन्ड, जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक करार दिया, ने सारी राजनीति को 'चंदा बाजार' बना दिया था. जिस सत्ताधारी दल के पास बेहिसाब पैसा है, उसी के पास विपक्षी पार्टियों को उनके सहारे से वंचित करने की ताकत है. यही नहीं, ED और CBI जैसी एजेंसियों का इस्तेमाल सत्ताधारी दल विपक्षी नेताओं पर दबाव बनाने के लिए तो करता ही है, इन एजेंसियों से डराकर विपक्षी पार्टियों को टुकड़ों में बांटा भी जाता है.

'जाल बिछाकर शिकार करना': सत्तारूढ़ पार्टी कैसे छोटी पार्टियों को सहयोगी बनाती है?

अब सवाल यह है कि क्या यह सब 'स्वाभाविक' है, या फिर सत्ता में बैठी पार्टी के पास कोई सुनियोजित योजना है. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, यह कोई एक घटना नहीं, बल्कि एक सिस्टम है. बीते 11 सालों (2014-2025) के आंकड़ों पर गौर करें तो ED और CBI की जांच में घिरे बड़े राजनेताओं में से 95% विपक्षी पार्टियों से थे, जबकि सत्तारूढ़ पार्टी के नेताओं के खिलाफ मामले न के बराबर हैं.

पहला हथियार- सियासी एजेंसियों का हथियार बनना: यह सबसे प्रभावी और खतरनाक हथियार है. मान लीजिए, कोई क्षेत्रीय पार्टी, जैसे आम आदमी पार्टी या TMC, मुख्यमंत्री के खिलाफ बोल रही है. तुरंत ED या CBI उनके नेताओं को तलब कर लेती है, उनके घर छापे मारे जाते हैं और उन्हें 'भ्रष्ट' बताकर पेश किया जाता है. इस दबाव में उस पार्टी के कमजोर विधायक और नेता अपनी सुरक्षा के लिए सत्तारूढ़ दल में शामिल होने लगते हैं. अरविंद केजरीवाल और ममता बनर्जी ने खुलकर कहा है कि बीजेपी खुलेआम ED-CBI का इस्तेमाल दूसरी पार्टियों को तोड़ने के लिए कर रही है.

दूसरा हथियार- 'चुनाव से पहले ही चुनाव' जीत लेना: पहले चुनाव के बाद गठबंधन बनते थे, लेकिन अब चुनाव से पहले ही सब तय हो जाता है. सत्तारूढ़ पार्टी पहले से ही छोटी पार्टियों के साथ बातचीत कर लेती है. बदले में उन्हें सीटें, पद और 'सुरक्षा' का वादा किया जाता है. इससे विपक्षी गठबंधन कमजोर पड़ जाता है और सत्तारूढ़ पार्टी अपने लिए एक 'सहयोगी दलों' का जाल बुन लेती है. बिहार, महाराष्ट्र और हरियाणा में यह खेल खूब देखा गया है.

तीसरा हथियार- 'खरीद-बिक्री' की परंपरा: भारत में चुनाव इतने महंगे हो गए हैं कि छोटी पार्टियों के लिए अकेले लड़ना असंभव हो गया है. सत्तारूढ़ दल के पास बेहिसाब पैसा होता है. वह छोटी पार्टियों को यह लालच देती है कि यदि वे उसके साथ आएं, तो उनकी चुनावी लागत का खर्च, उनके नेताओं की सुरक्षा और उनके लिए भविष्य की राजनीतिक संभावनाएं खुल जाएंगी. यह 'डॉलर डिप्लोमेसी' छोटी पार्टियों को हाथों हाथ बेच देती है.

सबसे ताजा उदाहरण: TMC का बिखराव (मई-जून 2026)

अब आते हैं सबसे ताजा उदाहरण TMC पर. जून 2026 में पश्चिम बंगाल में जो कुछ हुआ, वह भारतीय राजनीति में 'सत्ता से हटते ही पार्टी टूटने' का एक केस स्टडी है. TMC की सरकार गिरने के बाद पार्टी ताश के पत्तों की तरह बिखर गई. बंगाल 2026 चुनावी नतीजों के एक महीने बाद जून 2026 में 58 विधायक और 20 से ज्यादा सांसद ममता बनर्जी से अलग हो गए. यानी पार्टी का करीब दो-तिहाई विधायी दल बागी हो गया.

इस विद्रोह का नेतृत्व रितब्रत बनर्जी और संदीपन साहा जैसे विधायक कर रहे थे, तो वहीं काकोली घोष दस्तीदार जैसे सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर साफ कर दिया कि वे अब NDA में शामिल होना चाहते हैं. पूर्व मंत्री तपस रॉय ने साफ कहा कि TMC का वही हाल हो रहा है जो 'महाराष्ट्र मॉडल' में शिवसेना का हुआ था. TMC के वरिष्ठ सांसद कल्याण बनर्जी ने तो खुला आरोप लगा दिया कि उनकी ही पार्टी के सांसद यूसुफ पठान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मिलने दिल्ली आए थे.

पुराने सबक: 'मेंढक उछाल' और 'ऑपरेशन लोटस' का इतिहास

यह सिलसिला केवल TMC का नहीं है. 2022 से लगातार यह पैटर्न दोहराया जा रहा है...

जून 2022 की बात है. एकनाथ शिंदे ने 40 विधायकों को लेकर शिवसेना के खिलाफ बगावत कर दी और बीजेपी के साथ मिलकर महाराष्ट्र की सरकार बना ली. बाद में स्पीकर ने यहां तक फैसला सुना दिया कि बहुमत के आधार पर एकनाथ शिंदे गुट ही असली शिवसेना थी. यही वह 'महाराष्ट्र मॉडल' है जिसका जिक्र TMC के तपस रॉय ने भी किया था.

जुलाई 2023 में अजित पवार ने अपने ही चाचा शरद पवार को छोड़कर बीजेपी के नेतृत्व वाली महाराष्ट्र सरकार में उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली. इस कदम ने NCP को दो फाड़ में बांट दिया.

फिर 24 अप्रैल 2026 को AAP को एक बड़ा झटका लगा. AAP के 10 राज्यसभा सांसदों में से 7 ने बीजेपी में 'विलय' की घोषणा कर दी. इनमें राघव चड्ढा, स्वाति मालीवाल और क्रिकेटर हरभजन सिंह जैसे बड़े नाम शामिल थे. यह दलबदल विरोधी कानून की एक तकनीकी सीमा का फायदा उठाकर किया गया. अगर किसी दल के दो-तिहाई सदस्य विलय करते हैं, तो यह मान्य होता है. बाद में मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया कि इन सांसदों पर ED जैसी एजेंसियों से जांच का दबाव था.

इससे पहले फरवरी 2025 में ही दिल्ली के 8 पूर्व AAP विधायक दिल्ली चुनाव से ठीक पहले बीजेपी में शामिल हो चुके थे. वहीं 2024 में बिहार चुनाव से पहले ED की जांच और छापों के बीच RJD के कई नेता बीजेपी में शामिल हो गए थे.

चुनावी बॉन्ड: पैसे के उस पार का सच

यह सब कुछ फंडिंग के बिना संभव नहीं होता था. सुप्रीम कोर्ट के रद्द करने से पहले, चुनावी बॉन्ड ने राजनीति को पूरी तरह बदल कर रख दिया था. निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, सिर्फ 30 चरणों में बीजेपी ने चुनावी बॉन्ड के जरिए 8,251 करोड़ रुपये से ज्यादा का फंड इकट्ठा किया था.

वित्त वर्ष 2024-25 में ही बीजेपी को 9 चुनावी ट्रस्टों से 3,811 करोड़ रुपये में से लगभग 82 प्रतिशत (लगभग 3,112 करोड़ रुपये) मिले. इतने बड़े फंड के बिना, विपक्षी दलों पर इस कदर दबाव बनाना या उनके नेताओं को साधना नामुमकिन है.

तो क्या भारत में विपक्ष मर रहा है?

पूरी तरह से नहीं, लेकिन वह अब उतना जिंदा नहीं रहा जितना 1980-2000 के दशक में था, जब अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी या जॉर्ज फर्नांडीस जैसे मजबूत विपक्षी नेता होते थे. आज विपक्ष में एक ऐसी एकता नहीं दिखती जो सत्तारूढ़ दल को चुनौती दे सके. इस एकता के न होने का सबसे बड़ा कारण यह है कि व्यवस्था को इस तरह डिजाइन किया गया है कि छोटी पार्टियों के पास कोई और चारा ही नहीं बचता. ये सिर्फ कुछ उदाहरण भर हैं, लेकिन इनसे साफ पता चलता है कि सत्ता से हटते ही पार्टी का टूटना कोई संयोग नहीं है, बल्कि सोची-समझी साजिश का नतीजा है.

ज़ाहिद अहमद इस वक्त ABP न्यूज़ में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. टेलीविजन और डिजिटल जर्नलिज्म की दुनिया में उन्हें करीब 9 साल का तजुर्बा है. इससे पहले वे 3 बड़े मीडिया संस्थानों में भी अहम जिम्मेदारियां निभा चुके हैं. वे ओरिजिनल सेक्शन की एक्सप्लेनर टीम में सीनियर सब एडिटर रहे. ज़ाहिद आउटपुट डेस्क, बुलेटिन प्रोड्यूसिंग और बॉलीवुड सेक्शन को बतौर असिस्टेंट प्रोड्यूसर लीड भी कर चुके हैं. देश-विदेश, सियासत, कारोबार, एजुकेशन, एंटरटेनमेंट, चुनाव और समाजी मुद्दों पर उनकी गहरी पकड़ है. आसान लहजे में असरदार और भरोसेमंद एक्सप्लेनर पेश करना उनकी पहचान है.

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