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30 साल से भुनाया जा रहा है महाराष्ट्र की सियासत में दाऊद का नाम, जानिए कब-कब अंडरवर्ल्ड डॉन के नाम पर चमकी राजनीति

1992 से लेकर 2022 तक दाऊद के नाम को महाराष्ट्र की सियासत में खूब भुनाया गया है. सियासी गलियारों में दाऊद इब्राहिम का नाम फिर एक बार चर्चा में है.

भारत में अपराध और राजनीति का मेल कोई नयी बात नहीं है, लेकिन अगर महाराष्ट्र के संदर्भ में बात करें तो एक अपराधी का नाम अबसे तीस साल पहले भी छाया हुआ था और आज तीस साल बाद भी उस नाम का राजनीति में इस्तेमाल होता है. ये नाम है अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम का. 1992 से लेकर 2022 तक दाऊद के नाम को महाराष्ट्र की सियासत में खूब भुनाया गया है. सियासी गलियारों में दाऊद इब्राहिम का नाम फिर एक बार चर्चा में है. महाराष्ट्र सरकार में अल्पसंख्यक विकास मंत्री नवाब मलिक को हाल ही में एनफोर्समेंट डायरेक्टेरेट ने गिरफ्तार कर लिया. उन पर आरोप है कि उन्होंने मुंबई बमकांड में शामिल दाऊद इब्राहिम के लोगों से जमीन के सौदे किये और एक तरह से आतंकियों को फंडिग दी.

ED के मुताबिक 1999 में मलिक ने कुर्ला इलाके के गोवावाला कंपाउंड में 3 एकड जमीन खरीदी थी और 85 लाख रूपये दाऊद की बहन हसीना पारकर को दिये थे. इसमें से 5 लाख की रकम नकद में थी. ईडी के मुताबिक इस जमीन को डी कंपनी के लोगों ने उसके असली मालिक से हडप कर मलिक को बेचा था. सौदे के लिये मलिक ने हसीना पारकर से तीन बार मुलाकात भी की थी. मलिक का कहना है कि एक सियासी साजिश के तहत उन्हें फंसाया. वे खुद इस मामले में भुक्तभोगी हैं, क्योंकि जिसने उन्हें जमीन बेची उसने खुद को जमीन का कानूनी मालिक बताया.


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मलिक अपने बचाव में चाहे जो कुछ भी कहें, लेकिन बीजेपी ने मौके को लपक लिया. बीजेपी की ओर से इस मामले के जरिये सीधे आरोप लगाये गये कि मलिक डी कंपनी के लिये काम कर रहे थे. चूंकि मलिक का इस्तीफा अब तक नहीं लिया गया है, इसलिये बीजेपी इस बात को मुद्दा बना रही है कि ठाकरे सरकार दाऊद के आदमी को बचा रही है. 9 मार्च को मुंबई में बीजेपी की ओर से मलिक के इस्तीफे की मांग के साथ एक बड़ा मोर्चा भी निकाला जायेगा.

नवाब मलिक के रिश्ते डी कंपनी से हैं या नहीं ये बात न्यायिक प्रक्रिया के पूरी होने पर ही साफ हो पायेगी, लेकिन जिस तरह से इस मामले को लेकर राजनीति हो रही है वो हमें नब्बे के दशक की याद दिलाता है, जब सियासी मंचों पर दाऊद इब्राहिम का नाम गूंजा करता था. 1995 में शिवसेना-बीजेपी गठबंधन पहली बार महाराष्ट्र की सत्ता में आया था. उसके पहले लगातार कई सालों तक राज्य में कांग्रेस की ही सत्ता रही. जिन कारणों से कांग्रेस को महाराष्ट्र की सत्ता से बेदखल होना पड़ा था. उनमें एक प्रमुख कारण था कांग्रेसी नेताओं के दाऊद के साथ रिश्तों के आरोप. बीजेपी और शिवसेना ने अपने चुनाव अभियान के दौरान ऐसी तस्वीर पेश कर दी थी कि कांग्रेस पार्टी और डी कंपनी के बीच गठजोड़ है.

1992-93 के दंगों के बाद से ही शिवसेना अपने मुखपत्र सामना के जरिये आरोप लगा रही थी कि डी कंपनी ने दंगों के दौरान दंगाईयों को हथियार मुहैया कराये थे. 12 मार्च 1993 के मुंबई बमकांड की जांच के दौरान ये खुलासा हुआ कि डी कंपनी ने फिर एक बार दंगे कराने के लिये मुंबई में हथियार भिजवाये थे और उन्हीं में से कुछ हथियार फिल्मस्टार संजय दत्त के घर भी पहुंचे. शिवसेना-बीजेपी के निशाने पर सबसे ज्यादा शरद पवार रहे जो कि उस वक्त कांग्रेस में थे और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री थे. शिवसेना के दिवंगत प्रमुख बाल ठाकरे ने तो एक सभा में सरेआम कह दिया कि अगर कांग्रेस के पास दाऊद है तो उनके पास अरूण गवली है. मुंबई में उन दिनों अरूण गवली का गिरोह भी एक्टिव था और दाऊद और गवली के बीच सांप और नेवले जैसा बैर था.


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कांग्रेस के ऊपर डी कंपनी से रिश्तों के आरोप 1992 के जेजे अस्पताल में हुए शूटआउट के बाद भी लगे. गवली गिरोह के शूटरों ने दाऊद के बहनोई इब्राहिम पारकर की हत्या कर दी थी. शैलैश हलदणकर और बिपिन शेरे नाम के दो शूटरों को भीड़ ने पीट दिया और उन्हें जेजे अस्पताल में भर्ती कराया गया. दाऊद ने बदला लेना तय किया और जेजे अस्पताल में एक भयानक शूटआउट को अंजाम दिया. दाऊद के शूटरों ने अस्पताल के उस वार्ड में गोलियों की बौछार कर दी, जिसमें दोनो शूटरों को इलाज हो रहा था. इस शूटआउट में शैलेश हलदणकर नाम का शूटर मारा गया और वार्ड के बाहर तैनात दो पुलिसकर्मियों की भी जान चली गयी.

जब उस शूटआउट की जांच मुंबई पुलिस ने शुरू की तो एक नाम ने सबको चौंका दिया. ये नाम था जयवंत सूर्यराव का. सूर्यराव भिवंडी-निजामपुर महानगरपालिका का चेयरमैन था और कांग्रेस का नेता था. सूर्यराव के बहाने शिवसेना, बीजेपी को फिर एक बार दाऊद का नाम लेकर कांग्रेस को घरने का मौका मिला. 1995 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले बीएमसी के अधिकारी गोविंद राघो खैरनार की वजह से भी दाऊद का नाम सियासी गलियारों में चर्चा का विषय बन गया. खैरनार की छवि एक ईमानदार अधिकारी की थी. वे दाऊद की अवैध इमारतों का गिराने की मुहीम चला रहे थे, लेकिन उन्होंने आरोप लगाया कि बतौर मुख्यमंत्री शरद पवार उनकी मुहीम में रोड़े अटका रहे थे.

कार्रवाई के वक्त उन्हें पुलिस सुरक्षा नहीं मिल रही थी. खैरनार ने एकांकी झुंज नाम की अपनी आत्मकथा में भी पवार पर गंभीर आरोप लगाये और कहा कि दक्षिण मुंबई के चंद इलाकों में पवार की चुनावी सभाएं दाऊद की ओर से प्रायोजित होतीं थीं. खैरनार की ओर से लगाये गये आरोपों को शिवसेना, बीजेपी गठबंधन ने जमकर भुनाया, जिससे उसे महाराष्ट्र की सत्ता हासिल करने में मदद मिली. पवार ने आरोपों का खंडन किया और उनपर कभी कोई आरोप साबित भी नहीं हो पाये.

चंद साल पहले देश की सियासत में दाऊद का नाम फिर एक बार गूंजा जब दिवंगत वकील राम जेठमलानी ने एक खुलासा किया. जेठमलानी के मुताबिक दाऊद सशर्त सरेंडर करना चाहता था, लेकिन तब मंत्री रहे शरद पवार ने मना कर दिया. ये सवाल उठने लगे कि पवार क्यों नहीं चाहते कि दाऊद भारत आये. पवार का कहना था कि वे किसी अपराधी की शर्त नहीं मान सकते थे, इसलिये दाऊद के सरेंडर के ऑफर को उन्होंने ठुकरा दिया. साल 2003 में जबसे दाऊद के भाई इकबाल कासकर को डीपोर्ट करके मुंबई लाया गया है, तबसे डी कंपनी मुंबई में ठंडी पड़ गयी. मुंबई में दाऊद गिरोह की ओर से एक भी गोली नहीं चलाई गयी. मुंबई अंडरवर्ल्ड से दाऊद भले ही अब गायब हो गया हो, लेकिन दाऊद का नाम महाराष्ट्र की सियासत में आज भी बिकता है.

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