‘सेकेंड क्लास बोगियां होती हैं, यात्री नहीं...’, सुप्रीम कोर्ट ने क्यों लगा दी भारतीय रेलवे की क्लास, क्या था मामला?
Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे ट्रिब्यूनल और MP हाई कोर्ट के आदेशों को रद्द करते हुए कहा कि सिर्फ टिकट का न मिलना इस बात का आधार नहीं बन सकता है कि मृतक वैध टिकट लेकर यात्रा नहीं कर रहा था.

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (17 जुलाई, 2026) को भारतीय रेलवे की शब्दावली को लेकर जमकर क्लास लगाई है. कोर्ट ने रेलवे से कहा कि वह सेकेंड क्लास पैसेंजर जैसे शब्दों का इस्तेमाल बंद कर दे. ट्रेन की बोगियां सेकेंड क्लास की हो सकती हैं, लेकिन उन बोगियों में यात्रा करने वाले यात्रियों के लिए सेकेंड क्लास पैसेंजर टर्म का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए. ऐसी शब्दावली भारत के संविधान की भावना का उल्लंघन करतीं हैं.
कोर्ट ने भारतीय रेलवे से क्या कहा?
देश की सर्वोच्च अदालत में जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने शुक्रवार (17 जुलाई, 2026) को रेलवे दुर्घटना में एक शख्स की मौत के बाद उसकी विधवा पत्नी की तरफ से दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए यह अहम टिप्पणी की. दरअसल, महिला ने अपने पति की मौत के बाद रेलवे से मुआवजे की मांग करते हुए कोर्ट में याचिका दाखिल की थी.
सुनवाई के दौरान बेंच ने कहा, ‘चाहे यह शब्द यात्रा के लिए यात्री की तरफ से किए गए खर्च से जुड़ा हुआ दिखाई देता है, फिर भी हमारा सुझाव है कि क्लास का जिक्र बोगियों के साथ किया जाए, यात्री के साथ नहीं. हमारे देश में क्लास डिवीजन के इतिहास को देखते हुए ऐसी शब्दावली भारतीय संविधान की भावना को आहत करती है.’
क्या था पूरा मामला?
दरअसल, यह मामला चंद्रकांत ठक्कर नाम के एक यात्री के मौत से जुड़ा हुआ है, जो 28 नवंबर, 2015 को ट्रेन नंबर- 12834 अहमदाबाद-हावड़ा मेल से रायपुर से अहमदाबाद जा रहे थे, लेकिन यात्रा के दौरान खंडबाड़ा और खटगांव स्टेशन के बीच चलती ट्रेन से उनका पैर फिसल गया और गिरने से उनकी मौके पर ही मौत हो गई.
उनकी पत्नी लता ने रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल में 18 प्रतिशत इंटरेस्ट के साथ चार लाख रुपये की मुआवजे की मांग की. उन्होंने बताया कि उनके पति का टिकट एक ट्रैवल बैग में रखा था, जो हादसे के बाद खो गया और पुलिस की तमाम कोशिशों के बाद भी नहीं मिल पाया.
रेलवे ट्रिब्यूनल और MP हाई कोर्ट से महिला ने नहीं मिला मुआवजा
हालांकि, भोपाल स्थित रेलवे ट्रिब्यूनल ने इस बात को माना कि यह घटना रेलवे एक्ट, 1989 की धारा 123(सी)(2) के तहत अप्रिय घटना की श्रेणी में आता है, लेकिन ट्रिब्यूनल ने यह कहकर महिला का दावा खारिज कर दिया कि यह साबित नहीं हो पाया कि चंद्रकांत ठक्कर सही टिकट लेकर यात्रा कर रहे थे.
इसके बाद मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने भी जनवरी, 2024 में ट्रिब्यूनल के फैसले को बरकरार रखा, लेकिन जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तब अदालत ने ट्रिब्यूनल और मध्य प्रदेश हाई कोर्ट दोनों के आदेशों को रद्द कर दिया. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सिर्फ टिकट का न मिलना यह बात को खारिज करने का आधार नहीं बन सकता है कि मृतक वैध टिकट लेकर यात्रा नहीं कर रहा था.
रेलवे ट्रिब्यूनल और MP हाई कोर्ट के आदेश को SC ने किया रद्द
सुप्रीम कोर्ट ने पूरी सुनवाई के बाद महिला की अपील को स्वीकार करते हुए रेलवे को चार हफ्ते के भीतर 8 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया. कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर तय समय पर याचिकाकर्ता को मुआवजा नहीं दिया जाता है, तो दावा याचिका करने की तारीख से भुगतान की तिथि तक 8 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी रेलवे को देना पड़ेगा.














