'सबरीमाला मंदिर मामले से ज्यादा महत्वपूर्ण है ये...', CEC और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़ी याचिका पर बोला SC
एक याचिका में अनुरोध किया गया था कि सुप्रीम कोर्ट संसद को सीईसी और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को विनियमित करने के लिए कानून बनाने का निर्देश दे.

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (6 मई, 2026) को सबरीमाला मंदिर मामले से पहले मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों (EC) की नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़े मुद्दे पर सुनवाई करते हुए कहा कि यह मामला ज्यादा महत्वपूर्ण है. कोर्ट ने उस वक्त यह टिप्पणी की जब केंद्र की तरफ से मामले पर सुनवाई टालने की मांग की गई थी.
पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने केंद्र की मांग ठुकारते हुए कहा कि यह मामला सबरीमाला मामले से अधिक महत्वपूर्ण है. कोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह भी सवाल किया कि क्या वह संसद को मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) और अन्य चुनाव आयुक्तों (EC) की नियुक्ति प्रक्रिया को विनियमित करने के लिए कानून बनाने का निर्देश दे सकता है.
ये टिप्पणियां जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने उस दौरान कीं, जब 2023 के संबंधित कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई हो रही थी. इस कानून में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करने वाली चयन समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को बाहर रखा गया है.
एक याचिका में अनुरोध किया गया था कि सुप्रीम कोर्ट संसद को सीईसी और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को विनियमित करने के लिए कानून बनाने का निर्देश दे. जस्टिस दीपांकर दत्ता ने इस मांग का उल्लेख किया और पूछा, 'याचिका में किए गए अनुरोध पर आइए... इसमें संसद से कानून बनाने को कहा गया है. क्या अदालत संसद को कानून बनाने के लिए कह सकती है? क्या यह याचिका इस रूप में स्वीकार्य है?'
उन्होंने 'अनूप बरनवाल मामले में पांच-सदस्यीय संविधान बेंच के दो मार्च 2023 के फैसले का भी उल्लेख किया. इस फैसले में सर्वसम्मति से कहा गया था कि सीईसी और चुनाव आयुक्तों का चयन तीन-सदस्यीय समिति की ओर से किया जाएगा. समिति में प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता (या संसद में सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता) और सीजेआई शामिल होंगे.
इस फैसले से पहले से चली आ रही वह व्यवस्था बदल गई थी, जिसमें राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की सलाह पर सीईसी और ईसी की नियुक्ति करते थे. जस्टिस दीपंकर दत्ता ने कहा कि इस फैसले में स्पष्ट किया गया था कि यह व्यवस्था तब तक लागू रहेगी, जब तक संसद कोई कानून नहीं बना देती. उन्होंने कहा, 'आखिर अदालत ने अनूप बरनवाल के फैसले को एक निश्चित अवधि तक, यानी कानून बनने तक ही क्यों सीमित किया? यह केवल उस स्थिति से निपटने के लिए था, जहां कोई कानूनी व्यवस्था मौजूद नहीं थी.'
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जज ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट संसद को कानून बनाने का निर्देश नहीं दे सकता. उन्होंने कहा, 'क्या 300 से अधिक पन्नों में की गई ये टिप्पणियां सिर्फ उस व्यवस्था को सही ठहराने के लिए नहीं थीं, जिसे अदालत ने कानून बनने तक अस्थाई रूप से लागू किया था? क्या आप कह सकते हैं कि बनने वाला कानून भी इन्हीं टिप्पणियों का पालन करे?'
उन्होंने कहा, 'जब अदालत ने यह कह दिया कि सीईसी और ईसी का चयन केवल कार्यपालिका की ओर से नहीं होना चाहिए, तो वह वहीं क्यों रुक गई? अदालत ने मानक तय किए, फिर उन्हें सिर्फ कानून बनने की एक निश्चित अवधि तक ही क्यों सीमित किया? इस फैसले को साधारण रूप से पढ़ने पर स्पष्ट होता है कि यह केवल उस स्थिति से निपटने के लिए था, जहां कोई कानूनी व्यवस्था मौजूद नहीं थी.'






















