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सिद्धारमैया Vs डीके शिवकुमार: क्या कामयाब होगी ब्रेकफास्ट डिप्लोमेसी? अब कांग्रेस के लिए खड़ी हो गई मुसीबत, समझें कैसे

Karnataka Politics: कर्नाटक में मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर चल रही अटकलों के बीच सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार ने एकजुटता पेश की है. दो नेताओं के बीच के टकराव ने आगे की लड़ाई को मुश्किल कर दिया है.

कर्नाटक कांग्रेस में महीनों से जारी सत्ता को लेकर खींचतान ने शनिवार (29 नवंबर 2025) को नाटकीय मोड़ ले लिया. मुख्यमंत्री सिद्धरमैया और उपमुख्यमंत्री डी के शिवकुमार ने एकजुटता दिखाई और कहा कि उनके बीच कोई मतभेद नहीं है और भविष्य में भी वे एकजुट रहेंगे. शिवकुमार, सिद्धरमैया के आवास ‘कावेरी’ पर नाश्ते के लिए पहुंचे थे, जिसके बाद दोनों नेताओं ने एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित किया. दोनों दिग्गज नेताओं ने भले ही ये कह दिया हो कि पार्टी आलाकमान के फैसले का वे पालन करेंगे, लेकिन उनके आसपास की राजनीतिक व्यवस्था अभी भी स्थिर नहीं है.

सीएम आवास पर ब्रेकफास्ट डिप्लोमेसी

सीएम आवास पर नाश्ते डीके शिवकुमार ने कहा कि सिद्धारमैया दोपहर या रात के भोजन के लिए उनके घर आएंगे. उन्होंने कहा, "पार्टी आलाकमान जो भी कहेगा, वही हमारा भी फैसला होगा. हम पार्टी के वफादार सिपाही रहे हैं. हम जानते हैं कि पार्टी देश में मुश्किल दौर से गुजर रही है, लेकिन हमें पूरा विश्वास है कि कर्नाटक एक बड़ी भूमिका निभाएगा. पार्टी 2028 का विधानसभा चुनाव  कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी के नेतृत्व में लड़ेगी."

अभी भी दोनों नेताओं के बीच फंसा है कुर्सी का पेंच

कर्नाटक में ब्रेकफास्ट डिप्लोमेसी के बाद अभी भी इस सवाल को कोई समाधन नहीं निकला कि किया सिद्धारमैया 5 साल तक का कार्यकाल पूरा करेंगे या ढाई साल पूरे होने के बाद डीके शिवकुमार को कुर्सी सौंपी जाएगी. ब्रेकफास्ट पर दोनों नेताओं का मिलना कांग्रेस आलाकमान को सोची-समझी योजना बताई जा रही है. यहां कुर्सी का पेंच दो ऐसे नेताओं के बीच फंसा हुआ है, जो अलग-अलग क्षेत्रों, जातिगत नेटवर्क का प्रतिनिधित्व करते हैं. चूंकि दोनों नेताओं का हर लिहाज से अपने-अपने क्षेत्र पर मजबूत पकड़ है तो ऐसे में किसी को आसानी से दरकिनार करना आसान नहीं रहने वाला है.

पिछले हफ्ते कांग्रेस के कुछ विधायक दिल्ली में आलाकमान से मिलने पहुंचे और सीएम बदलने को लेकर अपनी बातें रखी. मंत्रिमंडल के सहयोगियों और जाति संगठनों ने भी हाईकमान तक अपनी बात पहुंचाई. कांग्रेस भले ही फिलहाल इस मुद्दे को टालने में कामयाब हो, लेकिन उसके सामने कर्नाटक में दो बड़े नेताओं की लड़ाई गले की फांस बन सकती है. कांग्रेस के लिए AHINDA और वोक्कालिगा वोटर्स को एक साथ करना चुनौती भरा हो सकता है. इन दोनों समुदाय ने साल 2023 में कांग्रेस को राज्य में 136 सीटें दिलाई थी.

कैसे कांग्रेस के लिए खड़ी हो गई मुसीबत?

ब्रेकफास्ट डिप्लोमेसी ने भले ही इस राजीतिक खींचतान को समय दे दिया हो, लेकिन इससे राज्य में सरकार की स्थिरता और 2028 में होने वाले विधानसभा चुनाव में पार्टी की एकजुटता पर अंदरखाने सवाल उठाए हैं. सवाल है कि आखिर इस कार्यकाल के बाकी बचे समय के लिए कर्नाटक का नेतृत्व कौन करेगा, और किस राजनीतिक कीमत पर? अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि मुख्यमंत्री की कुर्सी पर कौन बैठेगा. सवाल यह है कि क्या कांग्रेस उस गठबंधन को एकजुट रख पाएगी जिसने उसे 2023 में 136 सीटें दिलाईं, जो कर्नाटक के इतिहास में उसका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था. फिलहाल तो इसमें दरारें नजर आ रही है.

कर्नाटक में दोनों नेताओं की बदौलत पार्टी ने रिकॉर्ड बनाया

साल 2023 में पार्टी के दो कद्दावर नेता सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार ने कर्नाटक में कांग्रेस की सत्ता लाने के लिए चुनाव लड़ा था. तब सिद्धारमैया अल्पसंख्यकों, पिछड़ों और दलितों के AHINDA गठबंधन को आगे बढ़ाने वाले सीएम पद के उम्मीदवार थे. डीके शिवकुमार राज्य कांग्रेस के अध्यक्ष थे, जिनके वोक्कालिगा प्रभाव और संगठनात्मक क्षमता ने पुराने मैसूर में जेडीएस को ध्वस्त करने में मदद की थी. 

तब नेतृत्व कौन करेगा, यह सवाल इतना विवादास्पद था कि बेंगलुरु के एक होटल में घंटों बैठक करने वाले पार्टी वार्ताकारों को एक नाज़ुक समझौता करने के लिए मजबूर होना पड़ा. तब ये दोहरी व्यवस्था के रूप में नतीजा सामने आया. सिद्धारमैया मुख्यमंत्री बनेंगे और शिवकुमार उप-मुख्यमंत्री के रूप में काम करेंगे और राज्य कांग्रेस अध्यक्ष बने रहेंगे.

दो साल पहले कुर्सी को लेकर क्यों नहीं हुआ हंगामा?

उस समय आधिकारिक तौर पर बस यहीं बात खत्म हो गई. अनाधिकारिक तौर पर कर्नाटक की राजनीति में लगभग सभी का मानना ​​था कि एक रोटेशन समझौता हुआ है कि सिद्धारमैया ढाई साल और बाद में डीके शिवकुमार ढाई साल सीएम रहेंगे. पार्टी ने कभी इसकी पुष्टि नहीं की. किसी भी नेता ने खुलकर इसे स्वीकार नहीं किया. इस अस्पष्टता ने गठबंधन को अब तक एकजुट रखा है.

हाल के दिनों में कर्नाटक की राजनीति का केंद्र दिल्ली की ओर हो गया है. सिद्धारमैया ने स्पष्ट रूप से कहा है कि वह अपना कार्यकाल पूरा करना चाहते हैं. शिवकुमार सार्वजनिक रूप से सीधे टकराव से काफी हद तक बचते रहे हैं और लगातार यही कहते रहे हैं कि पार्टी नेतृत्व इस मामले पर फैसला करेगा, लेकिन उनके खेमे के विधायक उन्हें सीएम बनाने की मांग भी कर रहे हैं.

किसी को भी नाराज नहीं कर सकती कांग्रेस

यदि सिद्धारमैया पूरे कार्यकाल तक पद पर बने रहते हैं तो वोक्कालिगा में असंतोष बढ़ सकता है. शिवकुमार का संगठनात्मक तंत्र उत्साह खो सकता है. पुराने मैसूरु की बढ़त को 2028 में बरकरार रखना मुश्किल हो सकता है. अगर ढाई साल के लिए शिवकुमार को कुर्सी मिलती है तो AHINDA मतदाता खुद को हाशिये पर महसूस करेगा. कैबिनेट और प्रशासनिक तंत्र में सिद्धारमैया के लोग कार्यान्वयन का विरोध कर सकते हैं. कांग्रेस को राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश में भी इसी तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ा था, जिस वजह से इन राज्यों ने उसे सत्ता गंवानी पड़ी थी.

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