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सिर्फ बिरयानी और सेवइयां नहीं हैं ईद का त्योहार, दिल्ली के मुस्तफाबाद की कहानी तो यही कहती है

मुस्ताफाबाद में ईद पर हिंदू मुस्लिम एकता की मिसाल देखने को मिली. हालांकि पहले दंगे और फिर लॉकडाउन ने लोगों को खासा आर्थिक नुकसान पहुंचाया है.

नई दिल्ली: पहले दंगे और फिर लॉकडाउन की मार झेलने वाले उत्तर-पूर्वी दिल्ली इलाके में भले ही इस साल ईद का रंग फीका नजर आ रहा हो लेकिन इन मुश्किलों ने लोगों की दोस्ती का रंग गाढ़ा कर दिया है और लोग बिरयानी और सेवइयां से ऊपर उठकर प्यार मोहब्बत से ईद मना रहे हैं. ठीक तीन महीने पहले जब उत्तर-पूर्वी दिल्ली के पुराने मुस्तफाबाद में दंगे भड़के थे तो 10 साल से दोस्त महेश गुप्ता और मोहम्मद इलियास गुप्ता की दुकान में थे.

गुप्ता की दुकान के पास ही जूते-चप्पलों की दुकान के मालिक इलियास बताते हैं, ‘‘दंगों से हमारी दोस्ती पर कोई फर्क नहीं पड़ा है. हम अभी भी वैसे ही हैं, वही प्यार, मोहब्बत है. दंगों के दौरान हम साथ खड़े थे और अभी भी कोरोना वायरस महामारी के खिलाफ लड़ाई में हम परिवार की भांति साथ हैं.’’

उन्होंने कहा, ‘‘यह ईद नए कपड़ों और बिरयानी के बारे में नहीं है. यह मानवता में हमारे यकीन को पक्का करने वाला और पुराने दिनों की तरह साथ मिलकर खुशी-खुशी रहना सिखाने वाला पर्व है.’’

इलियास याद करते हैं कि कैसे उन्होंने अपने पिता के मित्र ‘बांवरिया अंकल’ को बचाया था. कुछ 25 बाहरी लोग 24 फरवरी को बांवरिया की दवाई की दुकान तोड़ने चले आए थे क्योंकि वह हिन्दू हैं. गुप्ता ने बताया कि काम-धंधा मंदा है.

उन्होंने कहा, ‘‘हिंसा के बाद से ही डर का माहौल था, लेकिन सुरक्षा बलों के कारण चीजें धीरे-धीरे पटरी पर लौट ही रही थीं कि कुछ ही दिन में लॉकडाउन लागू हो गया.’’ गुप्ता की दुकान की ज्यादातर आमदनी इलाके में रहने वाले प्रवासी कामगारों से चलती थी.

वह कहते हैं, ‘‘लॉकडाउन के कारण ज्यादातर कामगार घर लौट गए हैं. आजकल बमुश्किल ही कोई ग्राहक आता है. मेरी दुकान में अक्सर कामगार ही आते थे. लॉकडाउन के बाद भी चीजें कुछ खास नहीं बदलने वाली.’’

आगे बढ़ते हुए जब भजनपुरा पहुंचते हैं तो वहां की ज्यादातर दुकानें बंद दिखती हैं. कुछ दुकानें तो लॉकडाउन के कारण बंद हैं लेकिन कुछ ऐसी भी हैं जो दंगों में पूरी तरह जल गई थीं या इतनी जल गई थीं कि उनकी नए सिरे से मरम्मत कराने की जरुरत है.

उत्तर-पूर्वी दिल्ली के कई अन्य लोगों की तरह की मोहम्मद फुरकान और उनके परिवार के लिए भी इस साल की ईद बिरयानी, सेवइयों और खीर के बारे में नहीं है. पूरा परिवार इसबार सादा सा भोजन करने वाला है.

अपने चार भाईयों के साथ पुराने मुस्तफाबाद में करीब 20 साल से मिठाई की दुकान चला रहे फुरकान का कहना है कि रमजान के महीने में सामान्य तौर पर हमारे पास इतना काम होता है कि हम एक महीने में छह महीने जितना काम करते हैं.

ईद पर कुछ कमाई हो जाएगी, यह सोचकर फुरकान ने करीब तीन महिने बाद ईद पर दुकान खोली. कचौड़ियां बनाते हुए वह याद करते हैं कि कैसे उनकी दुकान में ग्राहकों का तांता लगा रहता था और मांग पूरी करने के लिए उन्हें अतिरिक्त मजदूर लगाने पड़ते थे.

वह कहते हैं, ‘‘अब देखो, दिख रहा है आपको कोई ग्राहक? हम सुबह सात बजे से रात नौ बजे तक दुकान खोलते थे, ईद पर ग्राहक मिठाइयां और बाकी चीजें लेने आते थे. इस साल पहले दंगों और फिर लॉकडाउन के कारण दुकान बंद रही, पिछले तीन महीने में हमारी कोई कमाई नहीं हुई है. हम ईद कैसे मनाएं , जबकि जरूरी सामान खरीदने तक के लिए हम मुश्किल से पैसे जोड़ रहे हैं? इसलिए मैंने अपनी दुकान फिर से खोलने और कचौड़ियां बनाने का फैसला किया क्योंकि उसमें कम लागत आती है.’’

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