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परमवीर: करगिल युद्ध के दौरान अकेले दुश्मनों पर टूट पड़ा था भारत सेना का ये जांबाज

दो महीने तक चलने वाले इस युद्ध के दौरान लेफ्टिनेंट मनोज पांडेय ने आगे चलकर इसका नेतृत्व किया और कुकरथांग, जूबरटॉप जैसी चोटियों को दुश्मनों के कब्जे से अपने नियंत्रण में लिया.

करगिल युद्ध के दौरान जिस वीरता का परिचय शहीद कैप्टन मनोज कुमार पांडेय ने दिया था, उसकी वजह से उन्हें मरणोपरांत सर्वोच्च वीरता पुरस्कार परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया. भारतीय सेना का यह वीर जवान दुश्मनों की गोलियों से घायल होने के बावजूद जंग के मैदान में बंदूक अपने अपनी ऊंगलियां नहीं हटाई और अकेले पाकिस्तानी घुसपैठियों के तीन बंकर नष्ट कर दिए.

लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडेय के पिता के मुताबिक, उनके सेना में जाने का सिर्फ एक ही लक्ष्य था परमवीर चक्र को हासिल करना. लेफ्टिनेंट पांडेय 1/11 गोरख रायफल्स के जवान थे. उनकी टीम को करगिल युद्ध के दौरान दुश्मन के ठिकानों को खाली करने का काम सौंपा गया था. युद्ध का मैदान खालूबर था.

यूपी के सीतापुर के रुधा गांव में पैदा हुए मनोज पांडेय को 11 गोरखा रायलफल्स रेजिमेंट कड़ी ट्रेनिंग के बाद पहली तैनाती मिली थी. मनोज पांडेय अपनी यूनिट के साथ अलग-अलग इलाकों में गए. करगिल युद्ध के दौरान उनकी बटालियन सियाचिन में थी और उनका तीन महीने का कार्यकाल भी पूरा हो गया था. लेकिन उसी दौरान आदेश आया कि बटालियन को करगिल की तरफ बढ़ना है.


परमवीर: करगिल युद्ध के दौरान अकेले दुश्मनों पर टूट पड़ा था भारत सेना का ये जांबाज

दो महीने तक चलने वाले इस युद्ध के दौरान लेफ्टिनेंट मनोज पांडेय ने आगे चलकर इसका नेतृत्व किया और कुकरथांग, जूबरटॉप जैसी चोटियों को दुश्मनों के कब्जे से अपने नियंत्रण में लिया. लेकिन 3 जुलाई 1999 को जैसे ही खालूबार की चोटी पर अपना कब्जा करने के लिए आगे बढ़े कि विरोधियों ने अंधाधुंध गोलियां बरसानी शुरू कर दी.

इसके बाद मनोज ने रात के अंधेरा होने के इंतजार किया और उसके बाद विरोधियों के बंकरों को उड़ाने शुरू कर दिए. उन्होंने पाकिस्तानी फौज के तीन बंकरों को तबाह कर दिया. मनोज पांडेय अपनी गोरखा पलटन लेकर दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र में ‘काली माता की जय’ के नारे लगाते हुए उन्होंने पाकिस्तानी दुश्मनों के जंग के मैदान में छक्के छुड़ा दिए. 

जब लेफ्टिनेंट मनोज बाकी बचे बंकरों को उड़ाने के लिए बढ़े ही थे कि दुश्मनों ने उन पर गोलियां बरसानी शुरू कर दी. जख्मी हालत में मनोज आगे बढ़ते रहे क्योंकि वह खालबार टॉप पर तिरंगा फहराना चाहते थे. लेफ्टिनेंट ने चौथे बंकर को भी उड़ाने में कामयाब रहे. लेकिन दुश्मनों ने उन्हें देख लिया और उन पर फिर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी. अपने सीनियर जवान को शहीद होते देख भारतीय जवानों रुके नहीं बल्कि चुन-चुन कर वहां के सारे बंकरों को खत्म कर दिया. आखिरकर भारतीय जवानों ने खालूबार पर तिरंगा फहराया.

ये भी पढ़ें: परमवीर: करगिल युद्ध में लहूलुहान रायफलमैन संजय कुमार ने दुश्मन को उसी की मशीन गन से चटाई थी धूल  

राजेश कुमार पत्रकारिता जगत में पिछले करीब 14 सालों से ज्यादा वक्त से अपना योगदान दे रहे हैं. राष्ट्रीय और सामाजिक मुद्दों से लेकर अपराध जगत तक, हर मुद्दे पर वह स्टोरी लिखते आए हैं. इसके साथ ही, किसी खबरों पर किस तरह अलग-अलग आइडियाज के साथ स्टोरी की जाए, इसके लिए वह अपने सहयोगियों का लगातार मार्गदर्शन करते रहे हैं. इनकी अंतर्राष्ट्रीय जगत की खबरों पर खास नज़र रहती है, जबकि भारत की राजनीति में ये गहरी रुचि रखते हैं. इन्हें क्रिकेट खेलना काफी पसंद और खाली वक्त में पसंद की फिल्में भी खूब देखते हैं. पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखने से पहले उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में मास्टर ऑफ ब्रॉडकास्ट जर्नलिज्म किया है. राजनीति, चुनाव, अंतरराष्ट्रीय संबंधों और अर्थव्यवस्था जैसे मुद्दों पर राजेश कुमार लगातार लिखते आ रहे हैं.
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