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ओबीसी सर्टिफिकेट पर अदालती फटकार के बाद क्यों मची है बंगाल में रार! यहां समझें जाति और आरक्षण का सियासी गणित

Lok Sabha Elections 2024: पश्चिम बंगाल की ममता सरकार ने पिछले 10 सालों में जिन समुदायों को इसमें शामिल किया गया है. उसमें सबसे ज्यादा तव्ज्जो मुस्लिमों को दी गई है.

Lok Sabha Elections 2024: कलकत्ता हाई कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में कई वर्गों का ओबीसी दर्जा रद्द कर दिया. साल 2010 से 77 समुदायों को ओबीसी सर्टिफिकेट बांटे गए थे. उन्हें हाई कोर्ट ने रद्द कर दिया. इनमें से ज्यादातर मुस्लिम समुदाय से जुड़े हुए थे. हाईकोर्ट ने अपने फैसले में साफ किया है कि जिन वर्गों का ओबीसी दर्जा हटाया गया है, उसके सदस्य अगर पहले से ही सेवा में हैं या आरक्षण का लाभ ले चुके हैं तो उनकी सेवाएं इस फैसले से प्रभावित नहीं होंगी.  

दरअसल, इस चुनावी माहौल में ये बड़ा मुद्दा हो गया है, जब छठे चरण के चुनाव में 2 दिन ही बाकी हैं. ऐसे में इसका सीधा असर होने वाली लोकसभा सीटों पर पड़ सकता है. चूंकि, बीजेपी ने इसे ममता सरकार की तुष्टीकरण की राजनीति करने की बात कही है. ममता सरकार ने ओबीसी वर्गों को दो वर्गों में बांट रखा था ओबीसी ए और ओबीसी बी. जिसमें ओबीसी ए का मतलब अति पिछड़े से होता है. जबकि, ओबीसी बी का मतलब सिर्फ पिछड़ा से होता है.

OBC की लिस्ट में बंगाल सरकार ने ज्यादातर मुस्लिम जातियों को डाला

वहीं, ममता सरकार ने पिछले 10 सालों में जिन समुदायों को इसमें शामिल किया गया है. उसमें सबसे ज्यादा तव्ज्जो मुस्लिमों को दी गई है. हालांकि, उन पर ये भी आरोप लगे हैं कि रोहिंग्या और बांग्लादेश से आए लोगों को भी इस लिस्ट में शामिल किया गया है. ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या ओबीसी लिस्ट को लेकर आया कोर्ट का फैसला ममता बनर्जी के वोटों पर असर पड़ेगा?

पश्चिम बंगाल में OBC आरक्षण का क्या है इतिहास?

साल 2010 में  पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा सरकार सत्ता में थी. उस दौरान वाम मोर्चा ने 53 जातियों को ओबीसी की कैटागिरी में डाल दिया था. उस दौरान वाम मोर्चा सरकार ने ओबीसी के आरक्षण को 7 से 17 प्रतिशत करना चाहा था. जबकि, वाम सरकार साल 2011 में सत्ता से बाहर हो गई तो ये कानून नहीं बन पाया था. इसके बाद बंगाल में 2012 ममता दीदी की सरकार आई. जो ओबीसी वर्ग को आरक्षण देता है.

ममता सरकार ने इस आरक्षण में 35 नई जातियों को जोड़ा गया. जिसमें 33 मुस्लिम समुदाय से ओबीसी आरक्षण 7 फीसदी से बढ़ाकर 17% कर दिया. हालांकि, इस कानून के बनने से प्रदेश की 92% मुस्लिम आबादी को आरक्षण का लाभ मिला.

बंगाल में ओबीसी आरक्षण का क्या है गणित?

पश्चिम बंगाल सरकार ओबीसी वर्ग को 17 फीसदी आरक्षण देती है. जहां इसे दो हिस्सों में बांटा गया है. जिसमें ओबीसी ए और ओबीसी बी. जबकि, ओबीसी ए की श्रेणी में 81 जातियां हैं, इसमें से 56 मुस्लिम हैं. वहीं, दूसरी ओबीसी बी की श्रेणी में 99 जातियां हैं जिसमें 41 जातियां मुस्लिम हैं. अब कोर्ट ने कहा है कि मुस्लिमों की 77 जातियों को सरकार ने पिछड़ा वर्ग में शामिल कर उनका अपमान किया है. 77 समुदायों में से, 42 को 2010 में तत्कालीन वाम मोर्चा सरकार ने ओबीसी दर्जा दिया था.

कोर्ट ने कहा, इनमें से 41 मुस्लिम थे. फैसले के अनुसार अन्य 35 जिनमें से 34 मुस्लिम थे उसे ममता सरकार ने 11 मई 2012 को नोटिफिकेशन जारी करके ओबीसी लिस्ट में शामिल किया था.

2012 के कानून को HC ने किया रद्द

इस कानून के कारण पश्चिम बंगाल में सरकारी नौकरी में ओबीसी कैंडिडेट को आरक्षण मिलना शुरू हुआ. इसके कुछ प्रावधान को कोर्ट में चुनौती दी गई. कोर्ट ने सुनवाई करते हुए 2012 के उस कानून के प्रावधान को रद्द कर दिया. अब इन पर आरोप है कि पश्चिम बंगाल में पिछला आयोग अधिनियम 1993 चल रहा है. उससे अलग हटकर टीएमसी ने लिस्ट जारी की. जो पूरी तरह से गैर कानूनी है.

जानिए पश्चिम बंगाल का जातिगत समीकरण?

बता दें कि, पश्चिम बंगाल में सवर्ण  जाति 20 प्रतिशत हैं, जबकि, ओबीसी 24 प्रतिशत और एससी 20 प्रतिशत एसटी 6 प्रतिशत हैं. इसके साथ ही मुस्लिम 27 प्रतिशत में हैं, और अन्य जातियां 3 प्रतिशत हैं, जिसमें से मुस्लिम समुदाय की 27% आबादी में से 85 प्रतिशत ओबीसी कैटगरी में शामिल हो गई हैं.

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