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मनोज जरांगे कौन हैं, जिनकी एक आवाज पर लाखों लोगों ने उठा लिया मराठा आंदोलन का झंडा

गुरुवार को मराठा आंदोलनकारी नवी मुंबई में थे और 26 जनवरी को ये आजाद मैदान पहुंचेंगे. यहां अनिश्चितकाल के लिए मराठा आंदोलन को आगे बढ़ाया जाएगा.

देश की आर्थिक राजधानी मुंबई जाम होने वाली है. मायानगरी की 45 लाख से ज्यादा गाड़ियों के पहियों पर ब्रेक लग सकते हैं क्योंकि मराठा समुदाय का जनसैलाब मुंबई की तरफ बढ़ रहा है. मराठाओं को कुनबी समाज में शामिल करने और ओबीसी कैटेगरी का दर्जा देने को लेकर यह आंदोलन छेड़ा गया है और आंदोलन की अगुवाई मनोज जरांगे पाटिल कर रहे हैं. वही मनोज जरांगे, जो कुछ दिन पहले मराठा आरक्षण को लेकर भूख हड़ताल पर बैठ थे.

महाराष्ट्र की कुल 33 फीसदी आबादी यानी करीब 4 करोड़ लोगों के हक की लड़ाई के लिए मनोज जरांगे मुंबई के आजाद मैदान की तरफ कूच कर रहे हैं. 20 जनवरी को महाराष्ट्र के जालना जिले के अंतरवाली सराटी से मराठा आंदोलन की दोबारा शुरुआत हुई थी. 

कौन हैं मनोज जरांगे?
गुरुवार (25 जनवरी, 2024) को आदंलोनकारी नवी मुंबई में थे और आज यानी 26 जनवरी को आजाद मैदान पहुंचकर अनिश्चितकाल के लिए आंदोलन को आगे बढ़ाया जाएगा. सवाल है कि जिसके पीछे भीड़ है, जिसकी एक आवाज पर लाखों लोगों ने मराठा आंदोलन का झंडा उठा लिया, न सर्दी देखी, न गर्मी, मराठाओं के योद्धा, मनोज जरांगे पाटिल हैं कौन? 

महाराष्ट्र के बीड में जन्मे मनोज जरांगे पहले होटल में वेटर का काम करते थे. 40 साल के मनोज जरांगे 2014 से मराठा रिजर्वेशन के लिए आंदोलन कर रहे हैं. मराठा समुदाय के सशक्तिकरण के लिए मनोज जरांगे ने शिवबा संगठन भी बनाया है. मरोज जरांगे ने महाराष्ट्र सरकार का पूरा सिस्टम हिला दिया. जरांगे और लाखों आंदोलकारियों को रोकने के लिए मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे पर भारी पुलिस बल मुस्तैद है. जरांगे का दावा है कि ढाई करोड़ मराठा अपनी ताकत दिखाने के लिए मुंबई के आजाद मैदान में जुटेंगे.

बैकफुट पर शिंदे सरकार
मनोज जरागें का कहना है कि मराठा आरक्षण के लिए अपनी जान तक देने को तैयार हैं. बिना आरक्षण लिए वापस नहीं जाएंगा और मुंबई में अपनी ताकत दिखाएंगे. नवी मुंबई की सड़कों पर मराठा समुदाय की आंधी देख एकनाथ शिंदे सरकार बैकफुट पर है और आंदोलन खत्म करने की अपील की जा रही है. शिंदे सरकार ने आंदोलन रुकवाने के लिए बॉम्बे हाई कोर्ट का भी रुख किया,लेकिन कोर्ट ने रोक लगाने से इनकार कर दिया. कोर्ट ने साफ कहा, राज्य सरकार सुनिश्चित करे कि सड़कों पर ट्रैफिक नहीं रुकना चाहिए.

सड़कों पर लाखों लोग हैं. भूख हड़ताल की तैयारी की जा रही है. इतना सबकुछ होने के बावजूद भी शिंदे सरकार मनोज जरांगे की मांग को नजर अंदाज क्यों कर रही है? प्रदर्शनकारियों का कहना है कि मराठा उच्च जाति से नहीं बल्कि मूल रुप से कुनबी यानी कृषि समुदाय से जुड़े थे. कुनबी समुदाय को महाराष्ट्र में OBC का दर्जा मिला हुआ है इसलिए मराठा समुदाय को भी OBC में शामिल किया जाए. मराठा समुदाय की कुल आबादी में से 90 फीसदी भूमिहीन किसान हैं.

महाराष्ट्र में खुदकुशी करने वालों में 90 फीसदी किसान मराठा
सबसे बड़ी बात यह भी है कि महाराष्ट्र में जितने किसान खुदकुशी करते हैं, उनमें से 90 फीसदी मराठा समुदाय के ही होते हैं. इससे पहले भी अक्टूबर 2023 में मनोज जरांगे ने जालना में भूख हड़ताल की थी. मांग वही थी, मराठा समुदाय को OBC का दर्जा दिया जाए. भूख हड़ताल के महज 9 दिनों के अंदर 29 लोगों ने आत्महत्या कर ली थी.

एक दशक पुराना है मराठा समुदाय का यह आंदोलन
महाराष्ट्र सरकार पहले भी मराठा आंदलोन को आरक्षण देने का वादा कर चुकी है. जरांगे ने शिंदे सरकार को वादा पूरा करने के लिए 2 जनवरी, 2024 का समय दिया था. वादा पूरा नहीं हुआ तो मनोज जरांगे ने फिर से हुंकार भरी. राज्य में मराठा आंदोलन की मांग एक दशक से हो रही है. साल 2018 में राज्य सरकार ने नौकरी और शिक्षा में मराठा समाज को 16 फीसद आरक्षण दिया था. जन, 2019 में बॉम्ब हाईकोर्ट ने इसे कम करते हुए नौकरी में 12 फीसदी और शिक्षा में 13 फीसदी आरक्षण कर दिया.

बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा कि अपवाद के तौर पर राज्य में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित 50 फीसदी आरक्षण की सीमा पार नहीं की जा सकती है. मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया. इंदिरा साहनी केस और मंडल कमीशन केस का हवाला देते हुए कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी.

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