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'फर्जी केस' का बड़ा सच: NCRB 2024 में खुलासा- रेप के 3,776, किडनैपिंग के 15,073 मामले निकले झूठे

NCRB Data: NCRB 2024 रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं के खिलाफ अपराधों से जुड़े 78 हजार से ज्यादा मामले जांच में झूठे पाए गए. जानिए किन राज्यों और अपराधों में सबसे ज्यादा फर्जी केस मिले.

महिलाओं के खिलाफ अपराध के बढ़ते आंकड़ों के बीच एक और अहम परत सामने आई है—हजारों ऐसे मामले, जो जांच में ‘झूठे’ पाए गए. NCRB 2024 के अनुसार, देशभर में बड़ी संख्या में केस पुलिस जांच के बाद “फाइनल रिपोर्ट फॉल्स” श्रेणी में बंद किए गए, यानी आरोप तथ्यात्मक रूप से साबित नहीं हुए. कुल मिलाकर, महिलाओं के खिलाफ अपराध (IPC/BNS और SLL सहित) के 7,06,236 मामलों की जांच हुई, जिनमें से 78,026 केस फर्जी पाए गए—यह कुल मामलों का लगभग 11.05% है.

यह आंकड़ा दो अहम पहलुओं की ओर इशारा करता है. पहला, जांच एजेंसियों पर मामलों का भारी बोझ, जहां हर दस में से एक केस प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज हो जाता है. दूसरा, यह सवाल कि क्या शिकायत दर्ज कराने की प्रक्रिया और प्रारंभिक जांच को और मजबूत करने की जरूरत है, ताकि वास्तविक मामलों को प्राथमिकता मिल सके और न्याय की प्रक्रिया अधिक प्रभावी बन सके.

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राष्ट्रीय तस्वीर: किन मामलों में सबसे ज्यादा ‘फर्जी’ रिपोर्टिंग

NCRB 2024 के आंकड़े दिखाते हैं कि महिलाओं के खिलाफ दर्ज कई गंभीर अपराधों में भी झूठी शिकायतों का एक अहम हिस्सा मौजूद है. सबसे पहले रेप के मामलों पर नजर डालें—कुल 70,551 मामलों की जांच में 3,776 केस (5.35%) फर्जी पाए गए, जिनमें 3,743 वयस्क महिलाओं और 33 नाबालिग लड़कियों से जुड़े मामले शामिल हैं.

“मर्डर विद रेप/गैंगरेप” जैसे बेहद गंभीर अपराध में भी, 708 मामलों की जांच में 12 केस (1.69%) फर्जी निकले, जो संख्या में भले कम हो, लेकिन इस श्रेणी की संवेदनशीलता को देखते हुए महत्वपूर्ण है.

सबसे ज्यादा झूठी रिपोर्टिंग किडनैपिंग/अपहरण में सामने आई. 99,950 मामलों की जांच में 15,073 केस (15.08%) फर्जी पाए गए—यानी हर सात में से लगभग एक मामला. इनमें जबरन शादी के लिए अपहरण के 3,023 केस भी जांच में असत्य निकले.

यह ट्रेंड इस ओर संकेत करता है कि पारिवारिक, सामाजिक या रिश्तों से जुड़े विवाद कई बार आपराधिक मुकदमे का रूप ले लेते हैं. कुल मिलाकर, डेटा यह बताता है कि अपराध की गंभीरता के साथ-साथ फर्जी मामलों की परत भी उतनी ही जटिल चुनौती बन चुकी है.

टॉप 10 राज्य: जहां सबसे ज्यादा फर्जी केस

राज्यों के स्तर पर इन मामलों का वितरण बेहद असमान है:

  • राजस्थान – 12,217
  • मध्य प्रदेश – 6,618
  • हरियाणा – 5,249
  • कर्नाटक – 3,126
  • छत्तीसगढ़ – 2,225
  • उत्तर प्रदेश – 1,905
  • तेलंगाना – 1,389
  • आंध्र प्रदेश – 603
  • केरल – 503
  • बिहार – 435

राजस्थान अकेले लगभग एक-तिहाई फर्जी मामलों के साथ सबसे ऊपर है, जो एक विशिष्ट क्षेत्रीय पैटर्न की ओर संकेत करता है.

शहरों में ट्रेंड: बेंगलुरु और दिल्ली आगे

महानगरों में कुल 2,838 मामले ‘फाइनल रिपोर्ट फॉल्स’ के तहत बंद किए गए. इनमें:

बेंगलुरु – 839
दिल्ली – 616
पुणे – 15
चेन्नई – 6
हैदराबाद – 3
अहमदाबाद – 1
सूरत – 1

बेंगलुरु और दिल्ली मिलकर 50% से ज्यादा मामलों के लिए जिम्मेदार हैं, जो शहरी इलाकों में शिकायत और जांच के जटिल पैटर्न को दिखाता है.

‘फर्जी’ और ‘गलतफहमी’ में फर्क

यह समझना बेहद जरूरी है कि “फाइनल रिपोर्ट फॉल्स” और “मिस्टेक ऑफ फैक्ट/लॉ” दो अलग श्रेणियां हैं. फॉल्स केस में घटना वैसी हुई ही नहीं, जैसा आरोप लगाया गया, जबकि मिस्टेक ऑफ फैक्ट में घटना हुई, लेकिन उसे कानूनी या तथ्यात्मक रूप से गलत समझा गया. उदाहरण के तौर पर, 3,776 रेप केस फर्जी पाए गए, जबकि 714 मामले ‘मिस्टेक ऑफ फैक्ट’ के तहत बंद हुए.

कुल मिलाकर, करीब 15% मामले पुलिस स्तर पर ही बंद हो जाते हैं, यानी वे अदालत तक नहीं पहुंचते. इसका दोहरा असर पड़ता है—एक ओर वास्तविक पीड़ितों के मामलों की गंभीरता कमजोर पड़ती है, दूसरी ओर जांच एजेंसियों पर अनावश्यक दबाव बढ़ता है.

डेटा यह भी दिखाता है कि किडनैपिंग/अपहरण में फर्जी रिपोर्टिंग सबसे ज्यादा (15.08%), इसके बाद कुल अपराध (11.05%) और रेप (5.35%) हैं. साथ ही, 99,146 मामले ‘मिस्टेक ऑफ फैक्ट/लॉ’ के तहत बंद हुए. यह आंकड़े एक जटिल चुनौती पेश करते हैं—सिस्टम ऐसा कैसे बने, जो असली पीड़ितों को तेज न्याय दे और झूठे मामलों को समय रहते छांट सके?

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