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खालिस्तान आंदोलन का इतिहास और मांग, क्या इंदिरा की तरह मोदी के सामने है बड़ी चुनौती, जानिए सब कुछ?

खालिस्तान को लेकर पंजाब में मचा बवाल नया नहीं है. 1978 से पहले वहां अहिंसक विरोध होता था, लेकिन 1978 के बाद यह हिंसा में बदल गया. खालिस्तान आंदोलन की वजह से हजारों लोगों की जान जा चुकी है.

खालिस्तान की मांग कर रहे अमृतपाल पर पंजाब पुलिस की कार्रवाई पिछले चार दिनों से जारी है. खालिस्तान को लेकर लड़ाई में तेजी लाने के लिए अमृतपाल आनंदपुर खालसा फौज के नाम से एक संगठन भी बनाया था. खालिस्तान आंदोलन में आनंदपुर का नाम अहम रहा है. 

खालिस्तान आंदोलन के अगुवा मास्टर तारा सिंह के निधन के बाद 1973 में पहली बार यहीं पर खालिस्तान को लेकर एक प्रस्ताव पास किया गया था. आनंदपुर साहब में ही सिखों के अंतिम गुरू गोविंद सिंह ने खालसा पंथ की स्थापना की थी.

पंजाब में अमृतपाल पर लेकर जारी बवाल में आनंदपुर और खालिस्तान का जिक्र फिर से आ गया है. ऐसे में आइए विस्तार से जानते हैं खालिस्तान आंदोलन क्या था और पूरे पंजाब में यह कैसे फैला?

खालिस्तान आंदोलन मोदी सरकार के लिए कितनी बड़ी चुनौती?
पंजाब और राष्ट्रीय राजनीति को करीब से देखने वाले वरिष्ठ पत्रकार मनमोहन शर्मा कहते हैं- खालिस्तान शुरू से ही एक सेंसिटिव मुद्दा रहा है. पंजाब के अलावा इस आंदोलन को विश्व के कई देशों में भी सहयोग मिलता है. यानी इसका क्षेत्र सिर्फ भारत ही नहीं है.

शर्मा आगे कहते हैं, 'अमृतपाल पर ऑपरेशन के दौरान जिस तरह से पंजाब पुलिस ने पैसे और हथियार की बात कही है, उससे सीमा पर इंटेलिजेंस की भूमिका पर भी सवाल उठ रहा है. इसे ठीक करना भी केंद्र के लिए चुनौती का काम है'.

भिंडरावाले और अमृतपाल की तुलना के सवाल पर मनमोहन शर्मा कहते हैं- उस वक्त केंद्र सरकार ने काफी देर से इस पर एक्शन लिया था, इस बार एक्शन लेने में सरकार ने ज्यादा देरी नहीं की, इसलिए मुझे नहीं लगता है यह आंदोलन ज्यादा टिकेगा.

पंजाब में बार-बार क्यों उठ रही है खालिस्तान की मांग?
खालसा शब्द अरबी भाषा के खालिस से बना है, जिसका अर्थ होता है- शुद्ध. गुरू गोविंद सिंह ने 1699 में सिख में खालसा पंथ की स्थापना की थी. खालिस्तान इसी खालसा से बना है और इसका मतलब है- खालसाओं का राज. 

आजादी से पहले 1929 के लाहौर अधिवेशन में कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज्य की मांग का प्रस्ताव रखा. इस प्रस्ताव का कांग्रेस के भीतर ही 3 नेताओं ने विरोध किया. 

मोहम्मद अली जिन्ना- मुसलमानों को हिस्सेदारी मिले.

मास्टर तारा सिंह- सिखों को हिस्सेदारी मिले.

भीमराव अंबेडकर- दलितों को हिस्सेदारी मिले और अलग निर्वाचन व्यवस्था की जाए.

इन तीन मांगों के बाद कांग्रेस सकते में आ गई.  हालांकि अधिवेशन में पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव पास हो गया, लेकिन तीनों खेमे आंदोलन के दौरान भी अपनी मांगों को पुरजोर तरीके से उठाते रहे. 

मास्टर तारा सिंह और खालिस्तान की मांग
अकाली आंदोलन के संस्थापक सदस्य मास्टर तारा सिंह ही खालिस्तान आंदोलन के अगुवा थे. वरिष्ठ पत्रकार मनमोहन शर्मा के मुताबिक तारा सिंह सिखों को राजनीतिक हिस्सेदारी देने के हिमायती रहे हैं. आजादी से पहले उन्हें उस वक्त मोहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान की मांग का समर्थन करने के लिए कहा था. बदले में जिन्ना उन्हें उप-प्रधानमंत्री बना देने का वादा किया था, लेकिन तारा सिंह ने इस मांग को ठुकरा दिया.

आजादी के बाद खालिस्तान की मांग जोर पकड़ ली. इसकी बड़ी वजह पंजाब का विभाजन माना गया. पाकिस्तान के अलग होने के बाद पंजाब दो भागों में बंट गया, सिखों के कई प्रमुख गुरुद्वारे पाकिस्तान शासित पंजाब में चले गए, जिसका मास्टर तारा सिंह ने विरोध किया.

1956 में पंडित नेहरू और मास्टर तारा सिंह के बीच एक समझौता हुआ. इसमें सिखों के आर्थिक, शैक्षणिक और धार्मिक हितों की रक्षा की बात कही गई. यह समझौता 5 साल तक ही चला और फिर टूट गया. मास्टर तारा सिंह ने 1961 में अलग पंजाबी सूबे की मांग को लेकर आमरण अनशन शुरू कर दिया. तारा सिंह के समर्थन में हजारों सिख एकजुट हो गए.

सिखों का कहना था कि भाषा के आधार पर अलग पंजाब राज्य का गठन हो और गुरुमुखी को भी भाषाओं की सूची में शामिल किया जाए. इस आंदोलन को उनकी बेटी राजेंद्र कौर ने खत्म करवाई. 1966 में भाषा के आधार पर पंजाब को अलग राज्य बना दिया गया. हालांकि, चंडीगढ़ को अलग करते हुए केंद्रशासित प्रदेश बनाया गया.

अकाली में टूट और आनंदपुर का अधिवेशन
1967 में अकाली दल ने पंजाब में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई. गुरनाम सिंह को अकाली दल का नेता चुना गया और वे मुख्यमंत्री बनाए गए, लेकिन 250 दिन बाद ही उनकी सरकार में बगावत हो गई. लक्ष्मण सिंह गिल के नेतृत्व में 16 विधायकों ने अलग गुट बना लिया. इस गुट ने कांग्रेस ने समर्थन दे दिया. पंजाब में 1971 तक राजनीतिक उथल-पुथल का दौर जारी रहा.

1971 में बांग्लादेश विभाजन के बाद पंजाब में इंदिरा गांधी को जबरदस्त सर्मथन मिला. इस चुनाव में अकालियों का पत्ता साफ हो गया. इसके बाद फिर शुरू हुई अलग खालिस्तान की मांग. 1973 में अकाली दल ने आनंदपुर साहिब में एक प्रस्ताव पास किया. 1978 में भी इस प्रस्ताव को दोहराया गया. प्रस्ताव में 3 मुख्य बातें कही गई थी. 

1. पंजाब को जम्मू-कश्मीर की तरह स्वायत्ता मिले. सिर्फ रक्षा, विदेश, संचार और मुद्रा पर केंद्र का दखल रहे.

2. केंद्रशासित प्रदेश चंडीगढ़ को पूरी तरह से पंजाब को सौंप दिया जाए. 

3. पूरे देश में गुरुद्वारा समिति का निर्माण हो और सिखों को सेना में अधिक जगह मिले.

अनशन से कैसे हिंसा में बदला खालिस्तान का आंदोलन?
मास्टर तारा सिंह खालिस्तान की मांग को लेकर अहिंसक आंदोलन का सहारा लेते रहे, लेकिन 1967 में उनकी मृत्यु के बाद खालिस्तान का आंदोलन हिंसा में तब्दील हो गया. इसके पीछे 2 बड़ी वजह थी. 

  • बांग्लादेश हारने के बाद पाकिस्तान ने भारत से बदला लेने के लिए छद्म युद्ध का सहारा लिया. उग्रवादी सिख संगठनों को पाकिस्तान की ओर से फंडिंग और हथियार की व्यवस्था की गई. पैसे और हथियार की लालच में सिख युवा आ गए, जिससे यह आंदोलन और तेज होता गया.
  • पंजाब बनने के बाद से ही वहां राजनीतिक उथल-पुथल का दौर शुरू हो गया. ज्ञानी जैल सिंह को छोड़कर कोई भी मुख्यमंत्री 5 साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए. राजनीतिक अस्थिरता का फायदा उठाकर आंदोलन के नेता इसे हिंसक बनाते चले गए. 

अमृतसर में निरंकारियों से विवाद और भिंडरावाले का उदय
1978 में अमृतसर में निरंकार संप्रदाय के साथ अकाली दलों का विवाद हो गया. निरंकार समुदाय के लोगों को जीवित गुरुओं पर विश्वास है, जबकि सिख गुरु गोविंद सिंह के बाद किसी को गुरु नहीं मानते हैं. दोनों के बीच यह विवाद वर्षों पुराना है. लेकिन 1978 में हुए विवाद में 13 अकाली कार्यकर्ताओं की मौत हो गई. इसमें जरनैल सिंह भिंडरावाले के करीबी फौजा सिंह भी शामिल था.

कोर्ट में यह केस चला और निरंकारी संप्रदाय के प्रमुख गुरुबचन सिंह केस में बरी हो गए. इसके बाद पंजाब में शुरू हुआ भिंडरावाले के आतंक का दौर. भिंडरावाले के समर्थकों ने 1980 में गुरुबचन सिंह की हत्या कर दी. कई जगहों पर हिंदुओं और निरंकारी समुदाय के लोग मारे जाने लगे.

पंजाब में लॉ एंड ऑर्डर पूरी तरह ध्वस्त हो गया. चरमपंथ के सहारे सिखों में पैठ बनाने के बाद भिंडरावाले ने अमृतसर के पवित्र स्वर्ण मंदिर को अपना ठिकाना बना लिया. अकाल तख्त से ही भिंडरावाले सिखों के लिए संदेश जारी करना शुरू कर दिया. अकाल तख्त का संदेश सिख समुदाय के लिए सर्वोपरि होता है. 

1982 में भिंडरावाले ने अकाली दल से हाथ मिला लिया और धर्मयुद्ध लॉन्च कर दिया. पंजाब में खालिस्तान आंदोलन के विरोध में बोलने वाले लोगों को भिंडरावाले और उनके समर्थक मौत के घाट उतार रहे थे. 1983 में जालंधर के डीआईजी एएस अटवाल को स्वर्ण मंदिर के सीढ़ी पर गोलियों से भून दिया गया. इसके बाद इंदिरा गांधी ने ऑपरेशन ब्लू स्टार शुरू करने का आदेश दे दिया.

ऑपरेशन ब्लू स्टार ने कुचला आंदोलन, हजारों मरे
पंजाब में कानून व्यवस्था ध्वस्त होने के बाद इंदिरा सरकार ने राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया. पंजाब में आईबी के अधिकारियों को भेजा गया. खुफिया जानकारी मिलने के बाद सेना ने ऑपरेशन ब्लू स्टार की शुरुआत की. इस ऑपरेशन में स्वर्ण मंदिर के भीतर सेना के टैंक को दाखिल करा दिया गया. 

ऑपरेशन के दौरान दोनों ओर से भीषण गोलीबारी हुई. आखिर में जरनैल भिंडरावाले मारा गया. सरकारी रिपोर्ट में कहा गया कि ऑपरेशन के दौरान 83 जवान शहीद हुए, जबकि 458 चरमपंथी मारे गए. हालांकि, सिख संगठनों ने 3000 लोगों के मारे जाने का दावा किया. सिख संगठन का कहना था कि इस ऑपरेशन से आम नागरिकों की भी मौत हुई है. इस ऑपरेशन के बाद इंदिरा गांधी का जमकर विरोध हुआ. कैप्टन अमरिंदर सिंह समेत कई सिख नेताओं ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया. 

इंदिरा, बेअंत और आर्मी चीफ की हत्या, हवाई जहाज उड़ाया
ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद बब्बर खालसा और अन्य आतंकी संगठन सक्रिय हो गया. ऑपरेशन के कुछ महीनों बाद ही प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई. उनकी हत्या उनके सुरक्षाबल में शामिल 2 सिख जवानों ने कर दी.

इंदिरा गांधी के अलावा पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या 1995 में कर दी गई. बेअंत सिंह कार से एक कार्यक्रम में जा रहे थे, उसी वक्त एक सुसाइड बम से उन पर अटैक किया गया था. 1987 में भारत के पूर्व आर्मी चीफ जनरल एएस वैद्य को भी गोलियों से भून दिया गया.

कनाडा से लंदन होते हुए भारत आने वाली एयर इंडिया के विमान कनिष्क को 1986 में उग्रवादियों ने हवा में ही उड़ा दिया. इस हमले में 329 लोगों की मौत हो गई. हालांकि, केंद्र और राज्य के संयुक्त ऑपरेशन की वजह से खालिस्तान आंदोलन की मांग पंजाब में शांत हो गई.

अमृतपाल बना रहा था आर्मी, पाकिस्तान से आ रहे थे हथियार

अलग देश खालिस्तान की मांग करने वाले 'वारिस पंजाब दे' संगठन पर पंजाब पुलिस का ऑपरेशन जारी है. पुलिस के मुताबिक संगठन के सरगना अमृतपाल अब भी फरार है, लेकिन उसके 116 साथियों को गिरफ्तार कर लिया गया है. शुरुआती जांच के बाद पंजाब पुलिस ने दावा किया है कि अमृतपाल के ड्रग माफिया से संबंध हैं. वह अलग सिख देश बनाने के लिए पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के संपर्क में था.

पुलिस ने बताया कि खालिस्तान आंदोलन की फंडिंग ड्रग माफिया कर रहे थे. पाकिस्तानी एजेंसी से अमृतपाल के संगठन को हथियार और गोला बारूद मिल रहा था. पुलिस ने अमृतपाल को अरेस्ट करने के लिए 10 जिलों में नाकेबंदी कर दी है. पुलिस की कार्रवाई बीच एनआईए की 8 टीमें भी पंजाब पहुंच गई है, जो टेरर एंगल से पूरे मामले की जांच करेगी.

खालिस्तान को अलग देश बनाने के लिए अमृतपाल सैन्य मोर्चे पर भी रणनीति बना रहा था. इसके लिए अमृतपाल ने आनंदपुर खालसा फौज (एकेएफ) का गठन कर रखा था. एकेएफ में शामिल लोगों के लिए बुलेट प्रूफ जैकेट की व्यवस्था की गई थी. पुलिस ने अमृतपाल के 458 करीबियों की पहचान की गई है, जो इस मुहिम में शामिल थे. 

पंजाब में खालिस्तान को अलग देश बनाने की मांग नई नहीं है, लेकिन हालिया विवाद सितंबर 2022 के बाद तब शुरू हुआ जब अमृतपाल को 'वारिस पंजाब दे' की कमान सौंपी गई. अमृतपाल सितंबर 2022 में जरनैल सिंह भिंडरावाले के गांव जाकर एक रैली का आयोजन किया था जिसमें युवाओं से खालिस्तान के लिए लड़ने का आह्वान किया था.

इसके बाद अमृतपाल जालंधर, तरणतारन, अमृतसर और गुरदासपुर में अपना संगठन फैलाना शुरू कर दिया था. पिछले महीने एक पब्लिक मीटिंग में गृहमंत्री अमित शाह को भी धमकी देते नजर आया था. अमृतपाल खालिस्तान बनाने की मांग को लेकर लगातार मीडिया को भी इंटरव्यू दे रहा था. 

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