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IN DEPTH: कर्नाटक के किस हिस्से में कौन है भारी? क्या है असली सियासत?

कर्नाटक चुनाव के लिए चुनावी प्रचार का शोर थम गया है. 12 मई को 223 विधानसभा सीटों के लिए वोट डाले जाएंगे.

बेंगलुरु: कर्नाटक चुनाव के लिए चुनावी प्रचार का शोर थम गया है. 12 मई को 223 विधानसभा सीटों के लिए वोट डाले जाएंगे. कर्नाटक दक्षिण का बड़ा राज्य है जहां कई पार्टियों की साख दांव पर लगी है. सवाल ये है कि क्या चुनाव दर चुनाव हार रही कांग्रेस अपना आखिरी सबसे बड़ा किला बचा पायेगी? क्या बीजपी दक्षिण में एंट्री कर पाएगी? या जेडीएस किंगमेकर बनेगी.

कर्नाटक छह हिस्सों बेंगलुरु, ओल्ड मैसूरु, कोस्टल कर्नाटक, बॉम्बे-कर्नाटक, हैदराबाद-कर्नाटक और मध्य कर्नाटक में बंटा हुआ है. हर हिस्से के अपने राजनीतिक समीकरण हैं.

बॉम्बे-कर्नाटक (50/224)

बॉम्बे-कर्नाटक को वैसे तो लिंगायतों का गढ़ कहा जाता है. 2013 में कांग्रेस की सत्ता वापसी के पीछे बॉम्बे-कर्नाटक को बड़ा कारण बताया जाता है.यहां 50 सीटों में से कांग्रेस 31 सीटें जीतने में कामयाब रही. दरअसल 2013 के चुनाव में यहां त्रिकोणीय मुकाबला था. येदियुरप्पा को भ्रष्टाचार के आरोप में पार्टी से निकाल दिया गया था जिसके बाद उन्होंने अलग पार्टी बनाकर चुनाव लड़ा था. इस सीट पर येदियुरप्पा की पार्टी कर्नाटक जनता पक्ष, बीजेपी और कांग्रेस के बीच टक्कर थी. येदियुरप्पा लिंगायतों के बड़े नेता माने जाते हैं. ऐसे में लिंगायत वोट तीन हिस्सों में बंट गया था जिसका सीधा फायदा कांग्रेस को हुआ.

चूंकि इस बार येदियुरप्पा बीजेपी में लौट आये हैं, ऐसे में मुख्य मुकाबला बीजेपी और कांग्रेस के बीच है. बीजेपी उम्मीद कर रही है कि येदियुरप्पा के आने से लिंगायतों का वोट उन्हें मिलेगा. जबकि कांग्रेस का मानना है कि इस बार अलग धर्म के फैसले से लिंगायत उनके पक्ष में वोट करेंगे. बता दें कि इस इलाके में बेलगावी, हुबली-धारवाड़, बागलकोट, विजयपुरा और गदग ज़िले आते हैं. यहां सूखा, किसानों की आत्महत्या, महदायी नदी से गोवा का पानी नहीं छोड़ना, गन्नों के सही दाम नहीं मिलना जैसे कई मुद्दे भी हैं.

मध्य कर्नाटक (26/224)

मध्य कर्नाटक में 4 ज़िले आते हैं शिवमोगा, चित्रदुर्गा, दावणगेरे और चिक्कमगलुरु. मध्य कर्नाटक येदियुरप्पा का गढ़ है लेकिन यहां चुनाव बीजेपी, कांग्रेस और जेडीएस के बीच है. मध्य कर्नाटक में भी 2013 में बीजेपी और येदियुरप्पा की पार्टी के आपस में बंट जाने के कारण कांग्रेस को फायदा हुआ था. लेकिन इस बार बीजेपी यहां से भी अच्छे स्कोर की उम्मीद कर रही है. खुद येदियुरप्पा भी शिवमोगा के शिकारीपुरा से लड़ रहे हैं. इसके अलावा यहां मठ, शीर की संख्या ज्यादा है जहां अमित शाह हों या राहुल गांधी हर कोई जाते दिखा. यहां दलितों और लिंगायतों की संख्या ज्यादा है.

बेंगलुरु (28/224)

बेंगलुरु शहरी इलाका है. शहरों में अमूमन बीजेपी का पलड़ा भरी देखा जाता है. यहां जातिगत समीकरण से दूर इस शहर के अपने कई मुद्दे हैं. यहां 224 में से 28 सीटें हैं. इस बार यहां सिद्दारमैया सरकार के खिलाफ विरोध की लहर देखी जा रही है. शहर के विकास, इंफ्रास्ट्रक्चर, गड्ढे वाली सड़कें और उनसे हुई मौतें, आग उगलती झीलें और ट्रैफिक अहम् मुद्दे हैं.

यहां कांग्रेस की सरकार के खिलाफ गुस्सा काफी देखा जा सकता है. यही कारण है कि शहर के गरीब वोटरों को अपने पाले में करने के लिए सिद्दरमैय्या सरकार ने "इंदिरा कैंटीन", हिंदी विरोधी और प्रो कन्नड़ा कार्ड, कर्नाटक के लिए अलग झंडे जैसे कार्ड खेले. लेकिन ये कदम कितने कारगर साबित होते हैं इस पर सबकी निगाहें टिकी हैं.

हैदराबाद कर्नाटक (40/224)

हैदराबाद-कर्नाटक में सबसे बड़ा मुद्दा ये है कि यहां विकास के नाम पर कुछ नहीं हुआ. अब भी यह क्षेत्र पूरी तरह अंडर-डेवलप्ड है. इस इलाके में बल्लारी, कोपल, यादगीर, कलबुर्गी और रायचूर जिले आते हैं. यहां सबसे ज्यादा अल्पसंख्यक, एससी और एसटी समुदाय के लोग हैं. साथ ही लिंगायतों की संख्या भी यहां काफी अच्छी है. वैसे तो यह क्षेत्र कांग्रेस का गढ़ माना जाता है लेकिन 2008 में रेड्डी भाइयों ने यहां से बीजेपी की नैया पार लगवाई थी.

माइनिंग घोटाले के आरोपी जनार्डन रेड्डी के परिजनों को सात टिकट दिए गए हैं. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद रेड्डी प्रचार के लिए बेल्लारी में प्रवेश तो नहीं कर पाए लेकिन चित्रदुर्गा के फार्म हाउस से ही बीजेपी का पूरा प्रचार संभाला. बीजेपी को इस बार उम्मीद है कि रेड्डी भाइयों की वापसी से यहां उन्हें फायदा होगा. यही कारण है कि बीजेपी के दिग्गज नेता इस पर बोलने से बचते दिखे. उधर कांग्रेस इस क्षेत्र में विकास के वादे फिर से करती दिखी. माना जा रहा है कि मल्लिकार्जुन खड़गे दलित, एससी और एसटी का वोट हासिल करने में कामयाब होंगे.

ओल्ड मैसूर (61/224)

ओल्ड मैसूर क्षेत्र में बीजेपी कमज़ोर है. यहां मुख्य मुकाबला कांग्रेस और जेडीएस के बीच है. इस क्षेत्र में वोक्कालिगा समुदाय का दबदबा ज्यादा है. वोक्कालिगा जेडीएस के ट्रेडिशनल वोटर्स रहे हैं इसलिए इस क्षेत्र में जेडीएस अच्छा प्रदर्शन करती है. इस क्षेत्र में कुल 10 जिले आते हैं. मंड्या, मैसूर, चिक्कबलापुर, चामराजनगर, हासन, टुमकुर, बेंगलुरु रूरल, रामनगरा, कोलार, कोडागु. वोक्कालिगा जेडीएस के साथ हैं यही कारण है कि कांग्रेस यहां अपने “AHINDA” (अल्पसंख्यक, हिन्दू (ओबीसी) और दलित) फार्मूला पर निर्भर है.

मंड्या और मैसूर में कॉवेरी का मुद्दा हमेशा गर्म रहा है. इसे लेकर कई बार विरोध प्रदर्शन तक देखे गए हैं. यही कारण है कि बीजेपी और कांग्रेस दोनों इस मुद्दे पर चुप थी. कांग्रेस यहां जेडीएस पर बीजेपी की बी-टीम का आरोप लगाकर वोट अपने पाले में करने की कोशिश करती रही है. वहीं बीजेपी मानती है कि वरिष्ठ कांग्रेस नेता एस एम कृष्णा के बीजेपी के साथ आ जाने से उन्हें इसका फायदा पहुंचेगा. खासतौर पर वोक्कालिगा समुदाय से. वहीं जेडीएस भी यहां ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतने की उम्मीद कर रही है.

कोस्टल कर्नाटक (19/224)

तटीय कर्नाटक यहां के हिंदुत्व कार्ड, बीजेपी आरएसएस कार्यकर्ताओं की हत्या और कम्युनल टेंशन के कारन सुर्ख़ियों में रहा है. यहां तक कि बीजेपी इस क्षेत्र में इस मुद्दे को उठाती भी दिखी. यहां छोटा सा झगड़ा कब दंगे में बदल जाए कहा नहीं जा सकता.

हालांकि 2013 के चुनाव में बीजेपी ने 19 में से 13 सीटें जीत ली थी. इस बार बीजेपी हिंदुत्व, बीफ बैन और टीपू सुल्तान जयंती, कार्यकर्ताओं की हत्या जैसे मुद्दों पर यहां जीत हासिल करने की उम्मीद कर रही है. जबकि कांग्रेस यहां अल्पसंख्यक वोट पर निर्भर है.

इस पुरे चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 19 रैली कर चुके हैं हालांकि वे एक भी मठ मंदिर नहीं गए. जबकि राहुल गांधी कुल 58 रैलियां, 5 रोड शो, 17 मठ-मंदिर, 3 दरगाह और 1 चर्च जा चुके हैं. वहीं अमित शाह 33 रैलियां, 21 रोड शो, 14 मठ-मंदिर और 1 गुरुद्वारा जा चुके हैं. सोनिया गांधी ने एक रैली की. अब 12 मई को जनता तय करेगी कि आखिर प्रदेश में किसकी सरकार बनेगी.

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