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बूंद-बूंद को तरसेगा पाकिस्तान! सिंधु जल संधि टूटने के बाद एक और झटका, भारत ने सावलकोट परियोजना को दी मंजूरी

केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने जम्मू-कश्मीर में चिनाब नदी पर लंबे समय से लंबित सावलकोट जलविद्युत परियोजना को पर्यावरणीय मंजूरी दे दी है.

पाकिस्तान के साथ सिंधु जल संधि के निलंबन के बाद एक बड़े फैसले में, केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने जम्मू-कश्मीर में चिनाब नदी पर लंबे समय से लंबित सावलकोट जलविद्युत परियोजना को पर्यावरणीय मंजूरी दे दी है. एक अधिकारी ने बताया, 'नदी घाटी और जलविद्युत परियोजनाओं के लिए विशेषज्ञ पर्यावरण मूल्यांकन समिति (EAC) की 40वीं बैठक 26 सितंबर को हुई और गुरुवार (09 अक्टूबर, 2025) को अंतिम मंजूरी दी गई.'

अधिकारियों ने बताया कि केंद्र की पर्यावरण समिति ने मंजूरी देने से पहले व्यापक विचार-विमर्श किया. एक अधिकारी ने कहा, 'ईएसी ने नए संचयी प्रभाव या वहन क्षमता अध्ययन की आवश्यकता के बिना पर्यावरणीय मंजूरी की सिफारिश की है, ये आकलन आमतौर पर एक नदी बेसिन के भीतर कई परियोजनाओं के संयुक्त प्रभावों का मूल्यांकन करने के लिए अनिवार्य होते हैं.'

1856 मेगावाट जलविद्युत स्टेशन के रूप में डिजाइन परियोजना

इस छूट से परियोजना के कार्यान्वयन में तेजी आने की उम्मीद है. यह मंजूरी ऐसे समय में मिली है जब भारत ने अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकवादी हमले के बाद सिंधु जल संधि (IWT) को निलंबित कर दिया है और चिनाब की जलविद्युत क्षमता के दोहन पर नए सिरे से ध्यान केंद्रित किया है.

आधिकारिक रिपोर्टों के अनुसार, NHPC की ओर से संचालित इस परियोजना को 1856 मेगावाट के जलविद्युत स्टेशन के रूप में डिजाइन किया गया है, जिसमें 192.5 मीटर ऊंचा कंक्रीट का गुरुत्व बांध और 1100 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में फैला एक जलाशय शामिल है. पूरा होने के बाद, सावलकोट सिंधु प्रणाली की पश्चिमी नदियों पर स्थित सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं में से एक होगी.

मंजूरी प्रक्रियाओं पर पड़ सकता है प्रभाव

जून में, गृह मंत्रालय (MHA) ने इस परियोजना को 'रणनीतिक महत्व' का बताया था और पर्यावरण मंत्रालय से शीघ्र मंजूरी देने का आग्रह किया था. विद्युत मंत्रालय ने यह भी चेतावनी दी थी कि नए बेसिन-व्यापी अध्ययनों का पहले से शुरू की गई मंजूरी प्रक्रियाओं पर प्रभाव पड़ सकता है.

वन सलाहकार समिति (FAC) ने जुलाई में पहले ही छूट दे दी थी, जिसमें कहा गया था कि संचयी अध्ययनों के लिए दिशानिर्देश 2013 में जारी किए गए थे, जबकि सावलकोट परियोजना पहली बार 1984 में शुरू की गई थी और नियमों को पूर्वव्यापी रूप से लागू नहीं किया जा सकता.

बांध बनाने के लिए काटे जाएंगे इतने पेड़

इस परियोजना के तहत उधमपुर, रामबन, रियासी और माहौर जिलों में 847.17 हेक्टेयर वन भूमि का उपयोग किया जाएगा और इसके लिए 2.22 लाख से अधिक पेड़ों को काटना होगा, जिनमें से 1.26 लाख से अधिक अकेले रामबन में होंगे. यह बांध दो चरणों में बनाया जाएगा, जिससे 1406 मेगावाट और 450 मेगावाट बिजली पैदा होगी.

जम्मू-कश्मीर के पर्यावरणविदों ने इस परियोजना के पारिस्थितिक प्रभाव पर चिंता जताई है. राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को 2016 में सौंपी गई एक रिपोर्ट में, उन्होंने तर्क दिया कि सावलकोट को नदी-प्रवाह परियोजना के रूप में वर्गीकृत करना भ्रामक है, क्योंकि इसका विशाल जलाशय प्राकृतिक नदी प्रवाह को बदल देगा और भूमि के विशाल भूभाग को जलमग्न कर देगा.

बांध बनने से इन आजीविकाओं पर पड़ेगा प्रभाव

उन्होंने यह भी बताया कि चिनाब नदी पर पहले से ही दुलहस्ती, बगलिहार और सलाल सहित कई बड़े बांध हैं. NHPC ने कहा है कि उसने वर्तमान आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए आधारभूत पर्यावरणीय आंकड़ों को अद्यतन किया है और 2022 के मानसून, 2023 के शीतकाल और 2023 के पूर्व-मानसून मौसमों के दौरान नए प्राथमिक आंकड़े एकत्र किए हैं.

कंपनी ने कहा कि अद्यतन आंकड़े उन चिंताओं का समाधान करते हैं कि 2016 के मूल पर्यावरणीय अध्ययन पुराने हो चुके थे. विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि सावलकोट जैसे बड़े बांध नदी के निचले प्रवाह, मछलियों के प्रवास और तलछट परिवहन को प्रभावित कर सकते हैं, जिससे नदी के चैनल और बाढ़ के मैदानों के साथ कृषि भूमि अस्थिर हो सकती है.

केंद्र-राज्य विवादों के कारण परियोजना में देरी

हिमालय की खड़ी घाटियों में बड़े जलाशय ढलान की अस्थिरता और भूस्खलन के जोखिम को भी बढ़ा सकते हैं. पर्यावरण मंत्रालय के अपने दिशानिर्देशों के अनुसार, जिन परियोजनाओं को 18 महीनों के भीतर सैद्धांतिक वन मंजूरी नहीं मिल पाती है, उन्हें अपने आधारभूत अध्ययनों को अद्यतन करना होगा.

सावलकोट को सिंधु जल संधि के तहत केंद्र-राज्य विवादों और आपत्तियों के कारण दशकों से देरी का सामना करना पड़ रहा है. पाकिस्तान ने पहले इस परियोजना के बारे में जानकारी मांगी थी, लेकिन भारत ने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि संधि के अनुसार निर्माण शुरू होने से छह महीने पहले ही सूचना देना आवश्यक है. 

लोगों को बिजली और रोजगार का वादा

अब संधि के निलंबित होने के साथ, सरकार ने सावलकोट को अपनी रणनीतिक बुनियादी प्राथमिकताओं में शामिल कर लिया है. कई घटकों के लिए निविदाएं पहले ही जारी की जा चुकी हैं, जिससे यह परियोजना राष्ट्रीय सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने का एक परीक्षण मामला बन गई है.

चिनाब नदी के किनारे बसे समुदायों के लिए यह परियोजना बिजली और रोजगार का वादा करती है, लेकिन साथ ही जंगलों, जमीन और नदी के आवासों का भी नुकसान करती है, जिन्होंने पीढ़ियों से स्थानीय जीवन को आकार दिया है.

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