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बढ़ेगी भारत की ताकत: भारतीय नौसेना में शामिल होगी पनडुब्बी INS खंडेरी, जानें खूबियां

इससे पहले भी आईएनएस खंडेरी ने देश को अपनी सेवाएं दी है,जब साल 1968 में आईएनएस खंडेरी को कमीशंड कराया गया था. साल 1971 की भारत पाकिस्तान की लड़ाई में इस सबमरीन को देश के पूर्वी सी बोर्ड पर तैनात किया गया था और फिर अक्टूबर 1989 में इसे डीकमीशंड कर दिया गया.

मुंबई: भारतीय नौसेना में कलावरी क्लास सबमरीन यानी पनडुब्बी आईएनएस खंडेरी शामिल होने जा रही है. नौसेना की ताकत को बढ़ाने के लिए आईएनएस खंडेरी को नौसेना 19 सितंबर को सौंप दिया गया था और 28 सितंबर को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह खुद मुंबई में इसकी कमिंशनिग करेंगे. आईएनएस खंडेरी दूसरी कलावरी क्लास सबमरीन यानी पनडुब्बी है.

ये पनडुब्बी 67.5 मीटर लंबी, 12.3 मीटर ऊंची और 1565 टन वजनी है. इसमें लगभग 11 किलोमीटर लंबी पाइप फिटिंग है और लगभग 60 किलोमीटर की केबल फिटिंग की गई है. स्पेशल स्टील से बनी सबमरीन में हाई टेंसाइल स्ट्रेंथ है, जो अधिक गहराई में जाकर काम करने की क्षमता रखती है. खंडेरी पनडुब्बी 45 दिन तक पानी में रह सकती है. स्टील्थ टेक्नोलॉजी से यह रडार की पकड़ में नहीं आती और किसी भी मौसम में कार्य करने में सक्षम है.

350 मीटर तक की गहराई में जाकर दुश्मन का पता लगा सकती है सबमरीन

आईएनएस खंडेरी के भीतर 360 बैटरी सेल्स है. प्रत्येक बैटरी सेल्स का वजन 750 किलो के करीब है. इसके भीतर दो 1250 केडब्ल्यू डीजल इंजन है. आईएनएस खंडेरी 45 दिनों के सफर पर जा सकता है. इन्ही बैटरियों के दम पर आईएनएस खंडेरी 6500 नॉटिकल माइल्स यानी करीब 12000 किमी का रास्ता तय करना पड़ता है. ये सबमरीन 350 मीटर तक की गहरायी में भी जाकर दुश्मन का पता लगाती है. इसके टॉप स्पीड की बात करे तो ये 22 नोट्स है.

खंडेरी का मोटो है अखंड, अभेद्य और अदृश्य और इसी मोटो पर खंडेरी खरा उतरता है. इस सबमरीन को साइलेंट किलर भी कहा जा सकता. इसके भीतर एडवांस वेपन है, जो युद्ध जैसे समय में आसानी से दुश्मनों के छक्के छुड़ा सकता है. जैसे सबसे ज़रूरी इसके पीछे के हिस्से में चुम्बकीय प्रणोदन मोटर जिसकी तकनीक को फ्रांस से लिया गया है. इसकी वजह से इसके अंदर से आने वाली आवाज़ को बाहर नहीं आने दिया जाता. इससे दुश्मन के खोजी हवाई जहाज हो या सबमरीन या वॉर वेसल्स को इसकी जानकारी ठीक से नहीं मिल पाती है, इससे वो सबमरीन को पकड़ में आये बिना हमला करना उचित होता है.

 माइंस भी बिछा सकती है ये सबमरीन

आईएनएस खंडेरी दो पेरिस्कोप से लैस है. आईएनएस खंडेरी के ऊपर लगाए गए हथियारों की बात की जाए तो इस पर 6 टॉरपीडो ट्यूब्स बनाई गयी है, जिनसे टोरपीडोस को फायर किया जाता है. इसके अलावा इसमे एक वक्त में या तो अधिकतम 12 तोरपीडोस आ सकते है या फिर एन्टी शिप मिसाइल SM39. इसके साथ ही ये सबमरीन माइंस भी बिछा सकती है. कौन कितनी संख्या में रखा जाएगा सबमरीन में, ये इस बात पर निर्भर करता है कि वो कौन से मिशन पर जाने वाला है. सबमरीन में लगे हथियार और सेंसर हाई टेक्नोलॉजी कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम से जुड़े हैं. सबमरीन में अन्य नौसेना के युद्धपोत से संचार करने की सभी सुविधाए मौजूद है. यह पनडुब्बी हर तरह के वॉरफेयर, एंटी-सबमरीन वॉरफेयर और इंटेलिजेंस को इकट्ठा करने जैसे कामों को भी बखूबी अंजाम दे सकती है.

सबमरीन के अंदर क्या-क्या होता है?

इस सबमरीन पर करीब 40 लोगो का क्रू एक साथ काम कर सकता है जिनमे से 8 से 9 अफसर होते हैं.  सबमरीन में जगह कम होने के कारण कई बातों का ध्यान रखना पड़ता है. सबमरीन में किचन को गैली कहा जाता है. यहां खाना बनाने में भी काफी सावधानी बरतनी पड़ती है खाना बनाते वक्त यहां छौंका नहीं लगा सकते, क्यूंकि धुएं को बाहर जाने का रास्ता नहीं मिल पाता. इसके अलावा जवानों के सोने के लिए अलग अलग कंपार्टमेंट होते है.  3-3 घंटे की ड्यूटी के बाद जवान, 6 घंटे का ब्रेक लेते है.जहां तक हो सके पानी का इस्तेमाल कम किया जाता है.

सबमरीन पर हर डिपार्टमेंट की जिम्मेदारी कुछ खास लोगो पर होती है. जैसे अगर टॉरपीडो को फायर करना है तो उसके लिए खास तौर पर एक शख्स होता है,अगर टॉरपीडो फायर करने से पहले उसके लिए कम्युनिकेशन के लिए एक खास शख्स जिम्मेदार होता है, कॉम्बैट के लिए एक अलग टीम होती है. इसी तर्ज पर मोटर और टेक्निकल चीज़ों के लिए अलग अलग शख्स होते है.

खंडेरी नाम अरब सागर में पाई जाने वाली कन्नेरी नाम की मछली से लिया गया है. इस मछली को समुद्र की तलहटी में रहते हुए दूरी के शिकार को तलाश कर मारने के लिए भी जाना जाता है. भारतीय नौसेना की परंपरा रही है कि जिन युद्धपोतों और पनडुब्बियों को सेवा निवृत्त किया जा चुका है उनके नाम नए नेवल शिप को दिया जाता है. बता दें कि इससे पहले भी आईएनएस खंडेरी ने देश को अपनी सेवाएं दी है,जब साल 1968 में आईएनएस खंडेरी को कमीशंड कराया गया था. साल 1971 की भारत पाकिस्तान की लड़ाई में इस सबमरीन को देश के पूर्वी सी बोर्ड पर तैनात किया गया था और फिर अक्टूबर 1989 में इसे डीकमीशंड कर दिया गया. अब इस सेकंड कलवरी क्लास सबमरीन को यही नाम दिया गया है.

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