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ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध की आशंकाओं के बीच भारत की चुनौतियों का पंचनामा

ईरान और अमेरिका के बीच उपजे ताजा टकराव में सबसे बड़ा खतरा इसी बात का है कि इसका दायरा आस-पास के मुल्कों में फैल सकता है. अमेरिका और ईरान या खाड़ी क्षेत्र में सैन्य टकराव की स्थिति में भारत की पांच ब़ड़ी चिंताएं हैं.

नई दिल्ली: बगदाद इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर शुक्रवार को हुई अमेरिकी सैन्य कार्रवाई और इस हमले में ईरानी सैन्य कमांडर जनरल कासिम सुलेमानी की मौत ने पूरी दुनिया में एक नए टकराव का तनाव बढ़ा दिया है. इस घटना ने अमेरिका और ईरान को जहां सीधी मुठभेड़ के मुहाने पर ला खड़ा किया है वहीं एक बहुराष्ट्रीय सैन्य संघर्ष का खतरा भी जगा दिया है. जाहिर है अमेरिका और ईरान के बीच ऐसे किसी भी सैन्य संघर्ष का सीधा असर भारत पर भी होगा. वहीं इस संघर्ष का दायरा खाड़ी के अन्य मुल्कों में फैला तो भारत के लिए इस तनाव की आंच और भी ज्यादा होगी.

ईरान और अमेरिका के बीच उपजे ताजा टकराव में सबसे बड़ा खतरा इसी बात का है कि इसका दायरा आस-पास के मुल्कों में फैल सकता है. ईरान आस-पास में कई ऐसे देशों से घिरा हुआ है जहां अमेरिकी ठिकाने हैं. ऐसे में संभव है कि ईरान पलटवार में किसी तीसरे मुल्क में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाए. अमेरिका ने भी ईरानी जनरल को इराक में मारा. ऐसे में पैट्रोलियम भंडार वाले इस पूरे इलाके में सैन्य टकराव की आग फैल सकती है.

फिलहाल भारत दोनों पक्षों से तनाव कम करने की अपील के साथ हालात पर एक सतर्क नजर बनाए हुए है. इस तनाव को लेकर भारत की चिंताएं काफी सीधी और स्पष्ट है. क्योंकि इस क्षेत्र के साथ भारत के आर्थिक हितों के साथ-साथ बड़ी आबादी की सुरक्षा के हित भी जुड़े हैं. किसी भी सैन्य टकराव की स्थिति में भारत के आगे फिक्र कई मोर्चों पर एक साथ आ सकती हैं. ऐसे में तनाव कम होने की उम्मीद कर रहे भारत को इन चुनौतियों के लिए भी योजनाओं का खाका तैयार रखना होगा. अमेरिका और ईरान या खाड़ी क्षेत्र में सैन्य टकराव की स्थिति में भारत की पांच ब़ड़ी चिंताएं हैं.

आबादी की सुरक्षा

पश्चिम एशिया के इस क्षेत्र में भारत के करीब 80 लाख लोग रहते हैं. इनमें से भी आबादी का ज्यादातर हिस्सा फारस की खाड़ी के तटीय इलाकों में है. यदि इस इलाके के सीमित क्षेत्र में भी कोई सैन्य टकराव होता है तो भारत के लिए बड़ी चिंता अपने लोगों को बाहर निकालने को लेकर होगी. सैन्य संघर्ष क्षेत्र से अपने लोगों को वापस लाने जैसी कोई समस्या भारत के लिए एक बड़ी चुनौती होगी. ईरान के करीब संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, कतर, कुवैत समेत कई मुल्क हैं जहां भारतीय बहुत बड़ी तादाद में रहते हैं. विदेश मंत्राय के मुताबिक अकेले ईरान में 4000 भारतीय रहते हैं.

खाड़ी के क्षेत्र से बड़े पैमाने पर भारतीयों की वापसी भारत की जेब पर भी खासा असर डालेगी. विदेशों में कामकाज के सिलसिले में गए भारतीय जो पैसा मुल्क में भेजते हैं वो देश के विदेशी मुद्रा भंडार का एक अहम हिस्सा बनाता है. इस कमाई में बहुत बड़ी हिस्सेदारी खाड़ी क्षेत्र में काम करने वाले भारतीय नागरिकों से ही आती है.

हालांकि इससे पहले भी संकट की स्थिति में भारत अपने नागरिकों को इस क्षेत्र से निकालता रहा है. इस तरह का सबसे बड़ा अभियान 1990 के दशक में हुए कुवैत युद्ध के दौरान चलाया गया था. हाल के सालों में यमन जैसे क्षेत्र से भारत ने अपने नागरिकों को सुरक्षित निकाला है. कुवैत युद्ध के दौरान भारत ने अपने एक लाख से ज्यादा नागरिकों को एयर लिफ्ट किया था. वहीं गृह युद्ध के हालात से जूझ रहे यमन से अपने नागरिकों को निकालने के लिए भारत ने 2015 में विमानों के अलावा नौसैनिक युद्धपोत भी लगाए थे.

तेल का संकट

कच्चे तेल और गैस भंडार वाला खाड़ी क्षेत्र भारत जैसे दुनिया के बड़े ऊर्जा आयातक मुल्क के लिए खासा अहम है. बीते दो सालों के दौरान ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव के चलते भारत ने ईरानी तेल आयात को तो लगभग शून्य कर दिया है. मगर अब भी बड़ी तादाद में तेल ईराक, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात से आयात होता है जिसका भारत तक पहुंचने का रास्ता फारस की खाड़ी में होर्मुज गलियारे से होकर गुजरता है.

एक आंकलन के मुताबिक भारत की जरूरत का करीब एक तिहाई तेल औऱ आधा गैस आयात ओमान और ईरान के बीच स्थित इस होर्मुज के गलियारे से होकर गुजरता है. अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के आंकलन के मुताबिक करीब 8 करोड़ टन तेल इस रास्ते से रोज गुजरता है. ऐसे में यदि इस क्षेत्र में युद्ध के बादल मंडराते हैं तो तेल की अबाध आपूर्ति के लिए चुनौती खड़ी होगी. बीते दिनों सऊदी अरब की तेल रिफाइनरी और खाड़ी के इलाके में तेल टैकरों पर हमले की वारदातों ने तनाव की बानगी दिखाई भी है.

इतना ही नहीं दुनिया के बड़े ईंधन भंडार वाले इस इलाके में किसी भी तरह का तनाव कच्चे तेल की कीमतों में भी आग लगाएगा. जाहिर है आर्थिक मंदी के इस दौर में भारत जैसे मुल्क के लिए मंहगा तेल आयात जेब के लिए बहुत भारी पड़ सकता है.

हालांकि भारत ने बीते कुछ सालों के दौरान अपनी तेल व गैस खरीद बास्केट में खाड़ी इलाकों की हिस्सेदारी को कम किया है. नाइजीरिया, अमेरिका जैसे मुल्कों से तेल खरीद का ग्राफ बढ़ा है. वहीं किसी समय भारत के लिए बड़ा तेल निर्यातक रहने वाला ईरान आज कारोबार में नई दिल्ली के लिए न के बराबर हैसियत रखता है. ऐसे में यदि किसी तरह का सैन्य संकट गहराता है तो भारत को अपने तेल आयात की डलिया के लिए वैकल्पिक इंतजाम करने होंगे. ऐसे में भारत अफ्रीका और लातिन अमेरिका के कुछ देशों से तेल आयात बढ़ाने का दरवाजा खोल सकता है.

भारत के निवेश

ईरान और अमेरिका के बीच सैनिक संघर्ष की सूरत में चाबहार बंदरगाह और जाहेदान रेल परियोजना जैसे प्रोजेक्ट भी भारत के लिए फिक्र का सबब होंगे. दोनों देशों के बीच मई 2014 में चाहबहार बंदरगाह को विकसित करने के लिए भारत के 85 मिलियन डॉलर निवेश का समझौता हुआ था. इसके अलावा अगर बहरीन, कतर, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, ओमान समेत आस-पास के मुल्कों को भी जोड़ा जाए तो पूरे मध्य एशिया क्षेत्र में भारत के निवेश का आंकड़ा काफी बड़ा है.

इससे पहले भारत अपनी कूटनीतिक कुशलता से चाबहार परियोजना के लिए अपवाद स्वरूप रियायतें अमेरिका से हासिल करता रहा है. भारत इसके लिए अफगानिस्तान तक मदद पहुंचाने के गलियारे की दुहाई देता है जहां अमेरिकी फौजें फंसी हैं. अमेरिका, अफगानिस्तान से बाहर निकलने का रास्ता चाहता है और इस बात की हिमायत करता रहता है कि अन्य क्षेत्रीय मुल्क अपनी विकास हिस्सेदारी बढ़ाएं.

खेमों की खींचतान

अमेरिका और ईरान के बीच सीधे सैन्य तनाव की सूरत में भारत के आगे खेमों की खींचतान का भी संकट होगा. भारत के जहां अमेरिका के साथ रणनीतिक रिश्तें हैं. वहीं ईरान के साथ भारत के सदियों पुराने सांस्कृतिक रिश्ते हैं. अब की रस्साकशी में भारत दोनों सिरों को साधता रहा है. लेकिन यदि खुला टकराव होता है तो भारत के लिए किसी भी एक खेमे के साथ खड़ा होना नामुमकिन होगा. एशियाई मोहल्ले में ईरान के साथ चीन और रूस की करीबी बीते कुछ समय में कई बार सामने आई है. ईरानी कमांडर कासिम सुलेमानी की मौत के बाद मॉस्को ने इस कार्रवाई पर अपना ऐतराज दर्ज कराया है. वहीं चीन तमाम अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद ईरान के साथ अपने कोरोबारी रिश्ते बरकरार रखे हुए है. लिहाजा भारत ऐसी किसी स्थिति से बचना चाहेगा जहां उसके दोस्त और पड़ोसी उसके विपरीत खेमे में खड़े हों.

इस रस्साकशी के हालात में भारत के लिए शांतिदूत की एक भूमिका भी हो सकती है. दरअसल, भारत ऐसा मुल्क है जिसके अमेरिका औऱ ईरान दोनों के साथ अच्छे रिश्ते हैं. बीते दिनों विदेश मंत्री डॉ, एस जयशंकर 2+2 वार्ता के बाद अमेरिका से वापस लौटने से पहले तेहरान में विदेश मंत्री स्तर संयुक्त आयोग की बैठक कर लौटे.

हालांकि इस मामले से जुड़ी कूटनीतिक पेचीदगियों से वाकिफ सूत्रों के मुताबिक भारत इस जटिल समस्या में आगे रहकर टांग नहीं फंसाना चाहेगा. भारत की मध्यस्थ भूमिका तभी संभव है जब दोनों पक्ष इसके लिए राजी हों. इसके बिना आगे बढ़कर कोई सक्रिय प्रयास करना फिलहाल समझदारी नहीं है. इससे पहले भी भारत की स्थापित नीति रही है कि वो दो मुल्कों के द्विपक्षीय विवादों से दूर रहता है. सूत्रों के मुताबिक भारत ऐसी भूमिका तभी स्वीकार सकता है जब उसमें संयुक्त राष्ट्र संघ भी शरीक हो.

इस बीच चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव से रविवार सुबह बात की. वहीं फ्रांस के विदेश मंत्री जे वाय लेद्रां की भी चीनी विदेश मंत्री के साथ चर्चा हुई. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के इन सदस्य देशों की राय यही है कि किसी भी मुल्क को सैन्य दुस्साहस की इजाजत नहीं दी जा सकती जो विश्व सुरक्षा व स्थायित्व को खतरे में डालने वाला हो.

बदल सकता है पास-पड़ोस की सियासत का समीकरण

ईरान की सीमाएं अफगानिस्तान और पाकिस्तान से सटी हैं. ऐसे में इस बात की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है कि अमेरिका अपने रणनीतिक हित साधने के लिए एक बार फिर पाकिस्तान के लिए रियायतों की गाजर फेंके. पहले से संकट से जूझ रही इमरान सरकार के लिए यह बड़ी रियायत हो सकती है. वहीं बीते दिनों मलेशिया की अगुवाई में हुई इस्लामिक मुल्कों की बैठक से सऊदी अरब के दबाव के चलते बाहर रहकर पाक ने यह साबित भी कर दिया कि वो एक निश्चित दायरे से बाहर नहीं जाएगा. ध्यान रहे कि अमेरिका और सऊदी अरब के करीबी रिश्ते हैं जबकि ईरान के साथ दोनों के रिश्ते तल्ख. इतना ही नहीं बीते दो सालों में ईरान और पाकिस्तान के बीच भी सीमा पर गोलीबारी की घटनाएं होती रही हैं.

संभव है कि इस स्थिति में इस्लामाबाद की कोशिश वाशिंगटन से करीबी बढ़ाने की हो. ऐसे में भारत के लिए जरूरी है कि वो अपने सीधे रणनीतिक हितों की हिफाजत के साथ-साथ यह भी सुनिश्चत करे कि पाकिस्तान को आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई पर अंतरराष्ट्रीय जवाबदेही से बचने का मौका न मिले.

बहरहाल, इन चुनौतियों और संभावित विकल्पों के बीच इस बात की उम्मीद बरकरार है कि पर्दे के पीछे जारी कूटनीतिक दोनों मुल्कों के बीच तनाव घटाने का ऐसा रास्ता निकाला जा सके जिसमें सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे. यानी ईरान अपनी तरफ से कोई जवाबी कार्रवाई भी दिखा सके और वो इतनी भारी न हो कि अमेरिका पर लड़ाई को आगे ले जाने का दबाव बने. हालांकि रविवार सुबह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तरफ से आए ट्वीट फिलहाल इस बात के संकेत नहीं दे रहे कि बातचीत का सिलसिला युद्ध के मैदान से निकलकर कूटनीतिक बातचीत की मेज पर जा सके. ऐसे में भारत के लिए किसी भी स्थिति के लिए तैयार रहना जरूरत भी है और मजबूरी भी.

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