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Covid-19 vaccine: अचानक क्यों उठने लगे 'वैक्सीन मैत्री' पर सवाल

खुद प्रधानमंत्री भी जब कोविडकाल की अपनी पहली विदेश यात्रा में बांग्लादेश गए तो तोहफे के तौर पड़ोसी मुल्क के लिए 12 लाख वैक्सीन डोज़ की सौगात ले गए थे.बड़ी धूमधाम से क़ई अंतरराष्ट्रीय बैठकों में भारत के राजनयिकों और नेताओं ने ब्रांड वैक्सीन मैत्री की मार्केटिंग की.

भारत का वैक्सीन मैत्री कार्य्रकम अब तक कूटनीतिक मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा था. दुनिया के 86 देशों को गई 6.47 करोड़ वैक्सीन डोज़ की मदद को दुनिया के मंच पर भारत के छवि निर्माण और सम्बंध सुधार की इन्सटेन्ट पॉलिश की तरह देखा जा रहा था. दूरदराज़ तक दोस्तों के घर जाती टीकों की खेप और बदले में मिलती तालियां बढ़िया समीकरण बना रही थी. मगर भारत के भीतर अचानक से बढ़े कोरोना मरीज़ों के आंकड़े ने अभी तक निहाल कर रही वैक्सीन मैत्री को अब अपने ही लोगों के बीच खलनायक बना दिया है.

 
दरअसल, वैक्सीन मैत्री विचार का जन्म हुआ कोरोना काल में ही बीते साल हैड्रोक्ससीक्लोरोक्वीन दवा को लेकर दुनियाभर में मचे हाहाकार और भारत को मिले आपूर्ति ऑर्डर की सुनामी के बीच. अमेरिका समेत दुनिया के ताकतवर देश भी भारत से मुंहमांगे दाम पर यह दवा हासिल करना चाहते थे.
 
बहरहाल, मलेरिया की दवा हैड्रोक्ससीक्लोरोक्वीन कोरोना पर तो कोई खास कारगर नहीं हुई. लेकिन इसने भारत को दुनिया की फार्मेसी के तौर पर अपने छवि निर्माण का नया मौका दे दिया. वो भी ऐसे समय जब फार्मा क्षेत्र का उसका मुख्य प्रतिद्वंद्वी चीन कोरोना की पैदाइश को लेकर कठघरे में खड़ा था.
 
लिहाज़ा प्रधानमंत्री ने सँयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक से लेकर घरेलू मोर्चे पर हुई चुनावी रैलियों तक इस बात का ज़िक्र क़ई बार किया कि कैसे दुनिया भारत की तरफ उम्मीदवल भरी नजरों से देख रही है और किस तरह दुनिया का दवाखाना बनकर भारत सबकी ज़रूरत पूरी करने को तैयार है. सो, भारत में वैक्सीन आमद की तेज होती सुगबुगाहट के साथ साथ 2020 की आखिरी तिमाही में ही वैक्सीन मैत्री के लिए जमीन तैयार करने की शुरुआत कर दी थी. दुनिया के क़ई देशों के राजनयिकों को पुणे और हैदराबाद ले जाया गया, वैक्सीन निर्माण फैसेलिटीज़ दिखाई गई.
 
साथ ही सरकार में शीर्ष स्तर पर मिली. मंजूरी के बाद 2020 के आखिरी हफ्तों में अंदरखाने विदेश मन्त्रालय और वाणिज्य मंत्रालय में इसे एक व्यापक कर्यक्रम की तरह आगे बढाने का प्लान बना. जिसमें भारत निर्मित टीकों के साथ  भारतीय नेतृत्व की उदरता, देश की उत्पादन क्षमता को बताने-जताने के साथ ही व्यावसायिक तौर पर देसी फार्मा क्षेत्र के लिए नए अवसर बनाए जाएं. यह प्लान बहुत वाजिब भी था और मौजूं भी.
 
हालांकि इस व्यापक योजना की मीनार उस गणित पर टिकी थी जिसमें कोरोना के मामलों का ग्राफ नीचे गिरता रहे या एक निश्चित सीमा में ही रहे. जनवरी से मार्च के मध्य तक ऐसा हुआ भी. फरवरी 2021 में भारत में हर दिन सामने आने वाले कोरोना मामलों का आंकड़ा मात्र 16 हज़ार के करीब था. लगभग इसी वक्त भारत ने हज़ारों की संख्या में वैक्सीन की खेप अन्य देशों को भेजी. यानि भारत के पास खुले दिल और खुले हाथ से वैक्सीन मैत्री निभाने का मौका भी था और गुंजाइश भी.
 
बड़ी धूमधाम से क़ई अंतरराष्ट्रीय बैठकों में भारत के राजनयिकों और नेताओं ने ब्रांड वैक्सीन मैत्री की मार्केटिंग की. इतना ही नहीं खुद प्रधानमंत्री भी जब कोविडकाल की अपनी पहली विदेश यात्रा में बांग्लादेश गए तो तोहफे के तौर पड़ोसी मुल्क के लिए 12 लाख वैक्सीन डोज़ की सौगात ले गए थे.
 
हालांकि 15 मार्च के बाद बेहद तेज़ रफ़्तार से बढ़े मामलों ने सरकार के वैक्सीन मैत्री प्लान पर चिंता की लकीरें खींचना शुरू कर दिया था. मार्च के आखिरी हफ्ते आते जब कोरोना मरीज़ों का आकंड़ा 65 हज़ार प्रतिदिन को पार कर गया तो धीरे धीरे कर तोहफों ही नहीं बड़े वैक्सीन आपूर्ति ऑर्डर पर भी रोक लगाई गई. सरकार ने इस रोक का कोई औपचारिक आदेश तो जारी नहीं किया गया. लेकिन 1 अप्रैल के बाद 45 वर्ष से. अधिक आयु वालों के टीकाकरण की बढ़ी ज़रूरत का हवाला देते हुए अलिखित पाबंदी लगा दी.
 
बहरहाल, वैक्सीन मैत्री और हैड्रोक्ससीक्लोरोक्वीन के वक्त दी गई मदद में एक मूलभूत अंतर उत्पादन का भी था. हैड्रोक्ससीक्लोरोक्वीन एक परम्परागत दवा है जिसके भारत में क़ई उत्पादक हैं. लेकिन कोविशील्ड या कोवैक्सीन का उत्पादन विशिष्ट कम्पनियां ही कर रही हैं और वो भी एक निर्धारित क्षमता के साथ. ऐसे में इस बात का खतरा बरकरार रखते है कि देश और दुनिया इसकी यदि माँग बढ़ती है तो उसका दबाव उत्पादन इकाइयों को झेलना होगा. साथ ही सरकार की पहल।होने के कारण वैक्सीन मैत्री पर भी छींटे आना लाज़िमी है.
 
आंकड़े बताते हैं कि देश से बाहर गए टीकों की संख्या 6.47 करोड़ है और भारत में लोगों को अब तक दिए जा चुके टीकों का आंकड़ा 10 करोड़ से अधिक. बाहर भेजे गए टीकों में भी वैक्सीन गिफ्ट 1.05 करोड़ है. उसमें भी अधिकतर बंगलादेश नेपाल म्यांमार जैसे पड़ोसी हैं जिनके साथ भारत की सीमा मिलती है. यानि अगर वहाँ कोरोना बहुत अधिक फैला तो हम भी सुरक्षित नहीं.
 
करीब 3.45 करोड़ टीके अन्य देशों ने भारत से पैसे देकर खरीदे हैं. जबकि WHO के एग्जेक्युटिव बोर्ड का प्रमुख होने के साथ साथ एक जिम्मेदार देश होने के नाते भारत का एक अंतरराष्ट्रीय कमिटमेंट है. इसलिए COVAX कार्यक्रम में 1.81cr टीके दिए गए. मार्च 2021 के बाद किसी भी देश को बड़ी सँख्या में टीकों की आपूर्ति नहीं की गई है. सिवाय नौरू जिसे 6 अप्रैल को 10 हज़ार और पराग्वे जिसे गत 26 मार्च को एक लाख डोज़ दिए गए.
 
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