ऐसे मिल सकती है पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों से निजात
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में पेट्रोल 89 रुपये प्रति लीटर की दर से बिक रहा है. वहीं डीजल की दर दिल्ली में 79.35 रुपये प्रति लीटर है.

नई दिल्ली: पेट्रोल-डीजल की बेतहाशा बढ़ती कीमतों पर काबू पाने के लिए मोदी सरकार को एक बार फिर पुराने फॉर्मूले को ही लागू करने की तरफ ध्यान देना होगा. हालांकि पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान कल राज्यसभा में यह बयान देकर अपने हाथ खड़े कर चुके हैं कि सरकार कीमत पर काबू करने के लिए कुछ नहीं कर सकती है. पर शायद वे यह भूल गये कि दो तरीकों को अपनाकर बढ़ती हुई कीमतों पर लगाम लगाई जा सकती है. पहला यह कि केंद्र सरकार इन दोनों पर एक्ससाइज ड्यूटी घटाने की पहल करे और सभी राज्यों से भी ऐसा करने को कहे. दूसरा यह कि कीमतें तय करने के लिए जून 2017 से पहले वाले फॉर्मूले को ही अपनाया जाये.
इस फॉर्मूले के तहत होता यह था कि अंतराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के 15 दिनों के औसत दाम के आधार पर ही पेट्रोल-डीज़ल की कीमतें तय की जाती थीं. इसका नतीजा यह होता था कि महीने में सिर्फ दो बार ही कीमतें बढ़ा करती थीं. लेकिन जून 2017 में सरकार इसके स्थान पर नया फॉर्मूला यह निकाला कि अब अंतराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में रोज जो बदलाव होगा, उसी आधार पर पेट्रोल-डीज़ल के मूल्य भी रोज बदले जाएंगे. इस फैसले के लिए तर्क यह दिया गया कि क्रूड ऑयल की कीमत कम होगी, तो पेट्रोल-डीजल सस्ता होगा और बढ़ेगी तो यह महंगा होगा.
अगर पिछली यूपीए सरकार के समय मे कच्चे तेल के दामों से आज की कीमतों की तुलना की जाए तो आज कच्चा तेल ब्रेंट क्रूड 63.57 डॉलर प्रति बैरल के आसपास है और दिल्ली में पेट्रोल का मूल्य 89 रुपये प्रति लीटर है. जबकि यूपीए के दूसरे कार्यकाल में 2009 से लेकर मई 2014 तक क्रूड की कीमत 70 से लेकर 110 डॉलर प्रति बैरल तक थी. लेकिन तब भी पेट्रोल की कीमत 55 से 80 रुपये के बीच ही झूलती रही. साल 2014 की शुरुआत में ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत 115 डॉलर प्रति बैरल हो गई थी. तब पेट्रोल की कीमत 82 रु प्रति लीटर थी और देश में हाहाकार मच गया था.
पिछले 4 सालों में कच्चे तेल की गिरी हुई कीमत का लाभ सरकार ने आम जनता को नहीं लेने दिया बल्कि हर बार एक्साइज ड्यूटी बढ़ा कर खजाना भरा गया. कोरोना काल की शुरुआत में तो अंतरराष्ट्रीय मार्केट में कच्चे तेल यानी ब्रेंट क्रूड की कीमत 14.25 डॉलर प्रति बैरल गिर गयी लेकिन तब भी किसी तरह का लाभ भारत की जनता को नहीं दिया. खजाना भरने के लालच में थोड़ी कमी करने की नीयत हो तो सरकार ड्यूटी कम करके लोगों को महंगाई से कुछ हद तक तो निजात दिला ही सकती है.
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