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जन्मदिन विशेष: हापुड़ के कस्बे से निकल कर ग्लोबल मंच पर छा जाने वाले कवि कुमार विश्वास की कहानी

कुमार विश्वास जन्मदिन: आयोजक बदले, आयोजन स्थल बदले, मंच की सज्जा बदली, परिधान बदले, साधन बदले, वाहन बदले, और स्कूटर से ले कर चार्टर्ड जेट तक पहुंचे. पहली बार मंच पर कविता पढ़ने की कहानी भी है बेहद रोचक

नई दिल्ली: हिंदी कवि सम्मेलन-मुशायरे का कोई भी मंच आज एक नाम के बिना अधूरा लगता है, ये नाम है डॉ. कुमार विश्वास. आज कुमार विश्वास अपना 50वां जन्मदिन मना रहे हैं. प्रेम की कविताएं कहने वाले मशहूर हिंदी कवि कुमार विश्वास को मंच संचालन की ऐसी महारत हासिल है कि श्रोता अपनी जगह से हिलना तक भूल जाते हैं. कुमार विश्वास का जितना क्रेज़ युवाओं में है उतना ही प्यार उन्हें बड़ों से भी मिलता रहा है.

गूगल हेडक्वाटर्स तक में बतौर मेहमान बुलाए जाने के बाद भी कुमार विश्वास हमेशा अपनी सफलता का श्रेय हिंदी को देते रहे हैं. इस खास मौके पर हम आपको बता रहें हैं कि कैसे उत्तर प्रदेश के एक छोटे से कस्बे पिलखुवा की गलियों से निकले एक 'बागी युवा' ने ग्लोबल स्तर पर धूम मचा दी.

हापुड़ के पिलखुआ कस्बे में बीता बचपन तीन बड़े भाइयों और एक बड़ी बहन कर साथ कुमार का बचपन उत्तर प्रदेश हापुड़ जिले के पिलखुवा कस्बे में गुजरा. पिता डॉ चंद्रपाल शर्मा शिक्षक थे और मां रमा शर्मा गृहणी थीं. तब कुमार विश्वास, कुमार विश्वास नहीं थे, विश्वास कुमार शर्मा थे. बचपन से ही मेधावी रहे, निम्न मध्यम वर्गीय परिवार की इच्छाओं और ज़रूरतों के बीच की खाई पाटते-पाटते सभी भाई-बहन अनुशाषित पिता और स्नेहिल माँ की छाया में बड़े हुए.

पिता से छुपा कर पढ़ते थे कालिदास, साहिर माँ रात को सोते समय भजन और लोरियां सुनाती थीं जो कानों के रास्ते विश्वास के कण्ठ में जाता रहा. किशोरावस्था से ही विश्वास अपने स्कूल, इंटर-स्कूल और ज़िला स्तर तक के वाद-विवाद और भाषण प्रतियोगिताओं में भाग लेते थे और अक्सर प्रथम ही आते थे. संस्कृत, हिन्दी और अंग्रेज़ी में विश्वास की ख़ास रुचि थी. साइंस और मैथ्स में भी मेधावी थे, लेकिन रूचि बिलकुल नहीं थी. अकेले में विश्वास रफ़ी साहब के गाने गाते थे, साहिर के नग़्मे गुनगुनाते थे, कालिदास पढ़ कर झूमते थे. लेकिन पिता के सामने पकड़े जाने पर बुरी तरह से डांट पड़ती थी.

इंजीनियरिंग छोड़ बीए में लिया दाखिला कविता लिखना कब से शुरू कर दिया था, यह विश्वास को भी नहीं पता चला. तत्कालीन चलन के हिसाब से और पिताजी की इच्छा के वजह से अंदर से बहुत ज़्यादा मन न होने पर भी इंजीनियरिंग में धकेले गए और छः महीने में ही कुटाई-पिटाई की संभावनाओं के बाद भी वापस पिलखुआ आ धमके, बीए करने का मन बना कर. पिताजी का नाराज़ होना स्वाभाविक था. वो इतने नाराज़ हुए कि घोषणा कर दी कि आगे वो जो भी पढ़ना चाहें, लेकिन ख़ुद अपने ख़र्चे से पढ़ना होगा.

नाम के पीछे भी है एक कहानी विश्वास को पता था कि पिताजी की नाराज़गी जायज़ है. इसलिए चुपचाप पढ़ाई की व्यवस्था में लग गए. पास में पैसे न थे, सो पत्रिकाओं में लेख और कहानियां लिखने लगे और उस लेखन की कमाई से ग्रेजुएशन का फॉर्म प्राइवेट छात्र के रूप में भरा. भाई-बहनों ने अप्रत्यक्ष साथ दिया, बड़ी दीदी ने कहा कि विश्वास कुमार शर्मा नाम से अलग पहचान पाना थोड़ा मुश्किल होगा, तो दीदी की सलाह पर हो गए कुमार विश्वास.

पहली बार मंच पर पहुंचने की कहानी इसी दौरान पड़ोसी शहर हापुड़ के एक दोस्त के साथ एक कवि-सम्मेलन सुनने गए, जहां नीरज जी और भवानी दादा जैसे कवि आमंत्रित थे. दोस्त के पिता आयोजन समिति में थे, कवि-सम्मेलन में आए सभी कवि वरिष्ठ क्या, वरिष्ठतम थे, इसलिए इस बात का संकट था कि पहला कवि कौन होगा. तभी दोस्त ने अपने पिता को बता दिया कि विश्वास भी गीत लिखता है. अचानक आ पड़े इस मौक़े पर चाहे-अनचाहे विश्वास ने मंच की तरफ़ क़दम बढ़ाया. एक बार मंच को तरफ़ ये मज़बूत क़दम बढ़े, तो उसके बाद तो देखते ही देखते, क़दम-दर-क़दम विश्वास की जादुई प्रस्तुति ने अगले दो दशकों में पूरी दुनिया नाप दी.

कवि सम्मेलन से KV म्यूजिकल तक का सफर आयोजक बदले, आयोजन स्थल बदले, मंच की सज्जा बदली, परिधान बदले, साधन बदले, वाहन बदले, और स्कूटर से ले कर चार्टर्ड जेट तक पहुंचे. पारंपरिक कवि सम्मेलन में तमाम बदलाव करते हुए स्किन माइक, डिजिटल बैकड्रॉप, हाई-टेक स्टेज और अब केवी म्यूज़िकल. इस बस बदलावों ने कुमार विश्वास को बनाया KV.

'कोई दीवाना कहता है' से ले कर 'पगली लड़की' और 'भगत सिंह' तक अलग-अलग रंग के गीत तो विश्वप्रसिद्ध हैं. साथ ही दुनिया भर में बसे भारतीय होली के जोगीरे में भी उन्हें ही सुनना चाहते हैं. इतना ही नहीं, महारानी पद्मावती और गोरा बादल की कहानी हो, चाहे श्रीराम के वनवास की कहानी, आज का युवा यह सब कुछ उनसे ही सुनना चाहता है.

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