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हिंदी दिवस 2018 विशेष: 'मिट्टी के तन' और 'क्षण भर के जीवन' से सदा करते रहे हिंदी की सेवा

'मधुशाला' हर दिन होली और हर रात दीवाली मनाती रही और बच्चन दिन-प्रतिदिन मशहूर से मशहूरतर होते गए. हिन्दी के एक ही काव्य-ग्रन्थ में जीवन के हर उतार-चढ़ाव, हर वेदना-संवेदना, हर रिश्ते-नाते, हर उत्सव-महोत्सव और यहां तक की जीवन-मृत्यु तक से जुड़ी रुबाइयों ने आम लोगों के बीच अपनी जगह बनाई.

नई दिल्ली: आज हिंदी दिवस के मौके पर एक ऐसे कवि का जिक्र करना बेहद जरूरी है, जिसकी रचनाओं में शराब का नाम होते हुए भी उनकी रचनाएं जीवन के हर एक दर्शन की तरफ इशारा करती हैं. व्यक्तिवादी या हालावादी कवि के रूप में अपनी लेखनी से यश और कीर्ति पाने वाले कवि की उनके शब्द मात्र से ही पहचान होने लगती है.

'मिट्टी का तन, मस्ती का मन क्षण भर जीवन, मेरा परिचय'

एक ऐसा कवि जिसके परिचय के लिए ये पंक्तियां मात्र काफी हैं. जिसने हिन्दी कवि-सम्मेलनों को बेहद लोकप्रिय किया, एक ऐसा व्यक्तित्व, जिसने तमाम समकालीन अवरोधों के बीच स्वयं को स्थापित किया. एक ऐसा कलमकार, जिसने हिन्दी गीतों को एक नई सुगम, सरल और सुरम्य दिशा दी. वो कोई और नहीं बल्कि हिंदी भाषा के प्रखर, प्रवीण, प्रांजल हस्ताक्षर श्री हरिवंश राय बच्चन हैं!

बच्चन जी का जन्म 27 नवम्बर 1907 को इलाहाबाद में हुआ था. उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय और बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से अध्ययन किया. फिर कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से पीएचडी की. प्रारम्भ से ही उनका साहित्य से गहरा लगाव था. यही कारण रहा कि उन्होंने पीएचडी के लिए अंग्रेजी के बड़े कवि डब्ल्यू बी ईट्स की कविताओं के विषय का चयन किया. अंग्रेजी साहित्य ने तो बच्चन को काफी प्रभावित किया ही था. इसके अलावा संस्कृत, उर्दू और फ़ारसी के साहित्य भी उन्हें बहुत प्रिय थे. इसके बाद कुछ समय के लिए आकाशवाणी और फिर विदेश मंत्रालय में भी काम किया. इस बीच हरिवंश राय बच्चन गीत पिरोते रहे, गाते रहे, गुनगुनाते रहे और समय के शिलालेख पर साहित्य के अमिट हस्ताक्षर बनाते रहे.

इस पार, प्रिये, मधु है, तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा! यह चांद उदित होकर नभ में कुछ ताप मिटाता जीवन का, लहरा-लहरा यह शाखाएं कुछ शोक भुला देतीं मन का, कल मुर्झाने वाली कलियां हंसकर कहती हैं, मग्न रहो, बुलबुल तरू की फुनगी पर से संदेश सुनाती यौवन का, तुम देकर मदिरा के प्याले मेरा मन बहला देती हो, उस पार मुझे बहलाने का उपचार न जाने क्या होगा! इस पार, प्रिये, मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा.

एक मध्यम वर्गीय परिवार के तमाम अनुभवों और अभावों के बावजूद साहित्यिक प्रादुर्भाव की गति नहीं रुकी. बच्चन ने बीए करने के बाद इलाहबाद विश्वविद्यालय में पढ़ाना शुरू कर दिया. 1933 में विश्व-प्रसिद्द फ़ारसी शायर उमर खैय्याम की रुबाईयों का अनुवाद किया और अगले ही वर्ष प्रकाशन हुआ हिंदी भाषा की अमर कृति - मधुशाला का. मधुशाला ने बच्चन को यश की नई पराकाष्ठा दी, और बच्चन ही क्या सच कहें तो मधुशाला ने आम जनता में हिंदी कविता की ग्राह्यता को नया मुक़ाम दिया. इसी रचना ने उन्हें हालावादी कवि के रूप में शक्ल दी.

''एक बरस में, एक बार ही जगती होली की ज्वाला, एक बार ही लगती बाज़ी, जलती दीपों की माला, दुनियावालों, किन्तु, किसी दिन आ मदिरालय में देखो, दिन को होली, रात दिवाली, रोज़ मनाती मधुशाला मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवला, 'किस पथ से जाऊं?' असमंजस में है वह भोलाभाला, अलग-अलग पथ बतलाते सब पर मैं यह बतलाता हूं - 'राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला.''

'मधुशाला' हर दिन होली और हर रात दीवाली मनाती रही और बच्चन दिन-प्रतिदिन मशहूर से मशहूरतर होते गए. हिन्दी के एक ही काव्य-ग्रन्थ में जीवन के हर उतार-चढ़ाव, हर वेदना-संवेदना, हर रिश्ते-नाते, हर उत्सव-महोत्सव और यहां तक की जीवन-मृत्यु तक से जुड़ी रुबाइयों ने आम लोगों के बीच अपनी जगह बनाई. मधुशाला इतनी प्रसिद्ध हो गई कि वह जनगान बन गई. एक बार तो बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में श्रोताओं की मांग पर मधुशाला के पूरे 135 छंद उन्हें सुनाने पड़े! गोष्ठियों, साहित्यिक आयोजनों और कवि-सम्मेलनों में बच्चन की व्यस्तता बढ़ती गई.

सम्मान, यश और सुखद जीवन के बीच हरिवंशराय बच्चन की पत्नी श्यामा जी का स्वास्थ्य उनकी चिंता का विषय बना रहा. श्यामा जी को टीबी की गंभीर बीमारी थी. श्यामा जी से उनका विवाह 1926 में हुआ था, जब हरिवंश 19 वर्ष के थे और श्याम जी 14 वर्ष की थीं. विवाह के कुछ समय उपरांत ही श्यामा जी को इस गंभीर बीमारी का पता चला. उन दिनों टीबी के लिए कोई सटीक इलाज भी सहज उपलब्ध नहीं था. बीमारी के दौरान बच्चन लगातार श्यामा जी की सेवा में लगे रहते. धीरे-धीरे स्थिति यह हो गई, कि बच्चन का कहीं आना-जाना भी मुश्किल होने लगा. इधर श्यामा जी की टीबी की बीमारी बढ़ती ही जा रही थी और अन्ततः 1936 में श्यामा जी का देहांत हो गया. हरिवंश लगभग टूट से गए. जीवन संगिनी का इस तरह से बिछुड़ जाना उन्हें अंदर तक झकझोर गया.

हरिवंशराय बच्चन जीवन के मुरझाये फूलों को चुन कर, नैराश्य के अन्धकार से आशा के उजाले की तरफ चल पड़े, ज़िन्दगी का नया अध्याय तलाश करने की कोशिश करने लगे. इसी दौरान बरेली में रहने वाले एक मित्र ज्ञानप्रकाश जौहरी के घर पर बच्चन की मुलाक़ात तेजी सूरी से हुई. तेजी लाहौर के एक डिग्री कॉलेज में साइकोलॉजी पढ़ाती थीं और ज्ञानप्रकाश जौहरी की पत्नी उसी कॉलेज में प्रिंसिपल थीं. तेजी रंगमंच और गायन से जुड़ी हुई थीं. मुलाक़ात जल्द मित्रता में ढली और बच्चन के जीवन और साहित्य की जिल्द में हरे गीत दोबारा तरतीबवार सजने लगे.

1941 में बच्चन ने तेजी सूरी जी से विवाह किया. अगले साल, यानि 1942 में 11 अक्टूबर को बच्चन दंपत्ति को संतान के रूप में अमिताभ बच्चन की प्राप्ति हुई. कई मित्र-परिचित और बन्धु-बांधव बधाई देने के लिए पहुंचे. हरिवंश राय बच्चन के मित्र और हिंदी के मूर्धन्य कवि सुमित्रानंदन पन्त उन दिनों बच्चन जी के पड़ोसी थे. वो भी बच्चन दंपत्ति को बधाई देने उनके घर पहुंचे.

वर्ष 1941 बच्चन के जीवन के दूसरे सत्र का प्रारम्भ था. यहां से उनके जीवन और उनके लेखन, दोनों में बड़ा बदलाव आया. इससे पहले बच्चन ने वो गीत लिखे, जिन्होंने उन्हें साहित्य का एक गंभीर रचयिता बनाया. उन दिनों कवि-सम्मेलनों और गोष्ठियों के लिए कवि मानदेय नहीं लेते थे. लेकिन बच्चन जी ने ही समय और साधन के व्यय के बदले मानदेय की प्रथा शुरु की. उन्होंने वो गीत लिखे, जिन्होंने उन्हें शोहरत की नई बुलंदियां दीं, उन्हें कविता का ब्रांड बनाया, उन्हें कवि-सम्मेलन मंचों का सुपरस्टार बनाया.

वर्ष 1955 में बच्चन को देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री पण्डित जवाहरलाल नेहरू की तरफ से एक अति-महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी मिली. उन्हें विदेश मंत्रालय में हिन्दी का विशेष कार्याधिकारी नियुक्त किया गया. इस कार्यालय से देश की कार्यकारिणी की भाषावली तय होनी थी. बच्चन ने इस कार्य को बखूबी अंजाम दिया. 60 के दशक के शुरूआती वर्षों में बच्चन थोड़े बेचैन रहे. कुछ बीमारियों ने परेशान किया, कुछ अमिताभ की बेरोज़गारी ने. बच्चन ने लिखा है कि बेरोज़गार अमिताभ को रेडियो की नौकरी दिलवाने के लिए उनका जुबान खोल देना ही काफी होता. लेकिन वो चाहते थे, कि अमिताभ जो बनें, अपनी क्षमता से बनें. कुछ प्रारंभिक असफलताओं के बाद अमिताभ उस स्थान पर पहुंच गए, जहां बकौल हरिवंश जी, उनकी स्वयं की पहचान अमिताभ के पिता के रूप में होने लगी थी. यहां तक कि अमिताभ की फिल्मों में पिता हरिवंश के लिखे कुछ गाने भी फिल्माए जाने लगे.

इसके बाद बच्चन जी सीधे अमिताभ जी से मुखातिब हुए. उन्होंने अमिताभ से कहा कि अमित, आप मेरे इलाहबाद वापस जाने की टिकट करा दें. अमिताभ चौंक गए. उन्हें लगा कि पता नहीं बाबूजी किस बात पर नाराज़ हो गए. फिर बाबूजी ने उन्हें सहज करते हुए कहा, कि कोई नाराज़गी नहीं है. आज मुझे कुछ लोग मिले जिन्होंने मुझे 'अमिताभ बच्चन के पिता' के रूप में पहचाना. बस, मेरा बम्बई में रहने का उद्देश्य पूरा हुआ.

हरिवंश राय बच्चन जी ने अपनी आत्मकथा चार खण्डों में लिखी हैं, जिनमें उन्होंने अपने परिवार और अपने जीवन की हर महत्वपूर्ण और रुचिपूर्ण घटना का उल्लेख किया है. वरेण्य साहित्यकार धर्मवीर भारती जी ने बच्चन जी की आत्मकथा के बारे में लिखा है कि यह ऐसी पहली घटना है जब कोई साहित्यकार अपने बारे में सब कुछ इतनी बेबाकी, साहस और सद्भावना से अपनी बात कहता हो.

साहित्य के तत्कालीन मानक संस्थानों से भी बच्चन को कोई विशेष मान्यता नहीं मिली. लेकिन स्वयं बच्चन के शब्दों में कहें, ''अगर मैं दुनिया से किसी पुरस्कार का तलबगार होता तो अपने आपको और अच्छी तरह सजाता-बजाता और अधिक ध्यान से रंग चुनकर उसके सामने पेश करता. मैं चाहता हूं कि लोग मुझे मेरे सरल स्वाभाविक और साधारण रूप में देख सकें. सहज निष्प्रयास प्रस्तुत, क्योंकि मुझे अपना ही तो चित्रण करना है'' इसी तरह बच्चन जी अपने कर्त्तव्य पथ पर अपने दम पर अग्रसर रहे.

वृक्ष हों भले खड़े, हों घने हों बड़े, एक पत्र छांह भी, मांग मत, मांग मत, मांग मत, अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ. तू न थकेगा कभी, तू न रुकेगा कभी, तू न मुड़ेगा कभी, कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ, अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ. यह महान दृश्य है, चल रहा मनुष्य है, अश्रु श्वेत रक्त से, लथपथ लथपथ लथपथ, अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ.

'मिट्टी का तन, मस्ती का मन, क्षण भर जीवन, मेरा परिचय' - बच्चन अपना परिचय इन शब्दों में दिया करते थे. कबीर को गहराई से पढ़ने वाले बच्चन के लिए यह परिचय बिलकुल सटीक बैठता था. 18 जनवरी 2003 - मस्ती का मन लिए बच्चन मिट्टी के इस तन को छोड़ कर सदा के लिए चले गए और अपने पीछे छोड़ गए साहित्य का अथाह सागर जिसमें से हम और आप रोज़ नए मोती बीनते हैं.

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