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Xप्लेन: प्लेन लगातार 24 घंटे तक उड़ते रहे, लेकिन तकनीक के आगे इंसानी जिस्म कैसे कमजोर पड़ा

क्वांटास एयरलाइंस की 24 घंटे 24 मिनट लंबी टेस्ट फ्लाइट के बाद यह सवाल स्वाभाविक है कि अगर कोई व्यक्ति लगातार 24 घंटे तक विमान में रहे, तो उसके शरीर पर क्या असर पड़ सकता है.

क्वांटास एयरलाइंस (Qantas) ने मेलबर्न से टूलूज़ (फ़्रांस) तक 24 घंटे 24 मिनट की ऐतिहासिक नॉन-स्टॉप उड़ान भरी. यह किसी भी कमर्शियल प्लेन की अब तक की सबसे लंबी उड़ान है. इसने 2005 में बोइंग 777 के बनाए गए 22 घंटे 42 मिनट की उड़ान के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया है. इस विशेष एयरबस (A350-1000ULR) ने बिना रुके प्रशांत और अटलांटिक महासागर के ऊपर से लगभग 23,075 किलोमीटर का सफर तय किया. यह टेस्ट फ़्लाइट क्वांटास के उस प्रोजेक्ट का हिस्सा है, जिसके तहत 2027 से सिडनी और लंदन के बीच सीधी (नॉन-स्टॉप) उड़ानें शुरू करने की योजना है. फ़्लाइट-ट्रैकिंग ऐप 'Flightradar24' पर इसे 36 लाख से ज़्यादा लोगों ने फ़ॉलो किया. यह इतिहास में दूसरी सबसे ज़्यादा ट्रैक की जाने वाली फ़्लाइट बन गई (पहली 2022 में महारानी एलिज़ाबेथ द्वितीय के ताबूत को ले जाने वाली फ़्लाइट थी).

क्वांटास एयरलाइंस की 24 घंटे 24 मिनट लंबी टेस्ट फ्लाइट के बाद यह सवाल स्वाभाविक है कि अगर कोई व्यक्ति लगातार 24 घंटे तक विमान में रहे, तो उसके शरीर पर क्या असर पड़ सकता है.

विशेषज्ञों के मुताबिक, एक स्वस्थ व्यक्ति के लिए 24 घंटे तक विमान में यात्रा करना आमतौर पर खतरनाक नहीं होता, लेकिन इस दौरान कुछ शारीरिक और मानसिक प्रभाव महसूस हो सकते हैं.

1. डिहाइड्रेशन (शरीर में पानी की कमी)

विमान के केबिन की हवा बेहद शुष्क होती है, जहां नमी का स्तर केवल 10–20% रहता है. इससे शरीर में पानी की कमी हो सकती है. इसके कारण त्वचा और आंखें सूखना, सिरदर्द और थकान जैसी समस्याएं हो सकती हैं.

2. पैरों और टखनों में सूजन

लगातार लंबे समय तक बैठे रहने से रक्त संचार धीमा हो जाता है. इससे पैरों और टखनों में तरल पदार्थ जमा हो सकता है, जिससे सूजन आ सकती है. हर 1–2 घंटे में थोड़ी देर टहलने या पैरों की हल्की एक्सरसाइज करने से इसका जोखिम कम किया जा सकता है.

3. डीप वेन थ्रोम्बोसिस (DVT) का खतरा

लंबे समय तक एक ही स्थिति में बैठे रहने से नसों में खून का थक्का बनने का खतरा बढ़ जाता है, जिसे डीप वेन थ्रोम्बोसिस (DVT) कहा जाता है. यह जोखिम बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं, धूम्रपान करने वालों, मोटापे से ग्रस्त लोगों और पहले से क्लॉटिंग की समस्या वाले लोगों में अधिक होता है. दुर्लभ मामलों में यह थक्का फेफड़ों तक पहुंचकर जानलेवा भी हो सकता है.

4. जेट लैग और थकान

कई टाइम ज़ोन पार करने से शरीर की जैविक घड़ी (Body Clock) प्रभावित होती है. इससे नींद में गड़बड़ी, चिड़चिड़ापन, ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई और पाचन संबंधी समस्याएं हो सकती हैं.

5. मांसपेशियों में अकड़न और पीठ दर्द

कई घंटों तक एक ही मुद्रा में बैठे रहने से गर्दन, कंधों, कमर और पैरों की मांसपेशियों में अकड़न और दर्द महसूस हो सकता है.

6. शरीर में ऑक्सीजन का स्तर थोड़ा कम होना

विमान के केबिन का दबाव समुद्र तल से लगभग 6,000-8,000 फीट (1,800–2,400 मीटर) की ऊंचाई के बराबर रखा जाता है. इससे स्वस्थ लोगों के रक्त में ऑक्सीजन का स्तर थोड़ा कम हो सकता है. हालांकि अधिकांश लोगों को इससे कोई गंभीर समस्या नहीं होती, लेकिन दिल या फेफड़ों की बीमारी से पीड़ित लोगों को सांस लेने में दिक्कत हो सकती है.

7. पाचन संबंधी समस्याएं

कम शारीरिक गतिविधि और केबिन के दबाव में बदलाव के कारण पेट फूलना, गैस या कब्ज जैसी समस्याएं हो सकती हैं.

8. मानसिक थकान

लगातार शोर, सीमित व्यक्तिगत जगह और लंबे समय तक यात्रा करने से मानसिक थकान, तनाव और सतर्कता में कमी महसूस हो सकती है.

9. कॉस्मिक रेडिएशन का असर

हवाई यात्रा के दौरान यात्रियों को जमीन की तुलना में अधिक कॉस्मिक रेडिएशन का सामना करना पड़ता है. हालांकि 24 घंटे की एक यात्रा से सामान्य यात्रियों के लिए कोई बड़ा खतरा नहीं माना जाता, लेकिन जो लोग बार-बार लंबी दूरी की उड़ान भरते हैं, जैसे पायलट और केबिन क्रू, उनमें समय के साथ इसका प्रभाव अधिक हो सकता है.

24 घंटे की लंबी फ्लाइट में स्वस्थ रहने के लिए क्या करें?


Xप्लेन: प्लेन लगातार 24 घंटे तक उड़ते रहे, लेकिन तकनीक के आगे इंसानी जिस्म कैसे कमजोर पड़ा
-हर घंटे लगभग 250 मिलीलीटर पानी पिएं.
-हर 1–2 घंटे में उठकर थोड़ा चलें या स्ट्रेचिंग करें.
-ढीले और आरामदायक कपड़े पहनें.
-यदि DVT का खतरा अधिक है, तो डॉक्टर की सलाह से कम्प्रेशन सॉक्स पहनें.
-शराब और अत्यधिक कैफीन के सेवन से बचें.
-हल्का भोजन करें और जहां संभव हो, अपनी मंजिल के टाइम ज़ोन के अनुसार सोने की कोशिश करें.

क्या कोई इंसान 24 घंटे तक फ्लाइट में रह सकता है?

हां, आज के समय में अल्ट्रा-लॉन्ग-हॉल उड़ानों और टेस्ट फ्लाइट्स के कारण यात्रियों, पायलटों और केबिन क्रू को कभी-कभी लगभग 24 घंटे तक यात्रा करनी पड़ सकती है. यह अनुभव निश्चित रूप से थकाने वाला और असुविधाजनक हो सकता है, लेकिन यदि व्यक्ति स्वस्थ है, पर्याप्त पानी पीता है, बीच-बीच में चलता-फिरता है और यात्रा के बाद पर्याप्त आराम करता है, तो एक बार की 24 घंटे की यात्रा से आमतौर पर लंबे समय तक स्वास्थ्य पर कोई गंभीर प्रभाव नहीं पड़ता.

तकनीक का विकास क्या मानव शरीर के लिए बन रही दुश्मन

तकनीक जिस अभूतपूर्व गति से आगे बढ़ रही है, हमारा मानव शरीर (जीव विज्ञान) उसके साथ तालमेल नहीं बिठा पा रहा है. यह एक बड़ा सच है. विकासवादी जीव विज्ञान (Evolutionary Biology) के अनुसार, मानव शरीर को ढलने में लाखों साल लगते हैं, जबकि हमारी तकनीक हर दशक में पूरी तरह बदल जाती है. हम 21वीं सदी की तकनीक का इस्तेमाल 10,000 साल पुराने पत्थर के युग वाले (Palaeolithic) शरीर और दिमाग से नहीं कर सकते ये सच है.

इसे हम कुछ मुख्य क्षेत्रों में साफ़ तौर पर देख सकते हैं:

1. गतिशीलता बनाम गतिहीनता 

तकनीक  की बात करें तो आज इंसानों के लिए गाड़ियों, लिफ्ट, ऑटोमेशन और स्क्रीन सब कुछ एक क्लिक पर उपलब्ध हो जाता है. जबकि हमारा शरीर लगातार चलने-फिरने और मेहनत करने के लिए बना है. परिणाम स्वरूप इंसान तकनीक का इस्तेमाल तो कर रहा है लेकिन इससे मोटापा, डायबिटीज, सर्वाइकल पेन, बैक पेन और दिल की बीमारियां महामारी का रूप ले चुकी हैं.

2. स्क्रीन और रोशनी

स्मार्टफोन, टीवी और आर्टिफिशियल लाइट आजकल सबके पास उपलब्ध हैं. मगर इंसानी शरीर की अपनी सीमा है. हमारी आंखें और दिमाग सूरज के उगने और ढलने के हिसाब से बने हैं. रात में नीली रोशनी (Blue Light) मिलने से मेलाटोनिन (नींद का हार्मोन) बनना बंद हो जाता है, जिससे अनिद्रा और डिप्रेशन बढ़ रहा है. अधिक फोन इस्तेमाल करने से यह लोगों के बीच होता है.

3. सूचना का अतिप्रवाह 

सोशल मीडिया और इंटरनेट जैसे तकनीक के ज़रिए हर सेकंड हमारे पास सैकड़ों खबरें, रील्स और नोटिफिकेशन्स आ रहे हैं पर हमारा दिमाग एक समय में सीमित जानकारी को प्रोसेस करने और केवल 'वास्तविक खतरों' पर प्रतिक्रिया देने के लिए विकसित है. तकनीक की अत्यधिक जानकारी और डोपामाइन (Dopamine Loop) के कारण एकाग्रता कम हो रही है और एंग्जायटी बढ़ रही है.

4. यात्रा और पर्यावरण

तकनीक की मदद से हम 12 घंटे में दुनिया के दूसरे कोने में पहुंच सकते हैं. लगातार 24 घंटे हवा में रह सकते हैं लेकिन  शरीर इतनी तेज़ी से टाइम ज़ोन बदलने, रेडिएशन और केबिन प्रेशर को तुरंत नहीं झेल पाता. इससे शरीर पर असर पड़ सकता है.

संकल्प ठाकुर पिछले 10 वर्षों से मीडिया जगत में सक्रिय हैं. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत न्यूज़ 24 से की, इसके बाद न्यूज़ नेशन में कार्य किया. वर्तमान में वह एबीपी हिंदी डिजिटल में डिप्टी प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं और पिछले सात वर्षों से संस्थान के साथ जुड़े हुए हैं. उन्हें खेल, अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम और चुनावी राजनीति से जुड़ी खबरों की गहरी समझ है. इसके अलावा साहित्य, कला और संस्कृति से जुड़े विषयों पर लेखन उनकी विशेष रुचि और विशेषज्ञता का क्षेत्र है. उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में स्नातक की उपाधि प्राप्त की है.

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