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Explained: CAA लागू होने के बाद नागरिकता के लिए आवेदन कर रहे हैं शरणार्थी, जानें क्या है पूरी प्रक्रिया?

नए कानून के मुताबिक अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से धार्मिक प्रताड़ना के कारण आए हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदायों के लोगों को भारत की नागरिकता दी जाएगी. इस कानून के खिलाफ पूर्वोत्तर समेत देश के कई हिस्सों में विरोध हो रहा है.

नई दिल्ली: नागरिकता संशोधन क़ानून शुक्रवार से यानी 10 जनवरी से देशभर में लागू हो गया. गृह मंत्रालय की ओर से जारी एक गजट अधिसूचना में इसकी जानरकारी भी गई. संसद ने 11 दिसंबर को नागरिकता संशोधन कानून पास किया गया था. कानून लागू होने के बाद राज्य सरकारों के पास नागरिकता के लिए शर्णार्थियों की ओर आवेदन भी आने लगे हैं.

कानून लागू होने के दो दिन के भीतर ही उत्तर प्रदेश सरकार के पास पचास हजार के करीब आवेदन पहुंच चुके हैं. अकेले पीलीभीत से 38000 शरणार्थियों के अर्जियां हैं. प्रदेश की राजधानी लखनऊ में बसे शरणार्थियों के मन में भी नागरिकता को लेकर एक आस जगी है. ऐसा ही हाल देश के अन्य राज्यों का है, जहां शरणार्थी नागरिकता की आस लगाए बैठे है.

शर्णार्थियों को भारत की नागरिकता कैसे मिलेगी? नागरिकता कानून लागू होने का मतलब ये बिल्कुल नहीं है कि सभी शरणार्थियों या अवैध प्रवासियों को स्वत: ही भारतीय नागरिकता मिल जाएगी. नए नागरिकता कानून के मुताबिक सभी शर्तें पूरी करने वाले शर्णार्थियों को अपने जिले में जिलाधिकारी के पास नागरिकता के लिए आवेदन देना होगा. आवेदकों की सहूलिय के लिए ऑनलाइन आवेदन की प्रक्रिया भी इंतजाम किया गया है.

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किन देशों के शरणार्थियों को मिलेगा फायदा? इस कानून के लागू होने के बाद अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से धार्मिक प्रताड़ना के कारण 31 दिसंबर 2014 तक भारत आए गैर मुस्लिम शरणार्थी यानी हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदायों के लोगों को भारतीय नागरिकता दी जाएगी. मतलब 31 दिसंबर 2014 के पहले या इस तिथि तक भारत में प्रवेश करने वाले नागरिकता के लिए आवेदन करने के पात्र होंगे. नागरिकता पिछली तिथि से लागू होगी.

देश में कहां-कहां लागू नहीं होगा ये कानून? नागरिकता संशोधन बिल की छठी अनुसूची के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों में लागू नहीं होगा (जो स्वायत्त आदिवासी बहुल क्षेत्रों से संबंधित है), जिनमें असम, मेघायल, त्रिपुरा और के क्षेत्र मिजोरम शामिल हैं. वहीं ये बिल उन राज्यों पर भी लागू नहीं होगा, जहां इनर लाइन परमिट है. जैसे अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड और मिजोरम.

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क्या है इनर लाइन परमिट? इनर लाइन परमिट ईस्टर्न फ्रंटियर विनियम 1873 के अंतर्गत जारी किया जाने वाला एक ट्रैवल डॉक्यूमेंट है. भारत में भारतीय नागरिकों के लिए बने इनर लाइन परमिट के इस नियम को ब्रिटिश सरकार ने बनाया था. बाद में देश की स्वतंत्रा के बाद समय-समय पर फेरबदल कर इसे जारी रखा गया.

कानून को लेकर विवाद क्या है? इस कानून में छह अल्पसंख्यक समुदायों (हिंदू, बौद्ध, जैन, पारसी, ईसाई और सिख) से ताल्लुक़ रखने वाले लोगों को भारतीय नागरिकता दी जाएगी, लेकिन इसमें मुसलमानों की बात नहीं कही गई है. विरोधियों का कहना है कि यह भारत के मूलभूत संवैधानिक सिद्धांत के विरुद्ध है और यह विधेयक मुसलमानों के ख़िलाफ़ है. ये भारतीय संविधान के अनुच्छेद-14 जो कि एक मौलिक अधिकार है उसका (समानता का अधिकार) उल्लंघन करता है. सरकार पर आरोप लग रहे हैं कि इस बिल में मुस्लिम धर्म के साथ भेदभाव किया जा रहा है.

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पूर्वोत्तर में क्यों हो रहा है कानून का विरोध? पूर्वोत्तर राज्यों के मूल निवासियों का मानना है कि इस बिल के आते ही वे अपने ही राज्य में अल्पसंख्यक बन जाएंगे और इस बिल से उनकी पहचान और आजीविका को खतरा है. प्रदर्शनकारियों ने सवाल उठाया, ‘’जब अरूणाचल प्रदेश, मिजोरम और नागालैंड को नागरिक संशोधन बिल से बाहर रखा जा सकता है तो हमारे साथ दोहरा व्यव्हार क्यों किया जा रहा है?’’

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