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दुःख की दुनिया भीतर है: रिश्तों और अंदर बने हुए अच्छे और बुरे यादों की खुरचन है यह किताब

इस किताब के मुख्य बिन्दुओं पर बात करने के लिए इसे दो प्रमुख भागों में बांटकर देखने से इस पर बातचीत करने में सुविधा होगी. एक लेखक के गांव का चित्रण, जो लेखक के पिता की जन्मस्थली है और दूसरा जादूगोड़ा, जो उनकी कर्मस्थली है.

कुछ किताबें शब्दों से बुनी कम और यादों से बुनी अधिक लगती है. मानों लेखक ने जिंदगी के हर पन्ने का शब्दनुमा चित्र पेपर पर छाप दी हो. हम बात कर रहे हैं जे शुशील द्वारा लिखी गई किताब- 'दुःख की दुनिया भीतर है' की

इस किताब के मुख्य बिन्दुओं पर बात करने के लिए इसे दो प्रमुख भागों में बांटकर देखने से इस पर बातचीत करने में सुविधा होगी. एक लेखक के गांव का चित्रण, जो लेखक के पिता की जन्मस्थली है और दूसरा जादूगोड़ा, जो उनकी कर्मस्थली है. पहला वर्णन, लम्बा समय बाहर बिताकर गांव वापस आये एक ऐसे व्यक्ति की व्यथा-कथा है, जो बहुत आशा के साथ गांव आया था कि अवकाश प्राप्ति के बाद का जीवन वह अपने उस गांव में सुकून के साथ बितायेगा, जहां से उसे रोज़गार की तलाश में 13 वर्ष की अवस्था में भागना पड़ा था. गांव लौटने के बाद यहां के लोगों की स्वार्थपरता और तरह-तरह की ग्रामीण राजनीति से लेखक के पिता का जैसा मोहभंग होता है, वह कमोबेश प्रत्येक गांव का यथार्थ है. लम्बे समय के बाद गांव वापस आने वाले लोगों को, गांव उस सहजता से कभी स्वीकार नहीं करता, जैसी अपेक्षा लेकर वह गांव आते हैं.

ऐसे नौकरीपेशा लोगों की वापसी के बाद गांव के लोगों को ऐसा लगता है कि मानो उनकी मिल्कियत में कोई ग़ैर अनधिकृत रूप से आ गया हो! गाँव से जुड़े सभी प्रसंगों को पढ़ते हुए, चाहे वह श्राद्ध और कर्मकांड से जुड़े प्रसंग हों या भोज-भात से जुड़ी बातें हों या जगह-ज़मीन पर कब्जा जमाने से जुड़े प्रसंग हों या हमेशा आर्थिक मदद के आकांक्षी पट्टीदारों-रिश्तेदारों से जुड़ी बातें हों, इन सभी बातों को पढ़ते हुए ग्रामीण पृष्ठभूमि से जुड़े प्रत्येक पाठक को निश्चित रूप से अपने गाँव-घर की याद आएगी.

इस किताब का दूसरा महत्त्वपूर्ण हिस्सा है- जादूगोड़ा का वर्णन. लेखक के पिता जादूगोड़ा के यूरेनियम खदान में मजदूर के रूप में भर्ती हुए थे और बाद में वहीं की फैक्ट्री में वेल्डिंग का काम करते रहे. लेखक का जन्म वहीं हुआ. यानी बचपन से ही लेखक ने अपने मजदूर पिता और अपने परिवार को जिस रूप में देखा, उसका जैसा वस्तुनिष्ठ और यथार्थपरक वर्णन इस पुस्तक में किया है, वह इस किताब का एक विशिष्ट पहलू है। फैक्ट्री से जुड़े कई प्रसंगों ख़ासकर काम से घर लौटने के बाद पिता के शरीर से आती बदबू वाले प्रसंग को पढ़ते हुए शेखर जोशी की कालजयी कहानी ‘बदबू’ की याद आती है. उस कहानी के बाद मेरी पढ़त में यह पहला टेक्स्ट आया, जिसमें फैक्ट्री और वहाँ के मजदूरों के जीवन का ऐसा वर्णन पढ़ने का मुझे अवसर मिला.

जे सुशील ने अपने पिता के बारे में या मां के बारे में या अपने भाइयों के बारे में ऐसी बातों को भी बहुत साफ़गोई से लिखा है, स्वजनों के बारे में जिन बातों को लिखने में आमतौर लोग संकोच करते हैं। जिस तरह से पिता के हिंसक आचरण पर लेखक ने खुलकर लिखा है, उसी तरह से माँ की फिजूलखर्ची और घर के भीतर के तानाशाही रवैये पर भी. लेखक ने बहुतेरे प्रसंगों के हवाले से पिता के मनोविज्ञान को पकड़ने की बहुत कोशिश की है, हालांकि इस क्रम में अटकलों की भी अधिकता है. कई बार ये अटकलें अतिरिक्त भी लगती हैं.

पिता और मां से जुड़े विषयों के अलावा भी ऐसे कई प्रसंग हैं, मसलन बड़े भाई का अंतरजातीय विवाह, उसके कारण घर छोड़ना, बाद में नशे के गिरफ्त में आना और उसके परिणामस्वरूप एक दुर्घटना में उनकी आसामयिक मृत्यु, मँझले भाई के परिवार का टूटना आदि, जिन घरेलू प्रसंगों पर लेखक ने बहुत स्पष्टता से लिखा है. ये सारे प्रसंग व्यक्तिगत होते हुए भी सामाजिक महत्त्व के भी हैं. इन सभी घटनाओं से भारतीय समाज की दशा और दिशा का पता चलता है. इन प्रसंगों से परिवार, समाज और विवाह संस्थाओं की हकीकत बयां होती है. हालांकि अपने भाई के अन्तरजातीय विवाह वाले प्रसंग में लेखक के स्टैंड का पता नहीं चलता, बल्कि अपनी चुप्पी के साथ अंदरुनी रूप से वह अपने पिता के साथ खड़ा नज़र आता है. हो सकता है कि यह मेरा अतिपाठ  हो या यह पूरा प्रकरण अपनी सम्पूर्ण अन्तरकथाओं के साथ पुस्तक में नहीं आ सका हो इसलिए ऐसा लगा हो, लेकिन यह ज़रूर है कि यह मुझे सवालिया बिन्दु लगा.

इस किताब में अनेक ऐसे प्रसंग हैं, जो पाठक के मर्मस्थल को न केवल स्पर्श करते हैं, बल्कि जिनकी गहरी याद पाठक-मन में बन जाती है. ऐसे सभी प्रसंगों की चर्चा तो एक लघु टिप्पणी में कर पाना सम्भव नहीं है, लेकिन जे सुशील की इस किताब के विषय में संक्षेप में यह ज़रूर कहा जा सकता है कि जादूगोड़ा की एक फैक्ट्री में काम करने वाले एक वेल्डिंग मजदूर पिता और इस किताब के लेखक सहित तीन बच्चों को संभालती मां यानी कुल पांच लोगों के इस परिवार की यह कथा एक साधारण भारतीय मजदूर परिवार की हर तरह की मुश्किलों को दर्ज करती है. प्रथमदृष्टया ‘दुःख की दुनिया भीतर है’ भले पिता की मृत्यु के बाद लिखा गया केवल एक शोक-गद्य लगे, लेकिन अस्ल में यह किताब एक साधारण मजदूर परिवार की सम्पूर्ण जीवन-गाथा है.

पुस्तक- दु:ख की दुनिया भीतर है
प्रकाशक- रुख पब्लिकेशन्स
लेखक- जे सुशील

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