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सिंधिया की सत्यकथा: क्या सिंधिया घराने ने स्वतंत्रता की लड़ाई में अंग्रेजों का साथ दिया था?

कांग्रेस नेताओं ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को निशाने पर लेते हुए आरोप लगाया कि उनके परिवार ने 1857 की लड़ाई में अंग्रेजों का साथ दिया था. सिंधिया परिवार ने झांसी की रानी की मदद नहीं की थी.

भोपाल: ग्वालियर का किला सिंधिया राजघराने की भव्यता और ऐश्वर्य की मिसाल है. ज्योतिरादित्य सिंधिया ग्वालियर के महाराजा हैं और किला उनका घर. इस महल में 400 कमरे हैं. ग्वालियर के आलीशान किले को जय विलास महल कहा जाता है. इसमें कारीगरी और ऐतिहासिक धरोहर अद्भुत संगम है, जिसे देखने वाला आज भी बस देखता रह जाता है.

भव्यता और नक्काशियों के लिए विलास महल विदेश तक में मशहूर है. 12 लाख 40 हजार 771 वर्ग फीट में फैले इस किले का निर्माण आज से 146 साल पहले ज्योतिरादित्य सिंधिया के परदादा महाराजा जयाजी राव सिंधिया ने करवाया था. जिस वक्त ये महल बना इसकी कीमत एक करोड़ रुपये आंकी गई थी लेकिन अब इस किले की कीमत करीब 5000 करोड़ रुपये है. करीब 150 साल पहले इस महल को यूरोपीय आर्किटेक्ट के तहत तैयार किया गया था.

ग्वालियर के किले में बना दरबार हॉल आज भी लोगों के बीच मशहूर है क्योंकि दरबार हॉल के बारे में कई कहानियां सुनाई जाती हैं. इन कहानियों में सबसे ज्यादा मशहूर झूमर की कहानी है. दरबार हॉल में साढ़े तीन हजार किलो वजन वाले बेल्जियम के दो झूमर लगे हैं. कहा जाता है कि महल की छत पर दोनों झूमरों को लगवाने से पहले हाथियों को छत चलवाकर देखा गया था कि महल की छत वजन सह भी पाती है या नहीं. प्रचलित कहानी के मुताबिक महल तैयार करने वाले इंजीनियरों ने दस दिन तक सात हाथियों को छत पर खड़ा करके देखा था. सिर्फ झूमर ही विदेश से नहीं आए थे बल्कि महल को सजाने के लिए भी विदेश से कारीगरों को बुलाया गया था.

दरबार महल के बाद दूसरा सबसे आकर्षक कोना महल का डाइनिंग हॉल है. यहां मेज पर चांदी की ट्रेन दौड़ती है. ट्रेन का इस्तेमाल मेहमानों को भोजन परोसने के लिए किया जाता है. महल की छतों पर सोने की नक्काशी की गई है. हालांकि ज्योतिरादित्य सिंधिया के इस शाही महल के एक हिस्से को म्यूजियम बना दिया गया है जिसे देखने के लिए देश विदेश से पर्यटकों की भीड़ जाती है. लेकिन दूसरे हिस्से में आज भी महाराजा ज्योतिरादित्य सिंधिया अपनी पत्नी प्रियदर्शिनी और बच्चों के साथ रहते हैं. ऐसा नहीं है कि सफेद कुर्ते पायजामे में अक्सर नजर आने वाले सिंधिया राजनेता ही हैं. दशहरे के मौके पर सिंधिया राज परिवार के वस्त्र धारण करके पूजा संपन्न करते हैं और उस वक्त वो सिर्फ ग्वालियर क महाराजा होते हैं.

49 साल के ज्योतिरादित्य सिंधिया के साफ सिर्फ ग्वालियर का ये महल ही नहीं बल्कि मुंबई में 15 और 16 करोड़ की कीमत के दो फ्लैट हैं. इसके अलावा उनके पास रहने के लिए रानी महल, हीरानवन, रोशनी घर, घंटी घर, और भूत बंगला जैसे दस और मकान हैं जिनकी कीमत करीब 116 करोड़ के आसपास है. सिंधिया के पास तीन करोड़ के सिर्फ चांदी के बर्तन हैं. 181 करोड़ की खेती वाली जमीन है. परिवार में करीब 12 करोड़ रुपये का सोना-चांदी है जिसमें सोने के कप से लेकर सिगरेट का केस तक शामिल है.

ज्योतिरादित्य सिंधिया का जन्म साल 1971 में मुंबई में हुआ था. माधवराव सिंधिया और माधवी राजे सिंधिया के बेटे ज्योतिरादित्य ने देहरादून के दून स्कूल में पढ़ाई की और फिर हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से इकनॉमिक्स में ग्रेजुएशन किया. साल 2001 में ज्योतिरादित्य स्टैनफोर्ड ग्रेजुएट स्कूल ऑफ बिजनेस से एमबीए पूरा कर चुके थे लेकिन ये ही वो साल था जिसने ज्योतिरादित्य की आने वाली जिंदगी का फैसला हो गया.

साल 2001 में पिता माधव राव सिंधिया की एक हादसे में मौत हो जाने के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने राजनीति का रुख किया. 2002 में ज्योतिरादित्य ने मध्य प्रदेश के गुना लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव में जीत दर्ज की जो उनके पिता की सीट हुआ करती थी. 2004, 2009 और 2014 में भी लगातार ज्योतिरादित्य गुना से जीतते रहे लेकिन 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में ज्योतिरादित्य पहली बार गुना से चुनाव हार गए.

मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया बड़ा नाम हैं लेकिन मध्य प्रदेश चुनाव में कांग्रेस की जीत के बाद भी सिंधिया के हाथ कुछ लगा नहीं है. न ही वे सीएम बन पाए और न ही सरकार में मन का काम कर पाए. लिहाजा सरकार बनने के 14 महीने बाद सिंधिया ने कांग्रेस से बगावत कर दी. बगावत करके वो सीधे कांग्रेस की विरोधी बीजेपी का हिस्सा बन गए.

18 साल से जो ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस के आंख के तारे थे. जो ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस के दाहिनी हाथ माने जाते थे, मीडिया के सवालों का जवाब देने के लिए राहुल गांधी को ब्रीफ करते थे, आज कांग्रेसियों को उसी ज्योतिरादित्य सिंधिया में छल कपट, और धोखा दिखाई देने लगा है. कांग्रेस के तमाम नेताओं को अब ज्योतिरादित्य सिंधिया अचानक गद्दार लगने लगे उनकी तुलना मीर जाफर और जयचंद से की जा रही है.

कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि सिंधिया ने कांग्रेस के साथ गद्दारी की. कांग्रेस के मुताबिक सिंधिया परिवार ने 1857 की लड़ाई में अंग्रेजों का साथ दिया और झांसी की रानी की मदद नहीं की थी. आजादी से सिंधिया परिवार को जोड़कर छल कपट की बात करने वाले कांग्रेसियों को अब तक उनमें कोई खोट नजर नहीं आ रही थी.

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में इतिहास के प्रोफेसर एम के पुंडीर से एबीपी न्यूज़ ने पूछा कि क्या सिंधिया घराने ने स्वतंत्रता की लड़ाई में अंग्रेजों का साथ दिया था. जवाब में प्रोफेसर साहब ने बताया कि 1803 में सिंधिया घराना युद्ध में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी से हार गया था. इसके बाद संधि हुई और सिंधिया ने अंग्रेजों के मातहत रहने की शर्त स्वीकार कर ली थी. इस बात को वजन हिंदी की जानी मानी कवियत्री सुभद्रा कुमारी चौहान की उस कविता से मिलता है जिसमें इसका जिक्र है लाइनें कुछ ऐसी हैं, ''बुंदेलों हर बोलो के मुंह हमने सुनी कहानी थी, अंग्रेजों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी.''

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